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दवा कारखानों में छापेमारी बढ़ने के बाद सकते में मिलावटखोर, गिरफ्तारी में भी बढ़ोतरी; ड्रग इंस्पेक्टर की भी हो रही भर्ती

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'बीते कुछ वर्षों में इन आंकड़ों में लगातार गिरावट आ रही है। साल 2023-24 में खराब गुणवत्ता वाली दवाओं का राष्ट्रीय औसत करीब 3 फीसदी था, जो दर्शाता है कि सुधार हो रहा है।'

Last Updated- October 02, 2024 | 10:17 PM IST
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खराब गुणवत्ता वाली (एनएसक्यू) दवाइयों का प्रतिशत परीक्षण किए गए नमूनों में लगातार कम हो रहा है। इससे पता चलता है दवाओं की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। इसके साथ ही नकली दवाइयों पर सख्ती बढ़ रही है और नकली अथवा खराब गुणवत्ता वाले दवाओं का उत्पादन एवं बिक्री करने वालों की गिरफ्तारी हो रही है और दवा विनिर्माण इकाइयों पर लगातार छापेमारी की जा रही है।

लोक सभा में भारती प्रवीण पवार ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि आंकड़े दर्शाते हैं कि परीक्षण किए गए नमूनों में खराब गुणवत्ता वाली दवाइयों की हिस्सेदारी करीब आधी हो गई है, जो साल 2014-15 के 5 फीसदी से घटकर साल 2021-22 में 2.8 फीसदी रह गई है। पवार पिछले साल फरवरी में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री थीं।

इस बीच, अचानक जांच किए गए नमूनों में नकली दवाओं की संख्या साल 2014-15 के 83 से बढ़कर साल 2021-22 में 379 हो गई। परीक्षण किए गए कुल नमूनों की संख्या भी साल 2014-15 के 74,199 से बढ़कर साल 2021-22 में 88,844 को गई। इसके साथ ही अभियोजन और गिरफ्तारी की संख्या भी काफी तेजी से बढ़ी है।

अभियोजन की संख्या साल 2014-15 के 152 से बढ़कर साल 2021-22 में 592 हो गई और गिरफ्तार की संख्या भी 85 से बढ़कर 450 पर पहुंच गई। लोक सभा में मिलने जवाब के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है।

खाद्य एवं औषधि नियामक (एफडीए) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि एक दशक पहले परीक्षण किए गए सभी नमूनों में खराब गुणवत्ता वाली दवाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी।

अधिकारी ने कहा, ‘बीते कुछ वर्षों में इन आंकड़ों में लगातार गिरावट आ रही है। साल 2023-24 में खराब गुणवत्ता वाली दवाओं का राष्ट्रीय औसत करीब 3 फीसदी था, जो दर्शाता है कि सुधार हो रहा है।’

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि क्वालिटी एश्योरेंस, ऑडिट और नकली दवाओं पर कार्रवाई लगातार की जा रही है और हर महीने घटिया अथवा मिलावटी दवाओं की एक सूची भी जारी की जाती है।

सिर्फ साल 2023 में 646 दवाओं को खराब गुणवत्ता वाली सूची में शामिल किया गया था। इनमें दर्द निवारक, एंटीबायोटिक, मधुमेहरोधी और उच्च रक्तचापरोधी दवाइयां शामिल थीं। खराब गुणवत्ता वाली ये दवाइयां मुख्य तौर पर उत्तराखंड के रुड़की और हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर तथा गुजरात के अहमदाबाद में बनी थीं।

ड्रग इंस्पेक्टर की हो रही भर्ती

महाराष्ट्र का एफडीए पहले से ही इसके लिए सक्रिय है और अपने ड्रग इंस्पेक्टर को प्रशिक्षण देने के साथ महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के जरिये अधिक अधिकारियों की भर्ती कर रहा है। राज्य औषधि नियंत्रक डीआर गहाणे ने खुलासा किया कि अनुसूची एम अनुपालन (अच्छी विनिर्माण प्रथाओं) के लिए छोटी विनिर्माण इकाइयों के ऑडिट के लिए निरीक्षकों को तैयार करने के लिए कार्यशाला आयोजित की जा रही है। प्रदेश में ड्रग इंस्पेक्टर के 200 पद हैं और सरकार ऑडिट क्षमता को बढ़ाने के लिए 120 रिक्तियों को शीघ्र भरने के लिए कार्यरत है।

उत्तर भारत में निर्यातकों से जुड़े कफ सिरप घोटाले के बाद महाराष्ट्र ने पहले ही लिक्विड दवा विनिर्माताओं का ऑडिट किया है और कोई बड़ी खामी नहीं मिली। इसी तरह, गुजरात के खाद्य एवं औषधि नियंत्रण प्रशासन (एफडीसीए) के आयुक्त एचजी कोशिया वे कहा कि प्रदेश में अधिक इंस्पेक्टर की नियुक्ति की जा रही है और हमारी योजना के अपने मौजूदा 140 से 150 इंस्पेक्टरों की संख्या में 40 इंस्पेक्टर और बढ़ाए जाएं।

कोशिया ने उल्लेख किया कि लगातार ऑडिट और नमूनों के परीक्षण से गुजरात की एनएसक्यू दर 0.79 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। उन्होंने कहा, ‘प्रयोगशालाओं में नमूनों के परीक्षण के साथ-साथ हम नियमित तौर पर विनिर्माण स्थलों का भी ऑडिट करते हैं।’

राष्ट्रीय स्तर पर सीडीएससीओ दिसंबर 2022 से जोखिम-आधारित ऑडिट कर रहा है। जून में भारत के औषधि महानियंत्रक राजीव रघुवंशी ने कहा था कि लगभग 400 इकाइयों का निरीक्षण किया गया था, जिनमें से 36 फीसदी को मानकों पर खरा नहीं उतरने के बाद बंद करने का निर्देश दिया गया था। इनमें से लगभग 10 फीसदी सुधारात्मक कार्य योजना प्रस्तुत करने में विफल रहे, नतीजतन उन्हें हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। भारत में लगभग 10,000 फार्मा विनिर्माण इकाइयां हैं, जिनमें से 80 फीसदी सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यम हैं।

रघुवंशी ने बताया कि कई इकाइयां दस्तावेजीकरण, सत्यापन प्रक्रियाओं और अपर्याप्त गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं जैसे मुद्दों से जूझ रही हैं, जो उनकी गुणवत्ता प्रबंधन प्रणालियों को बड़े पैमाने पर विफल कर रही हैं।

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First Published - October 2, 2024 | 10:17 PM IST

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