Pralhad Joshi ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का स्पष्ट रोडमैप पेश किया।
BS Manthan 2026: केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता हासिल करने के अपने लक्ष्य को लेकर स्पष्ट रोडमैप सामने रखा है। केंद्रीय मंत्री Pralhad Joshi ने बुधवार को आयोजित ‘बीएस मंथन’ शिखर सम्मेलन में कहा कि भारत नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) के क्षेत्र में तेज गति से आगे बढ़ रहा है और तय समय से पहले कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुका है।
50 प्रतिशत से अधिक क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से
मंत्री ने बताया कि देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब गैर-जीवाश्म स्रोतों से आ रहा है। यह उपलब्धि भारत ने निर्धारित समय से लगभग पांच वर्ष पहले हासिल कर ली है, जो जी20 देशों के बीच एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता का लक्ष्य प्रधानमंत्री Narendra Modi ने COP26 में घोषित किया था। सरकार उसी दिशा में योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है।
2014 के बाद तेज हुआ बदलाव
मंत्री ने 2014 के बाद हुए बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश में सौर ऊर्जा क्षमता केवल 2.8 गीगावॉट थी। आज बड़े जलविद्युत परियोजनाओं को छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़कर 195 गीगावॉट तक पहुंच चुकी है। यदि सभी गैर-जीवाश्म स्रोतों को मिलाया जाए तो कुल स्थापित क्षमता 267 गीगावॉट हो चुकी है।
रिकॉर्ड स्तर पर क्षमता वृद्धि
बीते कैलेंडर वर्ष में भारत ने 50 गीगावॉट से अधिक नई क्षमता जोड़ी, जो अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा है। मंत्री के अनुसार, बड़े पैमाने पर परियोजनाएं लागू होने से लागत में कमी आई है और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।
उन्होंने यह भी कहा कि सौर ऊर्जा की दरों में गिरावट, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा, रूफटॉप सोलर योजनाओं का विस्तार और ऊर्जा भंडारण की बड़ी योजनाएं इस लक्ष्य को प्राप्त करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
सरकार का मानना है कि नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि से न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता मजबूत होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले वर्षों में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, बैटरी स्टोरेज और हाइड्रोजन मिशन जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित होंगे।
नवीकरणीय ऊर्जा की अनियमितता से कैसे निपट रहा है भारत?
भारत तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है उत्पादन की अनियमितता। सूरज हर समय नहीं चमकता और हवा भी लगातार नहीं चलती। ऐसे में बिजली आपूर्ति को स्थिर और भरोसेमंद बनाए रखना एक जटिल कार्य बन जाता है। केंद्र सरकार का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए कई स्तरों पर एक साथ काम किया जा रहा है।
ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार, ग्रिड एकीकरण की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सौर और पवन ऊर्जा को मिलाकर हाइब्रिड परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं, ताकि एक स्रोत की कमी को दूसरा पूरा कर सके। इसके साथ ही पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है, जिनमें अतिरिक्त बिजली को पानी पंप करके संरक्षित किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे फिर से बिजली में बदला जाता है।
बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण भी इस रणनीति का अहम हिस्सा है। सरकार 43 गीगावॉट घंटे की बैटरी स्टोरेज क्षमता के लिए निविदाएं तैयार कर रही है। वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता के लक्ष्य के साथ लगभग 411 गीगावॉट घंटे ऊर्जा भंडारण की योजना बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा, विशेष रूप से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर, को भी ऊर्जा मिश्रण में शामिल करने की दिशा में पहल हो रही है। ग्रिड प्रबंधन को अधिक सटीक और स्मार्ट बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डिजिटल ट्विन तकनीक का उपयोग भी किया जा रहा है।
सरकार का स्पष्ट संदेश है कि सस्ती बिजली के साथ विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करना ही असली लक्ष्य है।
क्या नवीकरणीय बिजली वास्तव में सस्ती हो चुकी है?
पिछले दस वर्षों में सौर ऊर्जा की दरों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। एक दशक पहले जहां सौर बिजली की दरें 11 से 12 रुपये प्रति यूनिट तक थीं, वहीं अब यह लगभग 2.50 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गई हैं। भारतीय सौर ऊर्जा निगम द्वारा खोजी गई फर्म और डिस्पैचेबल नवीकरणीय ऊर्जा तथा चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली परियोजनाओं की दरें भी 4 से 4.50 रुपये प्रति यूनिट के बीच हैं।
इसके मुकाबले नई जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली परियोजनाओं की लागत 7 से 8 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है। सरकार का मानना है कि सस्ती बिजली भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में मजबूती देगी। ऊर्जा लागत कम होने से उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स खर्च में भी कमी आएगी।
सौर निर्माण में आत्मनिर्भरता की ओर कदम
नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ ही भारत घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है। देश की सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता 144 गीगावॉट से अधिक हो चुकी है। सरकार का दावा है कि इससे भारत न केवल आत्मनिर्भर बना है बल्कि अधिशेष उत्पादन की स्थिति में भी पहुंच गया है।
सौर उपकरणों के आयात में 50 प्रतिशत से अधिक कमी आई है और चालू वर्ष में इसमें 70 से 80 प्रतिशत तक गिरावट आने की उम्मीद जताई जा रही है। 24,000 करोड़ रुपये की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के तहत उच्च दक्षता वाले सौर पीवी मॉड्यूल के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है। लक्ष्य यह है कि कच्चे माल से लेकर तैयार उत्पाद तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला देश के भीतर विकसित हो, ताकि ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके।
रूफटॉप सोलर और सबके लिए ऊर्जा पहुंच
घरेलू स्तर पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप सोलर कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया गया है। पिछले दो वर्षों में लगभग 30 लाख घरों में सौर पैनल लगाए गए हैं, जिससे करीब 14 गीगावॉट क्षमता जुड़ी है। इसे अभूतपूर्व विस्तार बताया जा रहा है।
हालांकि जिन परिवारों के पास छत नहीं है या जो सब्सिडी के बाद भी सोलर सिस्टम लगाने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए राज्यों के साथ मिलकर वैकल्पिक मॉडल तैयार किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में उपयोगिता आधारित योजनाओं पर प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक स्वच्छ और किफायती बिजली पहुंच सके।
ग्रिड कर्टेलमेंट और डिस्कॉम दबाव पर सरकार का जवाब, बदलाव को बताया संक्रमण काल की चुनौती
देश में बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के बीच ग्रिड कर्टेलमेंट और वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों पर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर. के. सिंह के बाद अब मंत्री जोशी ने भी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने स्वीकार किया कि मौजूदा दौर में ग्रिड से जुड़ी कुछ तकनीकी चुनौतियां सामने आ रही हैं, लेकिन इसे बड़े ऊर्जा परिवर्तन की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
जोशी ने कहा कि जब किसी देश में ऊर्जा उत्पादन का ढांचा तेजी से बदलता है और पारंपरिक स्रोतों की जगह सौर और पवन जैसे स्रोत प्रमुख होने लगते हैं, तो ग्रिड प्रबंधन की जटिलताएं बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे समय में बिजली की आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है।
ग्रिड कर्टेलमेंट क्या है और क्यों उठ रहे हैं सवाल
ग्रिड कर्टेलमेंट का मतलब है कि जब उत्पादन अधिक हो और मांग कम हो, तो कुछ बिजली परियोजनाओं को अस्थायी रूप से उत्पादन कम करने के लिए कहा जाता है। खासकर सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं इस स्थिति से प्रभावित होती हैं। इससे निवेशकों और डेवलपर्स के बीच चिंता पैदा होती है।
वहीं, कई राज्यों की डिस्कॉम कंपनियां पहले से वित्तीय दबाव में हैं। ऐसे में वे नई बिजली खरीद समझौतों पर हस्ताक्षर करने में सतर्कता बरत रही हैं। इससे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की रफ्तार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार की रणनीति क्या है
जोशी के अनुसार, इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है।
पहला, उत्पादन के साथ भंडारण क्षमता बढ़ाना। सौर और पवन ऊर्जा की प्रकृति अनिश्चित होती है। ऐसे में बैटरी स्टोरेज और पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज जैसे विकल्पों को समानांतर रूप से विकसित किया जा रहा है ताकि अतिरिक्त बिजली को संग्रहित कर बाद में उपयोग किया जा सके।
दूसरा, हाइब्रिड परियोजनाओं को बढ़ावा। सौर और पवन परियोजनाओं को एक साथ जोड़ने से उत्पादन में संतुलन आता है। इससे ग्रिड पर दबाव कम होता है और आपूर्ति अधिक स्थिर रहती है।
तीसरा, परमाणु ऊर्जा का समावेशन। सरकार का मानना है कि परमाणु ऊर्जा स्थिर और निरंतर बिजली उपलब्ध कराती है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा के साथ मिलाकर ग्रिड की विश्वसनीयता मजबूत की जा सकती है।
चौथा, एआई आधारित पूर्वानुमान और लोड प्रबंधन। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बिजली की मांग और उत्पादन का बेहतर अनुमान लगाया जा रहा है। इससे ग्रिड ऑपरेटर समय रहते संतुलन बना सकते हैं।
पांचवां, डिजिटल ट्विन तकनीक का उपयोग। डिजिटल ट्विन के माध्यम से ग्रिड का वर्चुअल मॉडल तैयार किया जाता है। इससे संभावित समस्याओं की पहले से पहचान कर समाधान की रणनीति बनाई जा सकती है।
दीर्घकालिक लक्ष्य पर जोर
जोशी ने कहा कि सरकार का फोकस केवल मौजूदा समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत और लचीला ग्रिड तैयार करना है। वितरित नवीकरणीय स्रोतों को संभालने के लिए तकनीकी आधुनिकीकरण अनिवार्य है।
उन्होंने भरोसा जताया कि जैसे जैसे भंडारण, स्मार्ट प्रबंधन और उन्नत तकनीकें व्यापक होंगी, ग्रिड कर्टेलमेंट जैसी समस्याएं स्वतः कम होती जाएंगी। सरकार का लक्ष्य एक ऐसी ऊर्जा व्यवस्था तैयार करना है जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ साथ आर्थिक रूप से भी टिकाऊ हो।
First Published - February 25, 2026 | 2:54 PM IST
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