भारत में 5जी की तारीख की घोषणा जून 2019 में उस वक्त बेहद उत्साह के साथ की गई थी, जब संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा था कि ट्रायल रन के लिए स्पेक्ट्रम 100 दिनों में ऑपरेटरों को आवंटित किया जाना चाहिए। करीब 20 महीने बाद स्पेक्ट्रम नीलामी या वाणिज्यिक सेवाओं की पेशकश को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया है। ऑपरेटर अभी भी 5जी परीक्षण के लिए आगे बढऩे का इंतजार कर रहे हैं।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति द्वारा कल एक रिपोर्ट में सरकार के ढीले ढाले रवैये और परीक्षण में विलंब की आलोचना की गई।
समिति ने 5जी पेशकश की अपार्याप्त तैयारी के लिए दूरसंचार विभाग (डीओटी) को भी आड़े हाथ लिया। उसने कहा कि 2जी, 3जी और 4जी के बाद भारत 5जी की बस पकडऩे के लिहाज से तैयार नहीं दिख रहा है। समिति ने यह सख्ती डीओटी के उस जवाब के बाद दिखाई है जिसमें कहा गया कि भारत इस साल के अंत तक या 2020 के शुरू तक 5जी की आंशिक पेशकश ही कर पाएगा।
भारत 5जी नेतृत्व पर पिछड़ता दिख रहा है। ग्लोबल मोबाइल सप्लायर्स एसोसिएशन के अनुसार, 63 देशों में 140 से ज्यादा ऑपरेटर पहले से ही वाणिज्यिक जौर पर 5जी सेवाओं की पेशकश कर रहे हैं। चीन ने 50 से ज्यादा शहरों में 5जी की पेशकश की है और इससे 20 करोड़ से ज्यादा ग्राहक जुड़ चुके हैं। इस साल वह 6 लाख 5जी टावर जोड़ेग।
इसके विपरीत, जून 2019 तक 16 देशों में सिर्फ 26 ऑपरेटर ही 5जी सेवा की पेशकश कर रहे थे।
5जी पेशकश में विलंब से नोकिया और अन्य कंपनियां यह भी कह रही हैं कि 5जी परीक्षण की जरूरत नहीं हो सकती है, क्योंकि पूरी प्रौद्योगिकी अब परखी जा चकी है और कई देशों में यह काम भी कर रही है। नोकिया इंडिया में विपणन एवं कॉरपोरेट मामलों के प्रमुख अमित मारवाह ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘5जी की चुनौतियों को पहले तब समझने की जरूरत थी जब इसे वैश्विक रूप से पेश किया जा रहा था, लेकिन अब यह एक मजबूज प्रौद्योगिकी से संपन्न है। भारत भी अमेरिका और यूरोप की तरह समान बैंड स्पेक्ट्रम (3,500 मेगाहट्र्ज) का इस्तेमाल कर रहा है।’
दरअसल, 5जी टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है। दूरसंचार कंपनियां 5जी नॉन-स्टैंडएलॉन (जिसमें, आप मौजूदा 4जी कोर का इस्तेमाल कर सकते हैं) से अपग्रेडिंग कर रही हैं, जिससे घरों में मजबूत कनेक्टिविटी के लिए मोबाइल ब्रॉडबैंड को ऊंची स्पीड मुहैया कराई जा सकती है।
इसके बजाय, वे 5जी नेटवर्कों की ओर बढ़ रहे हैं जो मशीन-टु-मशीन सेवाओं, ऑटोमेशन सेवाओं (जैसे ऑटोनोमस कार), और रिमोट रोबोटिक सेवाओं को सक्षम बनाएंगे और यह दूरसंचार कंपनियों के लिए राजस्व का नया स्रोत होगा। इस मामले में भारत के पिछडऩे की कई वजह हैं। एक है डीओटी नीति में अंतर और इसे लेकर स्पष्टता का अभाव कि चीनी कलपुर्जा निर्माताओं पर प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं। दिसंबर 2019 में डीओटी ने दूरसंचार कंपनियों से 5जी परीक्षण के लिए अपने ओईएम के साथ आवेदन देने को कहा था। अमेरिकी दबाव के बावजूद, चीनी कलपुर्जा निर्माताओं पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था और इसके परिणामस्वरूव ऑपरेटरों ने परीक्षण के लिए कुछ खास शहरों में हुआवेई या जेडटीई के साथ करार किए और जनवरी 2020 में अपनी पेशकशें कीं।
पिछले महीने के अंत में प्रसाद ने फिर से इस पर जोर दिया कि ट्रायल स्पेक्ट्रम जल्द दिया जाएगा और 4जी कोर को भारत में निर्मित किया जाना चाहिए।
विलंब में दूसरा कारक 3300-3600 स्पेक्ट्रम के लिए प्रतिस्पर्धा दावे रहे हैं। ट्राई ने 300 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम (5जी के लिए 100 मेगाहट्र्ज न्यूनतम जरूरत है) निर्धारित किया था, जो तीन मुख्य ऑपरेटरों के लिए पर्याप्त है। लेकिन समस्या अन्य दावेदारों को लेकर थी जिनमें अंतरक्षित एवं रक्षा विभाग द्वारा 124 मेगाहट्र्ज की मांग भी शामिल थी। यदि वह इस बैंड के स्पेक्ट्रम को खाली नहीं करता तो तीन दूरसंचार कंपनियों के लिए 5जी के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम नहीं होगा।
कैबिनेट सचिव राजीव गॉबा के नेतृत्व वाली समिति अभी भी इस समस्या का समाधान निकालने में लगी हुई है।