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मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता: करदाताओं पर बोझ, राजकोषीय अनुशासन जरूरी

पीठ ने कहा कि ऐसी घोषणाएं अक्सर चुनावों के आसपास की जाती हैं। उन्होंने राजनीतिक हितधारकों और नीति निर्माताओं से कहा कि वे इनके टिकाऊपन पर विचार करें

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भाविनी मिश्रा   
Last Updated- February 19, 2026 | 10:50 PM IST

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को राज्यों द्वारा चुनावों से पहले सब्सिडी और कल्याणकारी लाभों की घोषणाओं की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर चिंता जताई। न्यायालय ने कहा कि ऐसे उपायों का वित्तीय बोझ अंततः करदाताओं को ही उठाना पड़ता है।

देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली का पीठ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (टीएनपीडीसीएल) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। तमिलनाडु बिजली वितरण कंपनी और भारत संघ के इस मामले में बिजली (संशोधन) नियम, 2024 के नियम 23 को चुनौती दी गई है।

न्यायालय ने केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करके उनसे जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर सवाल किया कि सरकारें आखिर कैसे ऐसी योजनाओं को फंड करती हैं जिन्हें नि:शुल्क या मुफ्त के रूप में प्रस्तावित किया जाता है। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा कि किसी भी व्यय का स्रोत अंततः सार्वजनिक धन ही होता है।

मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी कि बिना नियंत्रण के इस तरह की घोषणाएं देश की आर्थिक नींव को कमजोर कर सकती हैं, विशेषकर तब जब कई राज्य पहले से ही राजस्व घाटे से जूझ रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘लेकिन यह पैसा जिसके बारे में राज्य कहते हैं कि वे भुगतान करेंगे। इसका भुगतान कौन करेगा? हय करदाताओं का पैसा है।’

यद्यपि अदालत ने यह स्वीकार किया कि सरकारों का संवैधानिक दायित्व है कि वे उन लोगों की सहायता करें जो वास्तव में शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं जैसी आवश्यक सेवाओं तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, लेकिन पीठ ने बेहतर लक्ष्य-निर्धारण की आवश्यकता पर बल दिया। अदालत ने कहा कि उन लोगों को असमान लाभ नहीं मिलना चाहिए जो भुगतान करने में सक्षम हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘देखिए, मुफ्त योजनाओं पर इस तरह राशि व्यय करने से राष्ट्र का आर्थिक विकास बाधित होगा।

उन्होंने बिजली सब्सिडी योजनाओं का भी उल्लेख किया और कहा कि कुछ मामलों में प्रभावशाली जमींदार भी मुफ्त बिजली पाते हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों को असीमित मानकर नहीं इस्तेमाल किया जा सकता है और नीति निर्माताओं को राजकोषीय विवेक का परिचय देना चाहिए। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि सालाना राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन और सब्सिडी में चला जाता है। इससे पूंजीगत व्यय और दीर्घकालिक विकास के लिए सीमित गुंजाइश बचती है।

पीठ ने कहा कि ऐसी घोषणाएं अक्सर चुनावों के आसपास की जाती हैं। उन्होंने राजनीतिक हितधारकों और नीति निर्माताओं से कहा कि वे इनके टिकाऊपन पर विचार करें।

मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों का समतापूर्ण आवंटन होना चाहिए और बढ़ता राजकोषीय असंतुलन गंभीर चिंता का विषय है।

न्यायमूर्ति बागची ने ढांचागत राजकोषीय नियोजन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर कोई सरकार सब्सिडी बढ़ाना चाहती है तो यह निर्णय पारदर्शी तरीके से बजटीय आवंटन में शामिल किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने यह चिंता भी जताई कि रियायतें उस समय लागू की जाती हैं जबकि नियामकों द्वारा बिजली दरें पहले ही तय की जा चुकी होती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे हस्तक्षेप नियामक स्वायत्तता को कमजोर कर सकते हैं और वित्तीय प्रशासन में अनिश्चितता ला सकते हैं। टीएनपीडीसीएल ने बिजली (संशोधन) नियम, 2024 के नियम 23 को चुनौती दी है। उसका तर्क है कि यह बिजली अधिनियम, 2003 के दायरे से परे है और असंवैधानिक है।

इस नियम में प्रावधान है कि बिजली आपूर्ति की स्वीकृत लागत और उपभोक्ताओं से वसूले गए शुल्क के बीच का अंतर तीन प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, और किसी भी कमी को निर्धारित समय सीमा के भीतर समाप्त किया जाना चाहिए। यह आगे यह भी प्रावधान करता है कि बकाया अंतर को देरी से भुगतान पर अधिभार लगाकर गणना किए गए अतिरिक्त शुल्क के साथ वसूला जाए।

टीएनपीडीसीएल के अनुसार, यह ढांचा वितरण कंपनियों पर गंभीर वित्तीय दबाव डाल सकता है। हालांकि याचिका सीधे तौर पर सब्सिडी योजनाओं को चुनौती नहीं देती लेकिन यह उन राज्य नीतियों की पृष्ठभूमि में उठी है जो कुछ उपभोक्ता वर्गों को रियायती या मुफ्त बिजली प्रदान करती हैं। यह मुद्दा सुनवाई के दौरान व्यापक वित्तीय बहस का हिस्सा बना।

First Published : February 19, 2026 | 10:44 PM IST