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मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक और उसकी मैसेजिंग सेवा व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई होने जा रही है। दोनों कंपनियों ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को चुनौती दी है। इस मामले पर शीर्ष अदालत की नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि इसका असर डिजिटल गोपनीयता और डेटा संरक्षण से जुड़े व्यापक मुद्दों पर पड़ सकता है।
इस प्रकरण की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति Surya Kant, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष होने की संभावना है। पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने कंपनियों के रुख पर कड़ी टिप्पणी की थी।
3 फरवरी को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि डेटा साझा करने के नाम पर नागरिकों की निजता से खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी डिजिटल मंच की नीतियां बाजार में एकाधिकार की स्थिति पैदा करती हैं या उपभोक्ताओं की निजी जानकारी का अनुचित उपयोग करती हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
अदालत ने विशेष रूप से उन उपभोक्ताओं का जिक्र किया जिन्हें उसने ‘मौन उपभोक्ता’ बताया। कोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो डिजिटल सेवाओं पर निर्भर तो हैं, लेकिन डेटा साझा करने के परिणामों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। पीठ ने दो टूक कहा कि किसी भी नागरिक के अधिकारों को प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।
मामला उस आदेश से जुड़ा है जिसमें Competition Commission of India ने मेटा और व्हाट्सऐप पर 213.14 करोड़ रुपये का आर्थिक दंड लगाया था। आयोग का आरोप था कि प्राइवेसी पॉलिसी के जरिए उपभोक्ताओं के डेटा के उपयोग और साझा करने के तरीके प्रतिस्पर्धा कानूनों के अनुरूप नहीं थे।
4 नवंबर 2025 को National Company Law Appellate Tribunal ने CCI के आदेश के एक हिस्से को रद्द कर दिया था। इस हिस्से में व्हाट्सऐप को पांच साल तक मेटा के साथ विज्ञापन उद्देश्यों के लिए डेटा साझा करने से रोकने का निर्देश दिया गया था। हालांकि अपीलीय न्यायाधिकरण ने 213 करोड़ रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा।
बाद में NCLAT ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी ओर से दिए गए दिशा निर्देश केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गैर विज्ञापन गतिविधियों में उपयोग होने वाले डेटा संग्रह और साझा करने पर भी लागू होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस मामले में अंतरिम आदेश पारित करेगा। साथ ही अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी इन अपीलों में पक्षकार बनाए जाने का निर्देश दिया है, ताकि नीति और नियामकीय पहलुओं पर सरकार का दृष्टिकोण भी सामने आ सके।
दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में केवल मेटा और व्हाट्सऐप ही नहीं, बल्कि CCI ने भी अपील दायर की है। आयोग ने NCLAT के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें कंपनियों को विज्ञापन उद्देश्यों के लिए डेटा साझा करना जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
यह मामला केवल एक जुर्माने या दो कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध डिजिटल युग में उपभोक्ताओं की निजता, डेटा सुरक्षा और बाजार प्रतिस्पर्धा से है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई यह तय कर सकती है कि भारत में डेटा साझा करने की नीतियों की सीमा और जिम्मेदारी क्या होगी।