शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हेल्थ इंश्योरेंस का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अस्पताल में इलाज का खर्च बढ़ने के कारण परिवार निजी बीमा कवरेज के जरिए आर्थिक सुरक्षा लेना चाहते हैं। उद्योग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि हालांकि अधिकांश क्लेम (दावे) बिना किसी समस्या के सुलझ जाते हैं, लेकिन जानकारी की कमी के कारण कभी-कभी गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं।
बीमा विशेषज्ञों का कहना है कि क्लेम खारिज करना मनमाना फैसला नहीं होता, बल्कि यह आमतौर पर पॉलिसी की शर्तों से जुड़ा होता है, खासकर पहले से मौजूद बीमारियों और वेटिंग पीरियड (प्रतीक्षा अवधि) से संबंधित नियमों से। ये नियम पूरे सेक्टर में एक समान हैं और इन्हें रेगुलेट किया जाता है ताकि काम करने का तरीका पारदर्शी रहे।
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विशेषज्ञों के अनुसार, विवादों का सबसे आम कारण मेडिकल जानकारी पूरी तरह न देना है। बीमा सेक्टर से जुड़े सूत्रों का कहना है, “अगर किसी ग्राहक ने पॉलिसी खरीदने से पहले मधुमेह (डायबिटीज) या हाई ब्लड प्रेशर का इलाज कराया है और फॉर्म भरते समय इसका जिक्र नहीं किया है, तो बाद में क्लेम मिलने में दिक्कत आ सकती है।”
वे स्पष्ट करते हैं कि बीमारी बताने का मतलब यह नहीं है कि बीमा नहीं मिलेगा। कई मामलों में, बीमा कंपनियां वेटिंग पीरियड या विशिष्ट शर्तों के साथ कवरेज देती हैं। शुरुआत में पारदर्शिता बरतने से दोनों पक्षों को सुरक्षा के दायरे के बारे में स्पष्ट समझ रहती है।
स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर, अमिताभ जैन ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, “हर हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम का मूल्यांकन एक निर्धारित और विनियमित प्रक्रिया के तहत किया जाता है। दावों का आकलन पॉलिसी जारी करते समय सहमत शर्तों के आधार पर किया जाता है, जिसमें प्रस्ताव फॉर्म में दी गई जानकारी और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड शामिल होते हैं।
पूरी और ईमानदार जानकारी देना बहुत जरूरी है, क्योंकि कवरेज से जुड़े फैसले उसी पर आधारित होते हैं। यदि मेडिकल रिकॉर्ड में पहले से मौजूद कोई बीमारी सामने आती है, जिसका खुलासा नहीं किया गया था, तो हमें पॉलिसी की शर्तों जैसे वेटिंग पीरियड और अपवादों के अनुसार क्लेम का आकलन करना पड़ता है। जब जानकारी और दस्तावेज पूरे होते हैं, तो अधिकांश दावे आसानी से निपट जाते हैं।”
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उद्योग प्रतिनिधियों का यह भी कहना है कि शिकायतों के समाधान की समय-सीमा को बेहतर बनाने और पॉलिसी दस्तावेजों को ज्यादा स्पष्ट बनाने के प्रयास जारी हैं। तकनीक के उपयोग से क्लेम प्रोसेसिंग तेज हुई है और ट्रैकिंग सिस्टम भी बेहतर हुए हैं।
पॉलिसीधारकों को सलाह दी जाती है कि वे:
• पॉलिसी दस्तावेज ध्यान से पढ़ें
• चल रही दवाइयों और पिछले इलाज की जानकारी जरूर दें
• खास बीमारियों के लिए लागू वेटिंग पीरियड की पुष्टि करें
• मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित और उपलब्ध रखें।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे स्वास्थ्य जरूरतें बढ़ रही हैं, समझदारी से और पूरी जानकारी के साथ पॉलिसी खरीदने से विवाद कम होंगे और बीमा सिस्टम पर भरोसा मजबूत होगा।