facebookmetapixel
Advertisement
केसरिया जर्सी पर विवाद, भारतीय हॉकी की नीली पहचान पर बहसट्रंप का दावा: युद्ध खत्म करने के समझौते की रूपरेखा तैयार, फिलहाल हमले टलेयुवाओं पर पीएम मोदी का फोकस, नशा-मुक्त भारत अभियान के तहत लाखों युवाओं को दिलाई नशा विरोधी शपथअमेरिका में दवा बनाने की जल्दी नहीं, टैरिफ के खतरे के बावजूद भारत में ही रहेगा कंपनियों का विनिर्माणउदारीकरण के 35 साल: 1991 में सेंसेक्स में थीं जो 30 कंपनियां, उनमें अब 7 ही बचीं; बेंचमार्क सूचकांक में आया बड़ा बदलावबिज़नेस स्टैंडर्ड सर्वेक्षण: रीपो दर में बदलाव के नहीं आसार, अगली बैठक में हो सकता है बड़ा फैसलानिवेश में जोरदार उछाल या आंकड़ों का भ्रम? 4 परमाणु परियोजनाओं ने बदल दी पूरी तस्वीर45% घटा हाईवे निर्माण, पश्चिम एशिया संकट और बिटुमन की कमी बनी बड़ी वजहनई ईपीएफ योजना में बदला कायदा क्या है नुकसान और क्या है फायदा?IT Funds: जुलाई की रिकॉर्ड तेजी के बीच निवेशकों ने निकाला पैसा, मुनाफावसूली या रणनीति में बदलाव

ऊर्जा पर लगाइए ‘मजबूत’ दांव

Advertisement
Last Updated- December 10, 2022 | 1:55 AM IST

राइमान-जेटा फंक्शन हाइपोथीसिस (आरएच) साल 1859 में बर्नहार्ड्ट राइमान सामने लाया गया था और यह गणित का शायद अब तक का सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल है।
अगर इसका समाधान हो जाए तो क्वांटम फिजिक्स और क्रिप्टोग्राफी में इसका व्यापक इस्तेमाल हो सकता है। विकल्पों के आकलन (ऑप्शन वैल्यूएशन) का गणित निश्चित तौर पर आरएच से कम जटिल है लेकिन अभी भी काफी चुनौती भरा है।
ऑप्शन प्राइसिंग की शुरुआत मूल ब्लैक-शोल्स ऑप्शन प्राइसिंग मॉडल (ओपीएम) से हुई और इसमें बाइनोमियल ओपीएम, मोन्टे कार्लो ओपीएम, जेनरलाइज्ड ऑटो-रिग्रेशन कंडिशनल हेटेरोस्केडास्टिक  (जीएआरसीएच) ओपीएम आदि के तरीके प्रयोग में लाए जाते हैं।
अच्छे समीकरणों की भूल-भूलैया में खोना आसान है। प्रत्येक ओपीएम के मूल में अंतर्निहित रास्तों से जुड़ी संभावनाएं ही होती हैं। अगर मूल्य-वितरण के बारे में ये अनुमान ठीक-ठीक हों तो ऑप्शंस की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।
ऑप्शन कारोबार के लिए ओपीएम एक सुरक्षित तरीका नहीं है। सच तो यह है कि सिध्दांत और मूल्य-व्यवहार के बीच भारी अंतर एक वास्तविकता है। ओपीएम बीमा पॉलिसियों के विश्लेषण के लिए बढ़िया है क्योंकि प्रीमियम, समयावधि, खरीद मूल्य (स्ट्राइक प्राइस), और सही भुगतान के विकल्पों की गणना सटीक परिस्थितियों में की जा सकती है।
वास्तविक कारोबारी निर्णय भी ऑप्शन के मॉडल पर लिए जा सकते हैं। संसाधन का आवंटन किसी दिशा में करने में प्रभावी रुप से इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। 

किसी कारोबार की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए या फिर इंतजार करना चाहिए? कारोबार के विकास के लिए उधार लेना चाहिए या अपनी आंतरिक क्षमता के आधार पर इसे अंजाम देना चाहिए? ऑप्शन सिध्दांत के विभिन्न तरीकों का प्रयोग करते हुए नीतिगत निर्णयों का विश्लेषण करने पर अक्सर बेहतर कारोबारी निर्णय लिए जा सकते हैं।
डेरिवेटिव लेन देन के आशय की गणना करना कठिन है लेकिन लेन-देन खुद में आसान होते हैं। उदाहरण के लिए, ‘ए’ डॉलर में कमाता है जिसे येन की जरूरत है। ‘बी ‘ येन में कमाई करता है और उसे डॉलर की जरूरत है। वे मुद्राओं की स्वैपिंग करते हैं। ए येन में ब्याज दरों का भुगतान करने पर सहमत होता है जबकि बी डॉलर में ब्याज चुकाने पर राजी होता है।
यह आसानी से समझा जाने वाला लेन-देन है कि अगर आप येन में उधार देते हैं तो ब्याज भी येन में ही चाहेंगे। लेकिन मुद्रा-स्वैपिंग के कारण मुद्राऋण जोखिमों का आकलन करना कठिन है।
डेरिवेटिव की सबसे बड़ी खासियत इसकी भाव खोज प्रणाली है। ऊर्जा उद्योग के साथ ऐसी ही परिस्थिति है। आप यह कैसे कह सकते हैं कि आज से अगले तीन या पांच साल तक कोई कच्चा तेल उत्पादक या रिफाइनरी लाभ में रहेगा?
आप अन्य अस्थिर कारकों का आकलन अधिक विश्वास के साथ कर सकते हैं लेकिन इस कारोबार का सबसे ज्यादा अस्थिर कारक तो कच्चे तेल की कीमतें हैं। उत्पादकों के लिए यह प्राप्ति-मूल्य है। रिफाइनिंग के नजरिये से देखें तो यह कच्चे माल की लागत है।
भविष्य के लाभों के विश्वसनीय आकलन में दीर्घावधि में कच्चे तेल की कीमतों का ठीक-ठीक अनुमान लगाया जाना चाहिए। एक जटिल मॉडल में त्रुटि-कारकों और हाजिर तथा वायदा भावों के संभावित उतार-चढ़ावों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
पेट्रोलियम श्रृंखला के अतिरिक्त पावर उद्योग का संबंध भी कच्चे तेल की कीमतों से उतना ही मजबूत है क्योंकि कोयले और गैस की कीमतें कच्चे तेल के मूल्य के उतार-चढ़ावों से प्रभावित होती हैं। पवन, जल और सौर ऊर्जा की लाभोत्पादकता भी तापीय ऊर्जा की कीमत-लाभ के समीकरणों पर निर्भर करती हैं।
ऊर्जा स्रोतों या पावर-एनर्जी क्षेत्र में निवेश के लिए लिए जाने वाले निर्णयों के लिए ऑप्शन आधारित मॉडल बनाना संभव है। अभी ऐसे मॉडल कई बातें बताती हैं। 

एक तो यह कि सरकार के नियंत्रण वाली रिफाइनरियां जल्द ही फायदे में आ जाएंगी। ये खरीदने लायक हैं और वास्तव में हाल में मूल्य में हुए उतार-चढ़ावों से ऐसा लगता है कि बाजार ने इन कारकों को शामिल किया है।
दूसरा अनुमान यह है कि पारंपरिक पावर क्षेत्रों के लाभों में बढ़ोतरी हो सकती है। आर्थिक मंदी के बावजूद मांग में मजबूती रही है। उच्च लागत (ईंधन) मूल्य और अधिक ब्याज दरों के कारण लाभ पर दबाव बना रहा।
अगर ईंधन की कीमतों के साथ-साथ ब्याज दरों में गिरावट होती है तो लाभ निश्चित तौर पर बढ़ना चाहिए। तीसरा निष्कर्ष यह है कि मांग घटने से पावर ट्रेडिंग के क्षेत्र में अधिक विकास होना सुनिश्चित होगा। इसलिए पावर ट्रेडर निवेश के अच्छे लक्ष्य बन रहे हैं।
चौथा निष्कर्ष यह है कि गैर-पारंपरिक ऊर्जा कम प्रतिस्पर्ध्दी होने के कारण थोड़ा दबाव में रहेगा क्योंकि पारंपरिक ईंधन सस्ता है। सभी निष्कर्ष वायदा और ऑप्श कीमतों के आधार पर प्राप्त किए गए हैं।
अगले दो वर्षों तक कच्चे तेल की कीमतें 45 डॉलर प्रति बैरल से कम होने के अनुमानों के साथ उच्च लाभोत्पादकता का अनुमान किया गया है। अगर ये सब सही हैं तो दांव लगाया जा सकता है। 

एक बात का ख्याल रखना चाहिए कि कीमतों का यह मॉडल कच्चे तेल की कीमतों की संभावनाओं पर आधारित हैं और बीते दिनों में से गलत साबित हुए हैं।

Advertisement
First Published - February 22, 2009 | 9:28 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement