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खरा है सोने में निवेश

Last Updated- December 10, 2022 | 6:38 PM IST

सेंसेक्स पर तमाम कंपनियों के शेयरों के भाव जहां लुढ़क रहे हैं, वहीं सोने की कीमतों में तेजी से इजाफा हो रहा है। हाल में सोने की कीमत सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंच गई और बाजार में 10 ग्राम सोने की कीमत 15,745 रुपये पर पहुंच गई।
हालांकि जब इसकी कीमतों में थोड़ी सी गिरावट आई तो दुनियाभर के निवेशक सोने की खरीदारी में जुट गए। निवेशक सोना आधारित सिक्योरिटी और गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों (ईटीएफ) में भारी निवेश करने लगे। भारत की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहां भी निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मान उसमें पैसा लगा रहे हैं।
गोल्ड ईटीएफ, जिसकी शुरुआत पांच साल पहले अमेरिका में हुई थी, उसका कारोबार कितना बढ़ गया है, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतने कम समय में इस फंड की परिसंपत्तियां करीब 40 अरब डॉलर हो गई और करीब 1,300 टन सोना फंड के पास मौजूद है।
हालांकि सही मायने में देखें, तो इस मूल्यवान धातु में निवेश से न तो लाभांश मिलता है और न ही शेयर की तरह इसमें रिटर्न का लाभ होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसमें क्या विशेषता है, जिससे लोग इस कीमती धातु में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं?
दरअसल, सोने में निवेश करने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आपको किस तरह का रिटर्न चाहिए? इस बारे में हमने कमोडिटी विशेषज्ञ, फंड मैनेजर और निवेश सलाहकारों से बात की। आइए जानते हैं, सोन में निवेश के प्रति क्या है उनका नजरिया :
सोने में निवेश की पृष्ठभूमि
सोने की कीमतों पर राजनीतिक, आर्थिक, मुद्रास्फीतिक, मांग और आपूर्ति के साथ-साथ डॉलर की कीमतों में उतार-चढ़ाव और शेयर बाजार का त्वरित असर पड़ता है। 1970 के दशक में तेल संकट और 1980 के दशक में अफगानिस्तान की समस्या को देखें, तो सोने की कीमतों में उस दौरान तेजी दर्ज की गई।
पिछले साल की बात करें, तो बड़े-बड़े निवेश बैंक के धराशायी होने की खबरों से सोने की कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ। उदाहरण के तौर पर देखें, तो मार्च 2008 में जब बेयर स्टन्स धराशायी हुआ, तो सोना 1,023 डॉलर प्रति औंस (31 ग्राम) पर पहुंच गया था, जो उस समय सोने की सर्वाधिक कीमत थी।
मौजूदा साल की बात करें, तो मंदी और शेयरों की बिक्री में आई तेजी ने सोने के भाव बढ़ा दिए और यह औसतन 900 डॉलर प्रति औंस के इर्द-गिर्द घूमता रहा। महंगाई के समय में भी सोना बेहतर रिटर्न वाला निवेश साबित हुआ है। मुद्रास्फीति जब अपने चरम पर थी, तो सभी शेयरों के भाव धूल फांकते नजर आ रहे थे, लेकिन सोने ने निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिया। यही वजह है कि सोना को सुरक्षित निवेश माना जाता है।
मौजूदा समय में महंगाई पर काबू पाने के लिए सरकार की ओर से बाजार में तरलता बढ़ाने के हर संभव उपाय किए गए और पैसे को पानी की तरह बहाया गया। हालांकि इससे स्थिति में सुधार होता तो नहीं दिख रहा है, बल्कि सरकार अगर और रकम बाजार में झोकेगी, तो संभव है कहीं रुपये की कीमतों में गिरावट (डेप्रिशिएसन) न आ जाए। लेकिन सोने के साथ ऐसी बात नहीं है।
सोने का भंडार सीमित है और अचानक उसकी आपूर्ति बढ़ाई नहीं जा सकती है,  जिससे मुद्रास्फीति के समय इसे हेज फंड के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। दूसरी ओर डॉलर के कमजोर होने से सोने की कीमतों में इजाफा होता है। हालांकि अभी दोनों की मांग बढ़ रही है और उसमें तेजी का रुख बना हुआ है।
सुरक्षित निवेश
एनसीडीईएक्स के अर्थशास्त्री एम.एस. गोखले का कहना है कि 1 नवंबर, 2008 से सोने की कीमतों में जहां 33 फीसदी का उछाल आया है, वहीं यूरो और रुपये के मुकाबले में डॉलर की कीमतों में भी इजाफा हुआ है। अन्य देशों की मुद्राओं में गिरावट आने से डॉलर अभी और मजबूत हो सकता है।
अमेरिका में अच्छा फंडामेंटल्स नहीं होने और वित्तीय घाटा बढ़ने की वजह से संस्थागत निवेशक डॉलर की खरीदारी में जुटे हैं। उनका मानना है कि कमजोर होती जा रही मुद्राओं को देखते हुए डॉलर की खरीदारी बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डॉलर और सोना, दोनों की कीमतों में इजाफा होने की वजह जहां मंदी है, वहीं कुछ लोग इसे तात्कालिक प्रभाव भी मान रहे हैं। रेलीगेयर कमोडिटी के अध्यक्ष जयंत मांगलिक का कहना है कि सोना और डॉलर का संबंध जल्द ही अपने पुराने रास्ते पर आ जाएगा।
सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयास और निवेश से इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था पटरी पर आने की संभावना है। सोने की कीमतों में तेजी के बारे में उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ ही इसमें गिरावट का रुख आ सकता है और इक्विटी बाजार एकबार फिर अपनी पुरानी रंगत में लौट सकता है।
हालांकि मौजूदा समय में सोने की कीमतों में इजाफा न तो डॉलर की वजह से हो रहा है और न ही इक्विटी बाजार के कमजोर रुख के चलते। दरअसल, निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश के तौर पर देख रहे हैं। यही वजह है कि सोने की मांग तेजी से बढ़ रही है।
सोने की मांग
जहां तक भारत की बात है, तो यहां सोने की मांग आभूषणों की खपत पर निर्भर है। दरअसल, दुनिया के कुल सोने की खपत में से दो-तिहाई खपत भारत में होती है। हालांकि पिछले एक साल के दौरान इस रुख में तेजी से बदलाव आया है। और गहनों की बाजय सोने में निवेश बढ़ा है।
वर्ष 2007 में जहां 68 फीसदी सोने की खपत आभूषणों के लिए हुई, वहीं निवेश के लिए 19 फीसदी सोने की खपत हुई। लेकिन वर्ष 2008 में निवेश पहलू पर जोर रहा और इसमें तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2008 की अंतिम दो तिमाहियों में सोने की कुल खपत में निवेश का हिस्सा करीब 64 फीसदी रहा और निवेशकों ने करीब 1,000 टन सोने की खरीदारी की।
मौजूदा समय में सोने में करीब 30 फीसदी निवेश किया जा रहा है। सोने के सिक्के और बार की मांग में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। उल्लेखनीय है कि ऐसी खरीदारी को खुदरा खपत के
तौर पर देखा जाता है। एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की बात करें, तो इसकी मांग भी बढ़ी है।
भारत की बात करें, तो ईटीएफ में यहां जहां पांच टन सोने की खपत है, वहीं न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध एसपीडीआर के सोने के भंडार में एक माह के दौरान 14 फीसदी का उछाल आया है और यह 1,000 टन पर पहुंच गया है।
निवेश का यह ट्रेंड जारी रहेगा?
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के धर्मेश कहते हैं कि वैकल्पिक निवेश के अभाव में लोग ईटीएफ में भारी पैमाने पर निवेश कर रहे हैं। हालांकि भारत में ऐसी बात नहीं है। गोखले कहते हैं कि ईटीएफ भारत के लिए बिलकुल नया निवेश का साधन है।
ऐसे में कम से कम दो साल के बाद ही इसमें निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ सकती है, जब उन्हें लगेगा कि ईटीएफ में निवेश से उन्हें बेहतर रिटर्न मिल सकता है। जहां तक मांग में कमी की बात है, तो सोने की कीमतों में तेजी से इजाफा होने की वजह से मांग में कमी देखी जा रही है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अक्षय तृतीया (इस दिन लोग सोना खरीदना शुभ मानते हैं) के दौरान, यानी अप्रैल में सोने की मांग में तेजी इसे इजाफा होने की उम्मीद है। उसके बाद इसमं  गिरावट की उम्मीद है। जानकारों का कहना है कि सितंबर के अंत तक (शादी-ब्याह का मौसम) शुरू होने पर सोने का भाव 1,100 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच सकता है। हालांकि मांग में अगर तेजी से इजाफा नहीं हुआ, तो कीमतों में गिरावट आ सकती है।
सीमित आपूर्ति
मौजूदा समय में सोने की कोई नई खनन केंद्र का पता नहीं लगाया जा सका है। यही नहीं, 1990 के दशक में जब सोने की कीमतों में गिरावट का रुख था, तब 2002 तक खनन और उत्पादन में कमी लाई गई थी।
ऊर्जा और श्रमिकों की किल्लत के चलते दक्षिण अफ्रीका (तीसरा सबसे बड़ा सोना उत्पादक देश), ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से सोने की आपूर्ति में लगातार तीसरे साल, यानी वर्ष 2008 में भी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिका स्थित मेटल कंसल्टेंट जीएफएमएस का कहना है कि वर्ष 2008 में सोने की आपूर्ति में करीब 4 फीसदी की कमी आई, यानी करीब 2,385 टन सोने की आपूर्ति कम हुई, जो 13 साल में सबसे कम सोने की आपूर्ति है।
यही नहीं, सोने की कीमतों में इजाफा होने की उम्मीद में उत्पादकों ने वर्ष 2008 में करीब 346 टन सोना, यानी कुल उत्पादन का करीब 14.5 फीसदी अपने पास हेज कर रख लिया। सोने का दूसरा स्रोत, जो सरकारी गोल्ड होल्डिंग्स है, उसकी आपूर्ति में भी करीब 42 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। दरअसल, मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार सोने को स्टॉक कर रख रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कम आपूर्ति की वजह से वर्ष 2008 में सोने की कीमतों में 13 फीसदी की तेजी आई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सोने की कीमतों में वर्ष 2009 में भी तेजी का रुख बना रहेगा। उनका तर्क है कि उत्पादन मंं गिरावट और सरकार की ओर से सोने की बिक्री नहीं होने से इसकी कीमतों में उछाल आना तय है।
किस करवट बैठेगी कीमत?
मौजूदा हालात को देखते हुए सोने की कीमतें किस करवट बैठेगी? पूछने पर विशेषज्ञों ने बताया कि पिछले तीन माह से सोने की कीमतों में जिस तरह की तेजी देखी गई है, आने वाले समय में उसमें थोड़ी नरमी आ सकती है।
कार्वी कमोडिटी के रिसर्च हेड हरीश गलीपल्लई  का कहना है कि सोने की कीमतों में थोड़ी गिरावट आने की संभावना और निकट भविष्य में इसकी कीमत 930 डॉलर से 850 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकती है। हालांकि मध्यावधि में देखें, तो वैश्विक हालात की वजह से निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश के तौर पर देख सकते हैं, जिससे कीमतों पर दवाब बना रह सकता है।
मांगलिक का कहना है कि वर्ष 2008 में सोने में करीब 26 फीसदी रिटर्न दिया है और मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि पूरे साल सोने से 20 फीसदी का रिटर्न मिल सकता है। हालांकि पिछले साल सोने ने बेहतर रिटर्न दिया है, लेकिन आने वाले समय में सोने का रिटर्न इक्विटी मार्केट के प्रदर्शन, रियल एस्टेट और अन्य निवेश के प्रदर्शन के रुख पर निर्भर करेगा।
कौन बेहतर : सिक्का, बार या ईटीएफ?
विशेषज्ञों का कहना है कि सोना में निवेश सुरक्षित होता है, लेकिन इसमें बहुत ज्यादा रिटर्न नहीं मिलता। बावजूद इसके निवेशक के पोर्टफोलियो में कुल निवेश में से करीब 5-15 फीसदी निवेश सोने में किया जाना चाहिए। एसजी प्राइवेट बैंकिंग की कार्यकारी निदेशक निपुण मेहता का कहना है कि कम जोखिम वाले इस निवेश को पोर्टफोलियों में शामिल करना चाहिए।
उनके मुताबिक, इसमें निवेश से तुरंत  ले ही बेहतर रिटर्न नहीं मिलता हो, लेकिन बाद में इससे अच्छा रिटर्न मिल सकता है। फाइनैंशियल प्लानर गौरव माशरूवाला का कहना है कि जब डेट फंड ऊपर जाता है, जो इक्विटी में गिरावट आती है, लेकिन सोने का इससे कोई संबंध नहीं है। हां, यह संतुलन का काम जरूर करता है। यही वजह है कि निवेशक को अपने पोर्टफोलियों में सोना जरूर शामिल करना चाहिए।
कुल निवेश में इसकी हिस्सेदारी करीब 8-10 फीसदी होनी चाहिए। जहां तक अन्य कमोडिटी की बात है, तो उसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उसका खाने में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन सोने की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखी जाती।
सोने को बहुत दिनों तक आसानी से स्टॉक कर रखा जा सकता है, लेकिन क्रूड या अन्य खनन उत्पादों को स्टॉक कर रखने में बहुत ज्यादा फायदा होता नहीं दिखता है। अगर आप अपने निवेश में कम जोखिम, लेकिन स्थायी रिटर्न  चाहते हैं, तो निवेशकों को सोने में जरूर निवेश करना चाहिए। सोने में निवेश के विभिन्न उपागमों के बारे में आइए जानें :
एक्सचेंज ट्रेडेड फंड
ईटीएफ को देश में शुरू हुए दो साल ही हुए हैं और सोने में निवेश का यह अपने तरह का पहला फंड है। इसका कारोबार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में होता है। इसे खरीदने के एवज में खरीदार को अपने स्टॉक ब्रोकर को ब्रोकरेज देना पड़ता है। इसका कारोबार डी-मैट अकाउंट के जरिए किया जाता है। इसके लिए सालाना एक फीसदी प्रबंधन शुल्क भी वसूला जाता है।
यह इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में होता है, जिससे स्टोर करने की समस्या भी नहीं होती है। अगर निवेशक इसे कारोबारी दिन के ऊंची कीमत पर बेचता है, तो अच्छा रिटर्न भी प्राप्त कर सकता है। इस पर कर कितना लगता है? इस बारे में मशरूवाला कहते हैं कि गोल्ड ईटीएफ में डेट फंड की तरह ही कर का भुगतान करना पड़ता है।
इसमें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स के तौर पर 10 फीसदी कर चुकाना होता है, जिसमें इंडेक्सेशन चार्ज शामिल नहीं होता है। इंडेक्सशन चार्ज के साथ 20 फीसदी का कर चुकाना होता है। शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स में मामूली कर चुकाना पड़ता है।
गोल्ड बेस्ड फंड
एआईजी और ब्लैक रॉक के अंतरराष्ट्रीय म्युचुअल फंड्स स्कीम के तहत दो गोल्ड बेस्ड फंड्स का कारोबार किया जा रहा है।
डीएसपी ब्लैकरॉक म्युचुअल फंड के ईवीपी के प्रमुख (रिस्क मैनेजमेंट ऐंड बिजनेस डेवलपमेंट) डीएसपी ब्लैकरॉक म्युचुअल फंड के पंकज शर्मा का कहना है कि हमारे फंड का प्रबंधन ब्लैकरॉक गोल्ड फंड के तहत किया जाता है, जिसका प्रबंधन लंदन स्थित टीम करती है।
इस फंड को 1993 में लॉन्च किया गया था। यह बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से सबसे बड़ा गोल्ड इक्विटी फंड है। इसकी कुल बाजार हिस्सेदारी करीब 31 फीसदी है। इस फंड में दुनियाभर की कंपनियां निवेश कर रही हैं। इसमें ईटीएफ की तुलना में ज्यादा रिटर्न और जोखिम है।
सोने की वास्तविक खरीदारी
इसमें सिक्के, बार और आभूषण आते हैं। ज्यादातर निवेशक इसी प्रारूप में निवेश करना पसंद करते हैं। यही वजह है कि सालाना करीब 400 से 800 टन सोने का आयात करना पड़ता है। जबकि ईटीएफ का कारोबार 2,600 करोड़ रुपये का ही है।
स्वर्ण आभूषण का बाजार असंगठित है, जिसमें गुणवत्ता की चिंता हो सकती है, लेकिन प्रमाणिक हॉलमार्क सोने की खरीदारी बैंक, डाकघर और कुछ संगठित रिटेलरों से की जा सकती है। कर आदि के बाद इसकी कीमत बाजार के बंद भाव से 10-20 फीसदी ज्यादा होती है।
इसे बेचने पर भी अधिक कर चुकाना पड़ता है। लेकिन लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स इस मामले में तीन साल बाद लगता है। जो 20 फीसदी की दर से देना होता है। जो लोग सोने को अपने पास रखना चाहते हैं, उनके लिए इस तरह का निवेश बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
निवेश करते समय इन बातों का रखें खयाल
सोने की कीमतें जब आसमान छूने लगती हैं, तब निवेशकों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जो इसके भाव गिरा सकती हैं। रेलीगेयर कमोडिटीज के अध्यक्ष जयंत मांगलिक बता रहे हैं कि किन कारणों से सोने की कीमतों पर पड़ सकता है असर।
सोने में तेजी
निवेश के अन्य विकल्पों के अभाव में सोने को बेहतर निवेश माना जाता है और इसकी वजह से सोने की कीमतें भी तेजी से चढ़ती हैं।
डॉलर में लगातार मजबूती की वजह से भी सोने की कीमतों में इजाफा हो सकता है।
मुद्रास्फीति काबू में करने के लिए सरकार की ओर से जब तरलता बढ़ाने के लिए बाजार में नकदी झोंकी जाती है। वैसे, समय में सोने में हेज के तौर पर निवेश किया जा सकता है।
गोल्ड बेस्ड फंड की आसान उपलब्धता की वजह से भी इस तरह का निवेश लोकप्रिय हो रहा है।
सोने की मांग में अगर तेजी आती है, तो इसकी कीमतें भी बढ़ने लगती हैं।
कुछ जोखिम भी
इक्विटी बाजार में सुधार आने के साथ ही सोने की कीमतों में गिरावट का रुख देखा जाए, तो निवेशक को चकित होने की जरूरत नहीं है।
सरकार की ओर से मंदी को मात देने के लिए उठाए जा रहे कदम सोने में निवेश को अनाकर्षित बना सकता है।
रिजर्व बैंक भी मंदी के दौर में बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ा सकता है। इससे बाजार में तेजी आने की संभावना है, जिससे सोने में निवेश पर असर पड़ सकता है।
उत्पादन स्थिर रहने और मांग में आ रही गिरावट के कारण सोने की कीमतों में गिरावट आ सकती है।
सोने के आभूषणों की मांग भारत में तेजी से कम हो रही है,जबकि दुनिया भर में यह सबसे बड़ा उपभोक्ता है। ऐसे में मांग में कमी का असर लंबे समय में देखा जा सकता है।

First Published - March 2, 2009 | 7:43 PM IST

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