पंजाब में डीजल इंजन पम्प सेट निर्माता और निर्यातक अब वैश्विक मंदी का असर महसूस करने लगे हैं। इनमें से ज्यादातर निर्माण इकाइयां लघु एवं मझोले उद्यम (एसएमई) सेगमेंट में हैं।
अक्टूबर-नवंबर की अवधि में यह उद्योग पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 30 फीसदी की निर्यात गिरावट का गवाह रहा। निर्यातकों को इस वित्तीय वर्ष में निर्यात में और गिरावट आने का भय सता रहा है।
पंजाब चैम्बर ऑफ स्माल एक्सपोर्टर्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ए. के. कोहली ने कहा कि इस्पात की बढ़ती कीमतों की वजह से इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में निर्यातकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। निर्यातकों को अपने निर्यात ठेकों को पूरा करने में घाटा उठाना पड़ा।
दूसरी तिमाही बाजारों के लिए स्थिर बनी रही, लेकिन विश्व भर के बाजारों में अचानक आए संकट की वजह से इस्पात और अन्य धातुओं की कीमतों में तकरीबन 30 फीसदी तक की गिरावट आ गई।
कोहली ने कहा, ‘इस्पात की कीमतों में गिरावट के बीच उद्योग पर दबाव बढ़ गया और अक्टूबर-नवंबर 2008 के दौरान इस मंदी का असर इसके खराब परिणामों में दिखने लगा।’ वैश्विक रूप से खरीदार नए ऑर्डर नहीं दे रहे हैं। नवंबर में सिर्फ 10-20 फीसदी लंबित ठेकों को ही पूरा किया जा सका और वह भी विशेष छूट के साथ।
मांग में आई भारी कमी की वजह से एक भी इकाई अपना कामकाज आसानी से जारी रखने में सक्षम नहीं है। फिलहाल पंजाब में 12 एक्सपोर्ट हाउस हैं।
राज्य में 3500 से अधिक इकाइयां हैं जो इन एक्सपोर्ट हाउसों को डीजल इंजन के कलपुर्जों का निर्माण और आपूर्ति करती हैं।
सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इन डीजल इंजनों को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों को निर्यात किया जाता है।
इस उद्योग से कुल निर्यात 500 करोड़ रुपये का है जिसमें पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश का बड़ा योगदान है। प्रमुख एक्सपोर्ट हाउसों की बदौलत पंजाब का इसमें लगभग 150 करोड़ रुपये का योगदान है।
पंजाब में फगवाड़ा, लुधियाना, भटिंडा और अमृतसर प्रमुख निर्माण केंद्र हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि अब उन्हें खरीदारों से नए ऑर्डर प्राप्त नहीं हो रहे हैं। इस वजह से इस व्यवसाय में ऋण चक्र में बाधा पहुंच रही है। यह उद्योग अकुशल श्रमिकों, खासकर ग्रामीण इलाकों के लोगों को बड़ी तादाद में रोजगार मुहैया कराता है।
डीजल इंजन पम्प सेटों के लिए कलपुर्जा का निर्माण करने वाली प्रत्येक लघु इकाई 30 से अधिक श्रमिकों को रोजगार मुहैया कराती है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अगर मौजूदा स्थिति 2008 के बाद भी जारी रही तो इस क्षेत्र में 6,000 से अधिक औद्योगिक श्रमिक रोजगार से वंचित हो सकते हैं।
इस क्षेत्र को राहत दिए जाने के लिए उद्योगपति मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार लघु उद्योगों को निर्यात प्रॉफिट्स यूएस एचएचसी पर 100 फीसदी छूट, सेवा कर से 100 फीसदी छूट, टीडीएस और निर्यात से जुड़े अन्य छोटे करों में छूट जैसी राहत मुहैया कराए।
निर्यातक बैंकों से सस्ते निर्यात ऋण की मांग कर रहे हैं। निर्यातक चाहते हैं कि बैंक उन्हें शिपमेंट पूर्व और शिपमेंट के बाद 360 दिनों तक के लिए 5 फीसदी की दर पर ऋण मुहैया कराएं।