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तेल की कीमतों में लगी आग: होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से भारत के आयात बिल में भारी उछाल का डर

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट की बंदी से भारत का तेल आयात बिल $64 अरब तक बढ़ सकता है, जिससे महंगाई और चालू खाता घाटा बढ़ने का खतरा है

Last Updated- March 15, 2026 | 10:34 PM IST
crude oil
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

कच्चे तेल के वैश्विक दाम बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत के ऊर्जा आयात बिल में जबरदस्त उछाल का खतरा मंडरा रहा है। पश्चिम एशिया युद्ध का तीसरा सप्ताह शुरू हो गया है और तत्काल तनाव कम होने का कोई संकेत नजर नहीं आ रहा है।  

भारत सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर जैसे प्रमुख खाड़ी आपूर्तिकर्ताओं से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) खरीदता है। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के जवाब में होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है। इससे इन देशों से भारत को आने वाली एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति बाधित हो गई है।

भारत 40 प्रतिशत कच्चे तेल, 90 प्रतिशत एलपीजी का और 50 प्रतिशत एलएनजी का आयात होर्मूज स्ट्रेट से करता है। ईरान और ओमान के बीच महत्त्वपूर्ण होर्मूज स्ट्रेट है। लिहाजा इस क्षेत्र में तनाव से देश को तेल की आपूर्ति को अत्यधिक जोखिम बढ़ जाता है और इस महत्त्वपूर्ण ऊर्जा की आपूर्ति की आपूर्ति बाधित हो सकती है।  इसके अलावा ऊर्जा की बढ़ती कीमतें देश के आयात बिल को और बढ़ा देती हैं। इसका कारण यह है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत, एलपीजी की मांग का 60 प्रतिशत और एलएनजी की लगभग आधी जरूरतों के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भर है।

दरअसल वैश्विक तेल की कीमतों में सोमवार को और उछाल आने की आशंका है। इसका कारण यह है कि अमेरिका ने ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र, खारग द्वीप पर हमला किया है। इससे ईरान अपने लगभग सभी कच्चे तेल का निर्यात करता है। बेंचमार्क ब्रेंट शुक्रवार को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद हुआ जबकि संघर्ष शुरू होने से पहले यह लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल था।

एसऐंडपी ग्लोबल एनर्जी के उपाध्यक्ष व कच्चे तेल अनुसंधान के वैश्विक प्रमुख जिम बर्कहार्ड ने कहा, ‘एशिया के बाजार में दबाव का संकेत दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025 में एशिया में प्रोसेस कच्चे तेल का आधा हिस्सा मध्य पूर्व खाड़ी क्षेत्र से आया था। लेकिन यह प्रभाव फैल रहा है। होर्मुज स्ट्रेट जितने लंबे समय तक प्रभावी रूप से बंद रहेगा, उतना ही आपूर्ति, भंडार और कीमतों पर उतना ही बुरा प्रभाव पड़ेगा। यह प्रभाव केवल एशिया तक ही सीमित नहीं रहेगा।’ 

विशेषज्ञों के अनुसार यदि वित्त वर्ष 2027 में वैश्विक कच्चे तेल की औसत कीमत 110-115 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो भारत का शुद्ध तेल आयात बिल सालाना 56-64 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।

इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ‘औसत कच्चे तेल की कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से शुद्ध तेल आयात में 14-16 अरब डॉलर की वृद्धि होती है। यदि वित्त वर्ष 2027 में तेल की कीमत औसतन 110-115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है तो शुद्ध तेल आयात में लगभग 56-64 अरब डॉलर की वृद्धि होगी।’

उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की औसत कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि से चालू खाते का घाटा 30 से 40 आधार अंक तक बढ़ सकता है। हालांकि खुदरा ईंधन कीमतों में पूर्ण वृद्धि होने पर थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति 80-100 आधार अंक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति 40-60 आधार अंक तक बढ़ सकती है।

डीएसपी म्यूचुअल फंड के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं तो भारत का तेल व्यापार घाटा बढ़कर 220 अरब डॉलर हो सकता है। इससे चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा और रुपये के कमजोर होने की आशंका है।

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First Published - March 15, 2026 | 10:07 PM IST

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