पिछले कुछ दिनों में होर्मुज स्ट्रेट से होकर बहुत कम ईंधन टैंकर गुजरे हैं। उद्योग और जहाजों की आवाजाही से जुड़े आंकड़ों और कंपनियों के अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी सामने आई है। आशंका जताई जा रही है कि इससे तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और एलएनजी की किल्लत दूर करने की भारत की योजनाओं को झटका लगा है। दूसरी ओर वैकल्पिक ईंधन की आपूर्ति से देश के उपभोक्ताओं की जरूरत पूरी करने की योजना भी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। ये ईंधन भारत पहुंचने में कम से कम 20 से 45 दिन लग सकते हैं।
युद्ध के कारण दूसरे देशों के टैंकरों के लिए लगभग बंद हो चुके होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले जहाजों की मौजूदा स्थिति को दर्शाने वाले आंकड़ों से पता चलता है कि ईरान से माल उठाने के बाद कई जहाज चीन की तरफ मुड़ गए। हालांकि, ईरान की बिना औपचारिक अनुमति के कोई भी टैंकर किसी भी देश की तरफ रवाना नहीं हुआ।
ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध से पहले फरवरी के आखिरी दिन छह एलपीजी टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे जबकि 18, 20 और 21 मार्च को केवल एक-एक टैंकर गुजरा। ये तीनों टैंकर प्रोपेन और ब्यूटेन से भरे हुए थे जिनके मिश्रण से एलपीजी बनती है। केप्लर के अनुसार ये टैंकर ईरान से चीन की ओर जा रहे थे।
हालांकि, अच्छी बात यह है कि भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में एक सऊदी अरब से एलपीजी आपूर्ति के लिए होर्मुज स्ट्रेट से इतर करते हुए एक नया मार्ग खुल गया है। लगभग 46,000 टन क्षमता वाला एलपीजी टैंकर ‘ओशन गैस’ (जो देश की आधे दिन की ईंधन मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है) 19 मार्च को यानबू (सऊदी अरब) टर्मिनल से रसोई गैस से लदा पहला जहाज था जिसे 3 अप्रैल को दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह एनोर पर उतारा गया।
यानबू बंदरगाह से लाल सागर के रास्ते एशिया को तेल और एलपीजी की आपूर्ति के लिए माल का परिवहन बढ़ गया है जो होर्मुज के मुकाबले एक लंबा रास्ता है। अनुमान जताए जा रहे हैं कि यानबू से प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल की लोडिंग का अनुमान लगाया है मगर यह अभी भी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते होने वाली खेप के एक तिहाई से भी कम है। भारत ने पिछले सप्ताह कहा था कि होर्मुज से गुजरने वाले शेष 22 जहाजों में 5 में एलपीजी है और सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ बातचीत जारी है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के पास उपलब्ध केप्लर के आंकड़ों के अनुसार इनमें से पाइन गैस और जग वसंत ने सुबह में होर्मुज पार करना शुरू कर दिया जिसकी जानकारी उनमें लगे जीपीएस चालू होने के बाद मिली। उद्योग जगत के एक अधिकारी ने कहा कि अब उनमें लगे जीपीएस बंद हैं जिससे पता चलता है कि वे मार्च के अंत तक या 1 अप्रैल तक भारत पहुंच सकते हैं।
अधिकारी ने कहा कि ईरान को जहाजों के गुजरने की जानकारी देने के लिए जीपीएस चालू किए गए थे और होर्मुज पार करने के बाद हमलों से बचने के लिए जीपीएस बंद कर दिए गए। यह घटनाक्रम ईरान के साथ भारत की बातचीत में प्रगति का संकेत दे रहा है। नंदा देवी और शिवालिक इस महीने की शुरुआत में इस मार्ग से गुजरने वाले पहले दो एलपीजी टैंकर थे।
जहाजों की आवाजाही से जुड़े आंकड़ों से पता चलता है कि भारत को मार्च के पहले तीन हफ्तों में केवल 8,60,000 टन एलपीजी प्राप्त हुई है। इन आंकड़ों पर आधारित गणनाओं के अनुसार 31 मार्च तक भारत को अमेरिका से 2 लाख टन एलपीजी मिलने की संभावना है। एक वरिष्ठ रिफाइनिंग अधिकारी ने बताया कि लगभग 9 लाख टन की संयुक्त क्षमता वाले दो जहाज पश्चिम एशिया से आ रहे हैं और उनके इस महीने तक पहुंच सकते हैं। कुल मिलाकर, यह लगभग 1.20 लाख टन होगा जो फरवरी में प्राप्त 2.15 लाख टन से 10 लाख टन कम है। बिज़नेस स्टैंडर्ड की उद्योग डेटा पर आधारित गणनाओं के अनुसार यह भारत के 10 दिनों से अधिक के ईंधन उपयोग के बराबर है।
अप्रैल में एलपीजी की आवक मार्च से भी कम है क्योंकि वैश्विक स्तर पर एलपीजी की आपूर्ति अप्रैल में केवल केवल 3-4 दिनों की मांग ही पूरी कर पाएगी।
अमेरिका ने फरवरी में 3,46,000 टन एलपीजी भेजी है जिनमें जिनमें तीन जहाज 31 मार्च को और एक 1 अप्रैल तक आ सकते हैं। इस महीने 1,66,000 टन एलपीजी रवाना की गई जिसके अप्रैल में पहुंचने की संभावना है। अप्रैल में कुल आवक केवल 3,00,000 टन रह सकती है जबकि देश में औसतन 28 लाख टन की खपत होती है।
हाल में उत्पादन में बढ़ोतरी के बाद घरेलू उत्पादन हरेक महीने लगभग 12 लाख टन तक रह सकता है। इस भरपाई के बाद लगभग 16 लाख टन की आपूर्ति की और जरूरत होगी। आम तौर पर भारत अपने ईंधन का 60 प्रतिशत से अधिक आयात करता है जिसमें से 85 प्रतिशत से अधिक पश्चिम एशिया से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता है।
वरिष्ठ रिफाइनिंग अधिकारियों ने इस एलपीजी की कमी की आशंका पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अप्रैल के लिए अमेरिका से एलपीजी हासिल करने के सभी प्रयास जारी हैं मगर हाजिर बाजार में आपूर्ति की कमी प्रयासों में बाधा डाल रही है।
एक रिफाइनिंग अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी एलपीजी आम तौर पर सावधि अनुबंधों के तहत बुक की जाती है। गैसीय ईंधनों की तत्काल कमी के कारण कारखाने बंद होने की कगार पर हैं और घरों तक ईंधन की पहुंच बहुत कम हो गई है जिससे कालाबाजारी बढ़ रही है। मुन्ना चाय की दुकान चलाने वाले मुन्ना ने कहा कि एलपीजी की कमी के कारण उन्होंने चाय की कीमत 20 रुपये कर दी है।
मुन्ना ने कहा कि कालाबाजारी में एलपीजी सिलिंडर की कीमत दोगुनी होकर लगभग 4,600 रुपये हो गई है। दक्षिणी राज्यों के घरों में अभी भी रिफिल मिलने में देरी की शिकायत है जबकि तेल मंत्रालय ने हाल ही में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि बुकिंग के तीन दिनों के भीतर रिफिल पहुंचा दिए जाएंगे।
हालांकि, चेन्नई के उपभोक्ता एस विजयन और हैदराबाद की आई सृष्टि ने बताया कि बुकिंग के 10 दिन बाद भी उन्हें रिफिल नहीं मिले हैं। अमेरिका प्रोपेन और ब्यूटेन का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है और भारत के लिए एलपीजी का एकमात्र प्रमुख वैकल्पिक स्रोत है।
इस साल अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं ने वार्षिक अनुबंध के तहत प्रति माह कम से कम तीन खेप भेजना शुरू कर दिया है जो भारत के 2.3 करोड़ टन एलपीजी आयात का 10वां हिस्सा भी नहीं है।
आयात भारत की एलपीजी खपत के 235 दिनों की पूर्ति करते हैं जबकि घरेलू आपूर्ति का हिस्सा नगण्य है। जहाजों की आवाजाही के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ने जनवरी में 2,58,000 टन एलपीजी भेजी जो उस माह के कुल आयात का 11 प्रतिशत था। आखिरी खेप 15 मार्च को भारत पहुंची। इस खेप को भारत पहुंचने में 54 दिन लगे जबकि अन्य खेप 35 दिनों में पहुंच गईं।