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रूसी तेल पर कड़े प्रतिबंधों का असर: क्या सऊदी अरब फिर बनेगा भारत का नंबर वन सप्लायर?

रूस से आयात घटते ही भारत संतुलित रणनीति के तहत सऊदी और मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है, जबकि लागत और प्रतिबंध अब इसे एक नई दिशा दे रहे हैं

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- February 22, 2026 | 6:03 PM IST

भारत कच्चा तेल खरीदने में अब जल्दबाजी नहीं कर रहा। धीरे-धीरे सब कुछ संतुलित तरीके से बदल रहा है। अब कदम फिर से मध्य पूर्व के देशों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और इसमें सऊदी अरब सबसे आगे है। रूस से तेल अभी भी काफी आ रहा है, लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के कारण यह सब जियोपॉलिटिक्स और नियमों से तय हो रहा है। शिपिंग डेटा और मार्केट एक्सपर्ट्स का यही कहना है।

फरवरी में कुल आयात 8 फीसदी कम, रूस की सप्लाई ठंडी पड़ी

फरवरी के पहले 18 दिनों में भारत ने रोजाना औसतन 4.85 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया। जनवरी में यह आंकड़ा 5.25 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, यानी यह 8 फीसदी की गिरावट है। इसकी असल वजह है रूस से आने वाली खेपों में कमी। अमेरिका ने रूसी निर्यातकों पर सख्त प्रतिबंध लगाए और यूरोपीय संघ ने भी अपना 18वां सैंक्शन पैकेज लागू कर दिया।

शिपिंग ट्रैकिंग डेटा साफ दिखाता है कि दिसंबर 2025 में रूस से 1.28 मिलियन बैरल प्रतिदिन आ रहा था। जनवरी में यह घटकर 1.22 मिलियन रह गया। फरवरी की शुरुआत में तो और नीचे आकर 1.09 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुंच गया, यानी पिछले महीने से 10 फीसदी कम।

कप्लर के लीड एनालिस्ट सुमित रितोलिया बताते हैं कि फरवरी में रूसी तेल का आयात 1.0 से 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह सकता है। मार्च में यह और थोड़ा घटकर 8 लाख से 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक जा सकता है। लेकिन यह कोई अचानक रुकना नहीं है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद जब रूस ने डिस्काउंट पर तेल देना शुरू किया तो भारत ने खूब लिया। अब वह दौर स्थिर हो रहा है, लेकिन बिल्कुल खत्म नहीं हो रहा।

रितोलिया कहते हैं कि यह कम समय की स्थिरता है, 2025 के मध्य वाले पीक पर वापसी नहीं होगी। 2026 में रूस का हिस्सा 2024-25 के मुकाबले थोड़ा कम होकर एक निचले स्तर पर सेटल हो जाएगा क्योंकि व्यापारिक और नीतिगत दिक्कतें बढ़ रही हैं।

अमेरिका और भारत के बीच एक समझ बनी हुई है। इससे जरूरी बेसलोड रूसी तेल तो आता रहेगा लेकिन उससे ज्यादा बढ़ाने की इजाजत नहीं। आने वाले दिनों में उतार-चढ़ाव सैंक्शन रिस्क, जहाजों की उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स से आएगा, सिर्फ सस्ते दाम से नहीं।

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सऊदी अरब फिर टॉप सप्लायर, मध्य पूर्व भर रहा खाली जगह

रूस से थोड़ी कम होने वाली सप्लाई की जगह मध्य पूर्व का गल्फ क्षेत्र भर रहा है। सऊदी अरब से फरवरी में 1 मिलियन से 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन आने वाला है। यह नवंबर 2019 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। महीने के अभी तक के आंकड़े तो 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक जा रहे हैं, लेकिन मार्च की शुरुआत में थोड़ी कमी आने की उम्मीद है।

रितोलिया के मुताबिक मौजूदा रुझानों से सऊदी फरवरी में भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बन जाएगा। उसके बाद रूस और फिर इराक का नंबर आएगा। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने इराक को पछाड़कर भारत के कुल आयात का 40 फीसदी तक हिस्सा ले लिया था। अब सैंक्शन की वजह से वह हिस्सा कम हो रहा है।

सऊदी की बढ़ती खेपों से रूसी कमी को अच्छी तरह कवर किया जा रहा है। महीने के अंत तक सऊदी में कुछ मॉडरेशन आएगा और इराक व सऊदी दोनों करीब 1 से 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर रहेंगे। यह कई सालों का हाई लेवल है।

वाडिनार रिफाइनरी सिर्फ रूस पर निर्भर

गुजरात की वाडिनार रिफाइनरी इस पूरी कहानी में अहम है। इसमें रूस की कंपनी रोसनेफ्ट की बड़ी हिस्सेदारी है। यूरोपीय संघ ने मॉस्को से रिश्तों के चलते इस पर पाबंदियां लगा दीं, जिसके बाद दूसरे सप्लायर पीछे हट गए। अब यह रिफाइनरी लगभग पूरी तरह रूसी तेल पर निर्भर है।

रितोलिया का कहना है कि भारत उतना रूसी तेल ले सकता है जिससे रिफाइनरियां चलती रहें और देश में पेट्रोल-डीजल की जरूरत पूरी होती रहे, लेकिन इससे ज्यादा खरीद बढ़ाना ठीक नहीं होगा। इसलिए रूसी सप्लाई कम स्तर पर बनी रह सकती है, खासकर जब तक अमेरिका-भारत का ट्रेड समझौता पूरा नहीं हो जाता।

इसी दौरान भारत वेनेजुएला से थोड़ी अतिरिक्त खरीद कर रहा है और मध्य पूर्व के देश फिर से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। अब रूसी तेल की खरीद सिर्फ सस्ती कीमत पर नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और नियमों के हिसाब से तय हो रही है।

भारत अगर रूसी तेल पूरी तरह बंद कर दे तो उसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। रूसी तेल की क्वालिटी ऐसी है जो हमारी कई रिफाइनरियों के लिए ठीक बैठती है, सप्लाई भी भरोसेमंद रहती है और कीमत पर छूट भी मिलती है। इसलिए अगर रूस से खरीद कम होती है तो कच्चे तेल की लागत करीब 2–3 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है।

हालांकि वेनेजुएला का तेल सस्ता पड़ सकता है और इससे कंपनियों को थोड़ा फायदा मिल सकता है, लेकिन उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। वहां उत्पादन सीमित है, सप्लाई पहुंचाना आसान नहीं है और नियम-कानून से जुड़े जोखिम भी ज्यादा हैं। इसलिए वह रूस की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता, बस थोड़ा खर्च कम कराने में मदद कर सकता है अगर सप्लाई बढ़ती रहे।

(PTI के इनपुट के साथ)

First Published : February 22, 2026 | 5:48 PM IST