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2025 का कॉर्पोरेट ड्रामा: इंडिगो से जेएसडब्ल्यू तक संचालन की कसौटी

2025 में इंडिगो की उड़ान संकट, टाटा ट्रस्ट्स में सत्ता संघर्ष, विरासत विवाद और दिवालियापन मामलों ने भारतीय कॉर्पोरेट जगत के संचालन ढांचे की कसौटी पेश की।

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ईशिता आयान दत्त   
Last Updated- December 29, 2025 | 12:14 PM IST

वर्ष 2025 में कॉर्पोरेट जगत से जुड़े कई नाटकीय घटनाक्रम ने सुर्खियां बटोरीं। इस क्षेत्र में वर्ष की प्रमुख घटनाओं में इंडिगो एयरलाइन में आए संकट ने नियामकों और यात्रियों दोनों की परीक्षा ली। टाटा ट्रस्ट्स में सत्ता संघर्ष की एक अभूतपूर्व घटना हुई। सोना कॉमस्टार में उत्तराधिकार का विवाद अचानक सामने आया और जेएसडब्ल्यू स्टील-भूषण मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने भारत के दिवालियापन ढांचे को बचा लिया।

इंडिगो: संचालन का गहन परीक्षण

साल के आखिरी महीने में सबसे अप्रत्याशित उथल-पुथल विमानन के क्षेत्र में हुई  जब देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो, जो कुल उड़ानों का लगभग 65 प्रतिशत संचालित करती है, उसकी उड़ानों में विलंब से लेकर बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द कर दी गईं। इंडिगो ने महीने के पूर्वार्द्ध में देश के अधिकांश विमानन नेटवर्क को अस्त-व्यस्त कर दिया, क्योंकि 1 नवंबर से फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफडीटीएल) मानदंडों के तहत नई पायलट-रोस्टरिंग प्रणाली लागू हो गई थी।

इसके बाद तो मानो अफरा-तफरी मच गई। हवाई अड्डों पर अफरा-तफरी का माहौल छा गया। और एक कम लागत वाली एयरलाइन, जिसने समय की पाबंदी के दम पर अपनी पहचान बनाई थी, उसने कुछ ही दिनों में अपनी इस प्रतिष्ठा को धराशायी होते देखा।

रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा कि व्यवधानों का क्रेडिट पर नकारात्मक असर पड़ा। उसने इंडिगो द्वारा योजना, निगरानी और संसाधन प्रबंधन में हुई गंभीर चूक का हवाला दिया, क्योंकि नए नियमों की जानकारी उद्योग को एक साल से अधिक समय से थी। इससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर सवाल उठते हैं। एयरलाइन के लड़खड़ाने पर सरकार ने अभूतपूर्व हस्तक्षेप किया। विमानन नियामक संस्था, नागरिक विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने इंडिगो के दैनिक संचालन की आंतरिक निगरानी के लिए दो विशेष टीमें गठित कीं। इसके अलावा सरकार ने इंडिगो की दैनिक क्षमता में लगभग 10 प्रतिशत कटौती की।

सबसे बड़े व्यापारिक घराने में दरार

इंडिगो के सुर्खियों में आने से पहले, कॉर्पोरेट गवर्नेंस ने टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच एक और विवाद को जन्म दिया। टाटा ट्रस्ट्स 66 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ टाटा संस में सबसे बड़ा शेयरधारक है।

विवाद की जड़ 77 वर्षीय पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा ट्रस्ट्स की ओर से टाटा संस के बोर्ड में पुनर्नियुक्त करने का प्रस्ताव था। तीन ट्रस्टी-मेहली मिस्त्री, प्रमीत जवेरी और डेरियस खंबाटा- ने इस कदम के खिलाफ वोट दिया, जिसके चलते सिंह ने इस्तीफा दे दिया। दिवंगत रतन टाटा के करीबी सहयोगी और उनकी संपत्ति के निष्पादकों में से एक, मेहली मिस्त्री और उनके उत्तराधिकारी नोएल टाटा के बीच विवाद दो खेमों में बंट गया। उसके बाद कई तरह की चाल और जवाबी चाल चलने लगीं।

इस घटनाक्रम ने 2016 की उन घटनाओं की यादें ताजा कर दीं, जब एक सार्वजनिक विवाद के चलते अंततः साइरस मिस्त्री को टाटा संस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था। देश के सबसे बड़े समूह, जिसने विभिन्न क्षेत्रों में अरबों डॉलर के निवेश का वादा किया है, में आंतरिक कलह के चलते सरकार ने हस्तक्षेप किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने समूह के नेतृत्व से मुलाकात की और उन्हें स्थिरता बहाल करने का स्पष्ट संदेश दिया।

विलय एवं अधिग्रहण सलाहकार फर्म कैटलिस्ट एडवाइजर्स के पार्टनर विनय पारिख ने कहा, ‘सरकार का इसमें हस्तक्षेप करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमें यह याद रखना चाहिए कि टाटा ट्रस्ट्स एक सार्वजनिक ट्रस्ट है। इसके लाभार्थी केवल कुछ व्यक्ति नहीं हैं। कई मायनों में वे भारत की जनता हैं। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मूल रूप से एक राष्ट्रीय संपत्ति है।’ कुछ महीनों के भीतर, संतुलन निर्णायक रूप से बदल गया। मेहली मिस्त्री को टाटा ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया, जबकि नोएल टाटा के 32 वर्षीय बेटे नेविल टाटा, टाटा ट्रस्ट्स बोर्ड में शामिल हो गए।

विरासत का प्रश्न

कॉर्पोरेट बोर्डरूम में उत्तराधिकार और विरासत को लेकर होने वाले विवाद बार-बार सामने आते रहते हैं। यह एक ऐसा पैटर्न है जिससे भारतीय कंपनियां अच्छी तरह परिचित हैं। सोना कॉमस्टार के चेयरमैन संजय कपूर की असामयिक मृत्यु और उसके बाद घटी घटनाओं ने इस वास्तविकता को एक बार फिर स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया। ब्रिटेन के विंडसर में पोलो खेलते समय दिल का दौरा पड़ने से 53 वर्षीय कपूर का 12 जून, 2025 को निधन हो गया। इसके बाद एक कानूनी विवाद शुरू हुआ जिसने पारिवारिक विरासत, इसके केंद्र में स्थित ऑटो कंपोनेंट्स कारोबार और कथित तौर पर 30,000 करोड़ रुपये की संपत्ति के बंटवारे के सवालों को सामने ला दिया। इस विवाद में उनकी पत्नी प्रिया सचदेव कपूर, मां रानी कपूर और बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर से उनकी पिछली शादी से हुए दो बच्चे समायरा और कियान शामिल हैं। और, जैसा कि अक्सर होता है, विवाद वसीयत के मुद्दे पर केंद्रित हो गया है। विवाद के केंद्र में 21 मार्च की एक कथित वसीयत है, जिसमें संजय की सभी निजी संपत्ति प्रिया को देने की बात कही गई है। करिश्मा के बच्चों ने इसका विरोध किया है। रानी कपूर ने प्रिया के खिलाफ दायर याचिका में शामिल होते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें अपने बेटे की वसीयत से संबंधित किसी भी दस्तावेज की जानकारी नहीं दी गई थी। यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

दिवालियापन कानून के लिए एक परीक्षण

सर्वोच्च न्यायालय ने 2 मई को सज्जन जिंदल के नेतृत्व वाली जेएसडब्ल्यू स्टील की भूषण पावर ऐंड स्टील लिमिटेड (बीपीएसएल) के लिए 19,700 करोड़ रुपये की समाधान योजना को ‘अवैध’ घोषित कर दिया और दिवालियापन और दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत जेएसडब्ल्यू स्टील द्वारा कर्ज में डूबी कंपनी के अधिग्रहण के चार साल बाद भूषण पावर के परिसमापन का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने बीपीएसएल के पूर्व प्रवर्तकों और कुछ लेनदारों द्वारा दायर अपीलों पर फैसला सुनाते हुए जेएसडब्ल्यू स्टील, लेनदारों की समिति (सीओसी) और प्रक्रिया की देखरेख करने वाले समाधान पेशेवर के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कीं। इस फैसले से कॉरपोरेट जगत में हलचल मच गई, पर्यवेक्षकों ने इस फैसले को आईबीसी के लिए एक झटका माना, खासकर तब जब जेएसडब्ल्यू ने बीपीएसएल को पुनर्जीवित किया था और इसकी क्षमता बढ़ाने में निवेश किया था।

सभी पक्षों- जेएसडब्ल्यू स्टील, सीओसी और आरपी- ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं। अंततः 26 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना को बरकरार रखते हुए बीपीएसएल के पूर्व प्रवर्तकों और कुछ लेनदारों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को खारिज कर दिया। अपने पूर्व आदेश को याद करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जेएसडब्ल्यू द्वारा कंपनी में बड़ी रकम निवेश करने के बाद इस स्तर पर योजना को रद्द करने से ‘विनाशकारी परिणाम’ होंगे।

जेएसडब्ल्यू स्टील के संयुक्त प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी जयंत आचार्य ने कहा, ‘यह एक ऐतिहासिक फैसला था। इस फैसले ने सफल समाधान आवेदकों द्वारा कार्यान्वित समाधान योजनाओं की अंतिम वैधता को बरकरार रखते हुए आईबीसी की अखंडता और पवित्रता को संरक्षित किया है।’

इससे इस महीने की शुरुआत में जेएफई स्टील कॉर्पोरेशन के साथ एक समझौते का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। जेएफई, बीपीएसएल के इस्पात व्यवसाय में 15,750 करोड़ रुपये में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिग्रहण कर रही है, जिसका स्वामित्व और संचालन जेएसडब्ल्यू के साथ संयुक्त रूप से किया जाएगा।

सौदे, विलय और लिस्टिंग

2025 को आईपीओ के लिए एक शानदार वर्ष के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें 2007 के बाद पहली बार मेनबोर्ड लिस्टिंग की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर जाएगी। इनमें से प्रमुख कंपनियां थीं- टाटा कैपिटल, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, लेंसकार्ट सॉल्यूशंस, और ग्रोव की मूल कंपनी बिलियनब्रेन्स गैराज वेंचर्स और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज।

एमके ग्लोबल के इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यतिन सिंह के अनुसार, आईपीओ के माध्यम से विकास पूंजी की मांग मजबूत बनी हुई है, और आपूर्ति भी स्थिर है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कैलेंडर वर्ष के दौरान सूचीबद्ध आईपीओ के लिए औसत लाभ मामूली था-500 करोड़ रुपये से कम के इश्यू के लिए लगभग 3.5 प्रतिशत और 500 करोड़ रुपये से अधिक के इश्यू के लिए 17.5 प्रतिशत।

टाटा मोटर्स ने अपने यात्री वाहन (जैगुआर लैंड रोवर सहित) और वाणिज्यिक वाहन व्यवसायों का दो स्वतंत्र सूचीबद्ध संस्थाओं में विभाजन पूरा कर लिया है। आईटीसी होटल्स 1 जनवरी को सूचीबद्ध हुई।

विलय और अधिग्रहण के संदर्भ में ब्लूमबर्ग के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2025 में सौदों का मूल्य 107.2 अरब डॉलर था, जो वर्ष 2024 की तुलना में 2.29 प्रतिशत अधिक है। हालांकि, सौदों की संख्या 2024 में 3,193 की तुलना में 3,088 रही।

लेकिन जैसे-जैसे भारतीय कंपनियां विस्तार और महत्त्वाकांक्षा की ओर बढ़ रही हैं, उनके संचालन ढांचे के पहले से कहीं अधिक परीक्षा से गुजरने की संभावना है।

First Published : December 29, 2025 | 12:14 PM IST