मांग में कमी और क्षमता में इजाफे से परेशान सीमेंट निर्माता कंपनियों ने 10 फीसदी की विकास रफ्तार बरकरार रखने के लिए सरकार से कर ढांचे को किफायती बनाने की मांग की है।
बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए जरूरी भवन निर्माण सामग्रियों की बात की जाए तो सीमेंट अन्य भवन निर्माण सामग्रियों की तुलना में भारी-भरकम कर और अन्य सरकारी उपकर का योगदान देता है। यह उद्योग सरकार को सालाना लगभग 9000 करोड़ रुपये शुल्क के रूप में चुकाता है।
सीमेंट पर लगने वाला मूल्यवर्धित कर (वैट) भी 12.5 फीसदी है जो इस्पात पर महज 4 फीसदी है। इसी तरह इस्पात निर्माताओं द्वारा लौह अयस्क पर चुकाई जाने वाली रॉयल्टी 16 रुपये प्रति टन है, लेकिन यह उद्योग चूना पत्थर पर प्रति टन 45 रुपये की रॉयल्टी चुका रहा है।
वित्त मंत्रालय को सौंपे गए अपने बजट-पूर्व ज्ञापन (इसकी एक प्रति बिजनेस स्टैंडर्ड के पास उपलब्ध है) में उद्योग ने कहा है, ‘आवासीय और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को दरों में इस तरह की असमानताओं को दूर करने के लिए तुरंत कदम उठाना चाहिए।’
भारतीय सीमेंट उद्योग चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है। यह उद्योग मौजूदा उत्पाद शुल्क ढांचे को भी आसान बनाए जाने की मांग कर रहा है जो बेहद जटिल है।
मौजूदा समय में शुल्क के दो स्लैब हैं- 360 रुपये और 12.36 फीसदी। 360 रुपये प्रति टन, जब 50 किलोग्राम के बोरे के लिए एमआरपी 190 रुपये या इससे कम होता है। 12.36 फीसदी, जब एमआरपी 190 रुपये से अधिक होता है।
जब से सरकार की ओर से कोयला सुविधाओं में कमी की गई है, उद्योग ने 2007-08 में 2.7 करोड़ टन की अपनी खपत की तुलना में महज 1.4 करोड़ टन सीमेंट की आपूर्ति की। बाकी जरूरतें आयात, ई-ऑक्शन और खुले बाजार के जरिये पूरी की गईं।
उद्योग ने सरकार से कोयला और पेट कोक पर 5 फीसदी का उत्पाद शुल्क हटाए जाने की मांग की है। इस उद्योग की ओर से यह तर्क पेश किया जा रहा है कि जब तैयार उत्पादों (सीमेंट) पर उत्पाद शुल्क नहीं लगता है तो कच्चे माल को भी कर के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए।
उद्योग ने सरकार को सुझाव दिया कि सीमेंट निर्माण में इस्तेमाल होने वाले अन्य कच्चे पदार्थ जिप्सम पर भी 10 फीसदी का आयात शुल्क हटाया जाए। 20.51 करोड़ टन की मिश्रित क्षमता वाले इस उद्योग ने मिश्रित सीमेंट पर अधिक ध्यान देना शुरू किया है।