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न्यू लेबर कोड से बदलेगा सैलरी का गणित? अप्रेजल में पैकेज तो बढ़ेगा, पर हाथ में आने वाला पैसा घटेगा!

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एक्सपर्ट का मानना है कि कर्मचारियों को ऑन-पेपर हाइक तो अच्छी मिल सकती है, लेकिन उनके बैंक खाते में आने वाली मंथली सैलरी उतनी नहीं बढ़ेगी जितनी उन्होंने सोची होगी

Last Updated- June 26, 2026 | 5:27 PM IST
Rupee
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

इस साल जब आपके हाथ में अप्रेजल यानी सैलरी हाइक का लेटर आएगा, तो हो सकता है कि कागज पर बढ़ी हुई रकम को देखकर आपका दिल खुश हो जाए। लेकिन असली झटका तब लग सकता है जब महीने के आखिर में आपके बैंक खाते में आने वाली टेक-होम सैलरी उम्मीद से कम दिखेगी। अक्सर नौकरीपेशा लोग यह मानकर बैठते हैं कि अगर CTC में 10 या 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, तो इन-हैंड सैलरी भी उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। लेकिन इस बार गणित थोड़ा अलग हो सकता है।

टैक्स और कॉर्पोरेट मामलों के जानकार इसे एक बड़े बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। TaxSpanner के को-फाउंडर और CEO सुधीर कौशिक का कहना है कि कर्मचारियों को ऑन-पेपर हाइक तो अच्छी मिल सकती है, लेकिन उनके बैंक खाते में आने वाली मंथली सैलरी उतनी नहीं बढ़ेगी जितनी उन्होंने सोची होगी। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कंपनियों द्वारा अपने सैलरी स्ट्रक्चर को न्यू लेबर कोड के हिसाब से बदलना है।

क्यों कम हो जाएगी हाथ में आने वाली सैलरी?

न्यू लेबर कोड के आने से सैलरी के ढांचे में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सुधीर कौशिक समझाते हैं कि नए नियमों में ‘Wages’ यानी मजदूरी/सैलरी की परिभाषा को बिल्कुल नए सिरे से तय किया गया है। अब तक कंपनियां कर्मचारियों की CTC का एक बड़ा हिस्सा अलग-अलग भत्तों (Allowances) में बांट देती थीं, जिससे बेसिक सैलरी कम रहती थी। लेकिन न्यू लेबर कोड में भत्तों को एक तय सीमा से ज्यादा रखने की इजाजत नहीं होगी।

अगर किसी कर्मचारी के भत्ते इस तय सीमा को पार करते हैं, तो उस अतिरिक्त रकम को दोबारा उसकी बेसिक सैलरी में जोड़ दिया जाएगा। इसका सीधा असर यह होगा कि कर्मचारी की बेसिक पे बढ़ जाएगी। बेसिक पे बढ़ते ही PF की कटौती और ग्रेच्युटी के लिए कंपनी का प्रोविजन बढ़ जाएगा।

चूंकि PF का एक बड़ा हिस्सा आपकी सैलरी से कटता है, इसलिए हाइक के बावजूद आपकी इन-हैंड सैलरी का ग्राफ नीचे गिर सकता है। हालांकि, शॉर्ट-टर्म में यह भले ही जेब पर भारी लगे, लेकिन लॉन्ग-टर्म में इससे कर्मचारियों का रिटायरमेंट फंड और सोशल सिक्योरिटी मजबूत होगी।

हाई टैक्स स्लैब का खतरा: ₹10 लाख से ₹25 लाख वाले रहें सावधान

सैलरी बढ़ने का एक दूसरा पहलू टैक्स का गणित भी है। कई बार सैलरी में हुआ इजाफा आपको सीधे एक हाई टैक्स ब्रैकेट में धकेल देता है, जिससे बढ़े हुए पैसे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार के पास चला जाता है।

सुधीर कौशिक के मुताबिक, जिन कर्मचारियों की सालाना कमाई 10 लाख रुपये से 25 लाख रुपये के बीच है, उन्हें इस अप्रेजल सीजन में बहुत ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इस ब्रैकेट वाले लोगों को केवल अपनी हेडलाइन CTC (कुल पैकेज) को देखकर खुश नहीं होना चाहिए।

Also Read: Explainer: नौकरी और फ्रीलांसिंग दोनों से हुई कमाई? नोटिस से बचने के लिए समझ लें टैक्स के नियम

इस रेंज में आने वाले लोगों को सैलरी के साथ-साथ मिलने वाले बोनस, बैंक से मिलने वाले ब्याज, घर के किराए, डिविडेंड या कैपिटल गेन जैसी बाहरी कमाइयों पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि ये सब मिलकर आपकी टैक्स देनदारी को बढ़ा देते हैं। न्यू टैक्स रिजीम में चूंकि डिडक्शन्स (छूट) के विकल्प बहुत सीमित हैं, इसलिए टैक्स-एफिशिएंट सैलरी कंपोनेंट्स की भूमिका बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

टेक-होम सैलरी को कैसे रखा जा सकता है सुरक्षित

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर आप चाहते हैं कि टैक्स का बोझ आपकी बढ़ी हुई सैलरी को न खाए, तो आपको अपनी कंपनी के HR के साथ मिलकर सैलरी स्ट्रक्चर को थोड़ा स्मार्ट बनाना होगा। सुधीर कौशिक सलाह देते हैं कि कर्मचारियों को अपनी कंपनी में मिलने वाले फ्लेक्सी बेनिफिट्स का पूरा फायदा उठाना चाहिए।

कौशिक के मुताबिक, आप अपनी टेक-होम सैलरी को बचाने के लिए मील कूपन/कार्ड, टेलीकॉम रीइंबर्समेंट (फोन और इंटरनेट बिल), फ्यूल अलाउंस, कार लीज और मोबाइल/गैजेट लीजिंग जैसी सुविधाओं को अपने सैलरी स्ट्रक्चर का हिस्सा बना सकते हैं। इसके अलावा नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में निवेश भी एक बेहतरीन और टैक्स-एफिशिएंट जरिया है।

साथ ही कर्मचारियों को यह भी चेक करना चाहिए कि क्या उनकी कंपनी में वैधानिक न्यूनतम PF योगदान (Statutory Minimum PF Contribution) का विकल्प मौजूद है, क्योंकि आपसी सहमति से इसे चुनकर महीने की टेक-होम सैलरी को कुछ हद तक सुधारा जा सकता है।

अब ग्रॉस CTC नहीं, ‘रीयल टेक-होम’ पर टिका है फोकस

आने वाले समय में नौकरीपेशा लोगों का नजरिया पूरी तरह बदलने वाला है। अब लोग इस बात से प्रभावित नहीं होंगे कि उनका सालाना पैकेज या CTC कितना बड़ा है, बल्कि उनका पूरा ध्यान इस बात पर होगा कि हर महीने उनके बैंक अकाउंट में कितना पैसा क्रेडिट हो रहा है।

अगर लेबर कोड के एडजस्टमेंट, PF कटौती, ग्रेच्युटी और ऊंचे टैक्स स्लैब मिलकर आपकी 10 फीसदी की हाइक को सोख लेते हैं, तो वो हाइक कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। यही वजह है कि अब कॉरपोरेट जगत में हेडलाइन सैलरी हाइक के बजाय ‘रीयल टेक-होम ग्रोथ’ और लॉन्ग-टर्म फायदों की अहमियत बढ़ गई है। कर्मचारी अब किसी भी जॉब ऑफर या अप्रेजल को इस तराजू पर तौलेंगे कि उसमें टैक्स बचाने की कितनी गुंजाइश है और सैलरी स्ट्रक्चर कितना फ्लेक्सिबल है।

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First Published - June 26, 2026 | 5:27 PM IST

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