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महाराष्ट्र में भी लाभ का सौदा नहीं रहा गन्ना

Last Updated- December 07, 2022 | 7:45 AM IST

बेहतर मुनाफा मिलने की उम्मीद में किसानों द्वारा गन्ने की बजाए सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख करने से महाराष्ट्र में गन्ने के उत्पादन पर काफी बुरा असर पड़ा है।


अनुमान लगाया जा रहा है कि मौजूदा सीजन 2008-09 में गन्ने के उत्पादन में 23 फीसदी की गिरावट हो सकती है। महंगाई की समस्या से परेशान सरकार और उपभोक्ताओं के लिए गन्ने के उत्पादन में कमी होने का अनुमान काफी मुश्किलें पैदा कर सकती हैं क्योंकि पूरी गुंजाइश है कि इससे चीनी, गुड़ और खांडसारी की कीमतों में वृद्धि होगी।

तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते गन्ने की उपज में होने वाली इस कमी के चलते अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस साल चीनी का कुल उत्पादन घटकर 70 लाख टन तक रह जाएगा, जबकि पिछले साल (2007-08) राज्य में चीनी का कुल उत्पादन 91 लाख टन रहा था। यही नहीं गन्ने के रकबे में भी खासी कमी होने का आकलन किया गया है।

बताया जा रहा है कि इस साल राज्य के 9.5 लाख हेक्टेयर में गन्ने का उत्पादन हो सकता है पर पिछले साल यह रकबा 12 लाख हेक्टेयर तक था। जाहिर है, गन्ने के रकबे में 2.5 लाख हेक्टेयर की कमी चीनी उत्पादन के लिहाज से काफी चिंताजनक है। महाराष्ट्र स्टेट फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के चेयरमैन प्रकाश नाइकनवाड़े के अनुसार, राज्य में इस साल गन्ने के उत्पादन में गिरावट आने के पूरे आसार हैं।

पिछले साल के 8.4 करोड़ टन के मुकाबले इस साल इसका उत्पादन घटकर 6.65 करोड़ टन रह जाने का अनुमान है। हालांकि ये दूसरी बात है कि गन्ने की उत्पादकता में काफी सुधार आया है। पिछले साल एक हेक्टेयर में 70 टन गन्ने की पैदावार हुई थी जबकि 2006-07 के दौरान गन्ने की उत्पादकता केवल 63 टन प्रति हेक्टेयर थी। उत्पादकता में सुधार होने से चीनी के कुल उत्पादन पर पड़ने वाले असर के कुछ कम होने की बात जानकारों द्वारा कही जा रही है।

22 जून तक प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अब तक लक्ष्य से 30 फीसदी कम क्षेत्रों में गन्ने की रोपाई हुई है और यह केवल 7.7 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया है। पिछले साल अब तक हुए रोपाई से तुलना की जाए तो यह क्षेत्र लगभग आधा है। जानकारों के मुताबिक, सोयाबीन, मक्का और कपास में ज्यादा मुनाफा देख किसान गन्ना उपजाना छोड़ रहे हैं। इन फसलों की खासियत है कि इनकी खेती करने पर एक साथ कई फसलों को उगाया जा सकता है।

हालांकि मक्के में ऐसा संभव नहीं है पर उसकी उत्पादन अवधि काफी कम (लगभग 90 से 100 दिनों की) होने से एक साल में दो से तीन फसलों को आसानी से उगाया जा सकता है। उधर, गन्ने की फसल पूरे साल में केवल एक बार ही मिल पाती है। इस लिहाज से गन्ने की बनिस्बत दूसरे फसल ज्यादा लाभकारी साबित हो रहे हैं। राज्य के चीनी मिलों ने अब तक किसानों का बकाया नहीं चुकाया है।

बताया जा रहा है कि चीनी का बाजार मूल्य उत्पादन लागत के आसपास ही बैठ रहा है, जिससे उन्हें चीनी की बिक्री से पर्याप्त मुनाफा नहीं हो पा रहा है। फिलहाल चीनी का उत्पादन मूल्य 14.5 से 15 रुपये प्रति किलो के आसपास पड़ रहा है और बाजार में यह इससे कुछ ही ज्यादा मूल्य पर मिल रही हैं। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसियशन के समन्वयक राजेश अग्रवाल ने बताया कि पिछले साल महाराष्ट्र में गन्ने के लिए चीनी मिलों ने 811 रुपये प्रति टन के हिसाब से दाम चुकाए थे।

उनके मुताबिक, एक टन गन्ना जितने क्षेत्र में पैदा किए जाते हैं यदि उतने में सोया-गेहूं या सोया-कपास आदि पैदा किया जाए तो लगभग 1,200 रुपये  मिल जाते हैं। हालांकि द्वारिकेश शुगर के कंपनी सचिव बी. जे. माहेश्वरी का मानना है कि गन्ने की फसल के लिए मौजूदा साल तीन साल के न्यून उत्पादन दौर का आखिरी साल है। उम्मीद है कि  इस साल से इसमें फिर सुधार आने लगेगा। 

First Published - June 27, 2008 | 12:07 AM IST

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