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रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: लगातार सातवें दिन गिरावट के साथ 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुई भारतीय मुद्रा

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विदेशी फंडों की निकासी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार सातवें सत्र में टूटकर 96.53 के नए ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया

Last Updated- May 19, 2026 | 10:50 PM IST
Rupee vs Dollar
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बना हुआ है और आज लगातार सातवें सत्र में गिरावट के साथ यह नए निचले स्तर पर बंद हुआ। कच्चे तेल में तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने और विदेशी कोषों के लगातार बाहर निकले से रुपये पर दबाव दिख रहा है।

रुपया गिरावट के साथ 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। सोमवार को यह 96.36 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। कारोबार के दौरान रुपया 96.61 के निचले स्तर पर पहुंच गया था। 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2 आधार अंक चढ़कर 7.11 फीसदी पहुंच गई जो 2 साल का उच्च स्तर है। 5 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 5 आधार अंक घटकर 6.89 फीसदी रही। इस साल डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 7 फीसदी लुढ़क चुका है और ए​​शियाई मुद्राओं में इसका प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। प​श्चिम ए​शिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब 6 फीसदी नरम हुआ है।

संघर्ष शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड के दाम 50 फीसदी तक चढ़ गए हैं। सोमवार को ईरान ने अमेरिका के समक्ष लेबनान सहित सभी मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करने का प्रस्ताव रखा और ईरान के निकटवर्ती क्षेत्रों से अमेरिकी सेना की वापसी के साथ-साथ युद्ध से हुए नुकसान के लिए हर्जाने की भी मांग की। मगर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह इसी तरह के एक प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में इन कंपनियों का वेतन और पारिश्रमिक व्यय कुल आय का 11.3 फीसदी रहा जो कम से कम पिछली 21 तिमाहियों में सबसे कम है। इसकी तुलना में वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही में यह 11.7 फीसदी और वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में 11.8 फीसदी था। पिछले 5 वर्षों में कंपनियों की आय में वेतन का हिस्सा औसतन 12.1 फीसदी रहा है। इसी तरह कुल आय में ब्याज खर्च का हिस्सा चौथी तिमाही में घटकर 16.1  फीसदी रहा जो वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही में 17.6 फीसदी था। पिछले 5 वर्षों में यह अनुपात औसतन 16.1 फीसदी रहा है।

हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि कर्मचारी और ब्याज लागत में कमी का लाभ टिकाऊ नहीं हो सकता है क्योंकि उपभोक्ताओं की वास्तविक आय में संभावित गिरावट और बॉन्ड यील्ड में हालिया वृद्धि से मांग में बाधा आ सकती है। सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटी के शोध एवं इक्विटी रणनीति के सह-प्रमुख धनंजय सिन्हा ने कहा, लाभ मार्जिन में वृद्धि कंपनियों की लागत अनुकूलन रणनीति को दर्शाता है

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First Published - May 19, 2026 | 10:31 PM IST

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