देश की मजबूत आर्थिक बुनियाद की तुलना में रुपया कमजोर लग रहा है और अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार हालांकि कमजोर मुद्रा भारतीय निर्यात पर अमेरिका के अधिक टैरिफ के मुकाबले कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करती है और कच्चे तेल के नरम दामों के बीच महंगाई का सीमित जोखिम पैदा करती है, लेकिन यह निवेशकों के मनोबल को भी कम कर सकती है।
समीक्षा में कहा गया है कि इसके परिणामस्वरूप भारत में पूंजी लगाने के लिए निवेशकों में जो हिचकिचाहट है, उस पर करीब से ध्यान देने की जरूरत है।
रुपये ने साल 2025 में अपनी प्रतिस्पर्धी विदेशी मुद्राओं के बीच कमजोर प्रदर्शन किया। 1 अप्रैल, 2025 और 15 जनवरी, 2026 के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 5.4 प्रतिशत की गिरावट आई, जिससे यह जापानी येन के साथ सबसे ज्यादा गिरावट वाली मुद्राओं में शामिल हो गया, जिसमें 5.5 प्रतिशत की गिरावट आई।
समीक्षा में यह भी कहा गया है कि हालांकि मुद्रा में गिरावट से आयात की महंगाई का जोखिम पैदा होता है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण कमजोर वैश्विक कमोडिटी की कीमतों से इसका असर कम रहने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 27 के लिए भारत का महंगाई का दृष्टिकोण कम नरम रहने के आसार हैं जिससे कीमती धातुओं को छोड़कर समग्र महंगाई और मुख्य महंगाई दोनों ही वित्त वर्ष 26 की तुलना में अधिक रहने के आसार हैं। अगर अगले वित्त वर्ष में महंगाई बढ़ती है, तो यह आगे मौद्रिक राहत की गुंजाइश को सीमित कर देगी।
भारतीय केंद्रीय बैंक ने पिछले साल फरवरी से अब तक नरम मुद्रास्फीति की वजह से नीतिगत रीपो दर में 125 आधार अंक (बीपीएस) की कटौती की है। भारत ने प्रमुख ईएमडीई के बीच समग्र महंगाई में सबसे तेज गिरावट देखी है और महंगाई लगभग 1.8 प्रतिशत कम हुई है। दूसरी ओर औसत मुख्य महंगाई वित्त वर्ष 25 के 3.5 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में लगभग 4.3 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल 2024 के 3.19 प्रतिशत से बढ़कर दिसंबर 2025 में 4.62 प्रतिशत हो गई।
अलबत्ता इसकी मौजूदगी मुख्य रूप से सोने और चांदी की कीमतों में तेजी की बदौलत है। जब इन घटकों को हटा दिया जाता है, तो मुख्य महंगाई रफ्तार घटती हुई दिखाती है, जो मोटे तौर पर समग्र महंगाई में नरमी को दर्शाती है।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के नतीजे के संबंध में बाजार की अनिश्चितता के साथ-साथ भुगतान संतुलन घाटे के बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ा, जिससे इसका मूल्यह्रास हुआ।
इस बीच रुपये की एशियाई प्रतिस्पर्धी मुद्राओं में अपेक्षाकृत कम गिरावट देखी गई, जिसमें फिलिपींस की पेसो भी शामिल है, जिसमें 3.8 प्रतिशत तक की गिरावट आई तथा इंडोनेशिया के रुपया में उसी अवधि के दौरान 1.9 प्रतिशत तक की गिरावट आई।
दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में इस अवधि के दौरान मजबूती आई, जिन्हें व्यापार की अनुकूल गतिविधियों से मदद मिली। 1 अप्रैल, 2025 और 22 जनवरी, 2026 के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 6.5 प्रतिशत तक की गिरावट आई।