धातु और खनन क्षेत्र की दिग्गज समूह वेदांत रिसोर्सेज ऐतिहासिक पुनर्गठन के लिए तैयार है, जिसके तहत 18 अरब डॉलर का यह समूह चार मुख्य व्यवसायों में बंट जाएगा। साकेत कुमार, सुधीर पाल सिंह और असित रंजन मिश्र के साथ बातचीत में वेदांत के संस्थापक और चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने इस कवायद के पीछे की मंशा पर चर्चा की और बताया कि देश के खनन उद्योग को एक बड़े बदलाव की आवश्यकता क्यों है। संपादित अंश:
क्या आपको लगता है कि सही नीतियों को अपनाकर भारत पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उत्पन्न ऊर्जा संकट से बच सकता था?
मैं स्थिति का विश्लेषण नहीं करना चाहता। भारत में पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। हमें अमेरिकी कंपनियों की तरह अन्वेषण करना होगा। वहां बड़ी कंपनियां अन्वेषण पर निवेश करती हैं। सरकार समूची व्यवस्था को स्व-प्रमाणित बनाने पर ध्यान दे। यदि कंपनियां नियमों का पालन नहीं करती हैं तो जुर्माना लगाया जा सकता हे। आपके पास बंजर भूमि है, कोई व्यक्ति जमीन में छेद करना चाहता है और देखना चाहता है कि नीचे क्या है, उसे करने दें।
खनन क्षेत्र के लिए अनेक नीतियों के बजाय एक नीति होनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वायु गुणवत्ता, जल गुणवत्ता और मृदा गुणवत्ता के लिए कड़े मानदंड होने चाहिए। यदि कोई कंपनी इन मानदंडों का उल्लंघन करती है तो उसे दंडित किया जाना चाहिए।
वेदांत का विलय और रणनीतिक पुनर्गठन किया जा रहा है। क्या आप भरोसे से कह सकते हैं कि इससे समूह पर दोबारा वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा?
सच कहूं तो मैंने मुश्किल व्यवसाय बनाए हैं, चाहे वह तेल और गैस हो, तांबा, एल्युमीनियम, जस्ता या चांदी हो। भारत ने इनमें से कई का बड़े पैमाने पर उत्पादन कभी सोचा तक नहीं गया था। लेकिन किसी को अलग तरह से काम करना और जोखिम उठाना होगा।
हमारा पहला लक्ष्य गवर्नेंस और पारदर्शिता लाना है। अपने 40 साल के करियर में मैंने कभी भी किसी भुगतान में चूक नहीं की या बैंक ऋण चुकाने में विफल नहीं रहा। कभी-कभी आपके पास लिक्विडिटी होती है और कई बार ऐसा नहीं होता है। भारत की धरती के पुत्र होने के नाते मुझे देश में काम करना पसंद है और मैं मेक इन इंडिया में व्यापक स्तर पर भागीदारी करना चाहता हूं।
अलग होने वाले व्यवसायों के लिए आपकी आगे की बड़ी योजनाएं क्या हैं?
अगले 2 से 3 वर्षों में समूह में 20 अरब डॉलर का निवेश होगा जिससे 50 अरब डॉलर की आय होगी। इस निवेश के कारण हमारी एल्युमीनियम क्षमता 6 करोड़ टन तक बढ़ जाएगी और जस्ता वर्तमान 10 लाख टन से बढ़कर 30 लाख टन हो जाएगा। आज हम 700 टन चांदी बनाते हैं और भविष्य में 3,000 टन चांदी का उत्पादन करेंगे। उर्वरकों के लिए 15 लाख टन क्षमता वाला संयंत्र बनाने की योजना है।
पुनर्चक्रण के माध्यम से हम दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों सहित 7 महत्त्वपूर्ण खनिज का उत्पादन करेंगे। समूह को अलग-अलग कारोबार में बांटने से सभी प्रबंधन टीमें स्वतंत्र रूप से अपने दम पर निर्णय लेना शुरू कर देंगी। मूल्य के लिहाज से क्षमता 4 से 5 गुना बढ़ जाएगी। देश को भी इसकी आवश्यकता है। इससे रोजगार बढ़ेगा, उत्पादन के अन्य क्षेत्रों में भी वृद्धि होगी। विभाजन की प्रक्रिया अगले महीने तक पूरी हो जाएगी और तब तक लोगों को शेयर भी मिल जाएंगे।
आपने कहा कि किसी न किसी को तो जोखिम उठाना पड़ता है। हाइड्रोकार्बन और अन्य खनिजों के संदर्भ में क्या आपको लगता है कि जोखिमों का लाभ मिला है?
भारत के पास पर्याप्त हाइड्रोकार्बन संसाधन हैं। हमारी मिट्टी के नीचे इतना तेल और गैस है कि वह भारत की मांग को पूरा कर सकता है और शायद उससे ज्यादा भी हो। दुनिया भारत को एक बाजार के रूप में देखती है। अन्वेषण और व्यवसाय करने में सुगमता सबसे महत्त्वपूर्ण है। जैसे हम दुनिया भर में तेल खरीदने जाते हैं और उत्पादक देशों को महत्त्व देते हैं, उसी तरह हमें उन कंपनियों को भी वही महत्त्व, सुविधा और प्रोत्साहन देना चाहिए जो भारत में अन्वेषण और उत्पादन करने की इच्छुक हैं।
हाइड्रोकार्बन क्षेत्र को कई अन्य क्षेत्रों की तरह सहयोग और मिलना चाहिए। कुछ हितधारक नहीं चाहते कि भारत घरेलू स्तर पर अधिक उत्पादन करे। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस क्षेत्र को उद्यमियों के लिए आकर्षक बनाएं। अन्वेषण में कारोबारी सुगमता लानी चाहिए और कंपनियों को परिचालन में लचीलापन दिया जाना चाहिए। मौजूदा ऑपरेटरों के लिए अल्पकालिक पट्टे अनिश्चितता पैदा करते हैं क्योंकि बैंक और शेयरधारक ऐसी परिस्थितियों में निवेश नहीं करते हैं।
हमें लंबी अवधि के पट्टे, आदर्श रूप से संपत्ति के जीवनकाल के लिए और सभी खनिजों के लिए समान नीतियों की आवश्यकता है। सरकार के पास आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करने का अधिकार हमेशा रहता है लेकिन कंपनियों को लंबा समय, सहयोग और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
क्या आपको लगता है कि कुछ अनावश्यक नियम हैं जो निवेशकों की रुचि को कम करते हैं तथा कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने के लिए और क्या करने आवश्यकता है?
यदि कोई निवेशक डरता है तो वह दूसरी जगह चला जाएगा। हमारे युवाओं को उद्योग शुरू करना चाहिए और जोखिम उठाना चाहिए। हमें वह माहौल बनाना होगा और यह सरकार का काम है। जब हम सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों के साथ अपनी समस्याओं पर चर्चा करते हैं तो वे समझते हैं और हमारी सुनते हैं। किसी को दोष देना अच्छा नहीं है। बड़े निवेश और उत्पादन का काम बड़ी कंपनियां करेंगी। सरकार खदानों की नीलामी करती है और कभी-कभी छोटी कंपनियां महंगे दाम पर नीलामी में ब्लॉक हासिल कर लेती हैं।
सरकार को राजस्व उन्मुख नहीं होना चाहिए। उसका ध्यान तेल, लौह अयस्क या कोयला जैसे खनिजों के भारी उत्पादन पर होना चाहिए। उद्यमी तब नीलामी में भाग लेगा और निवेश करेगा जब नीतियां उदार हों। यदि आपको इस्पात उत्पादन बढ़ाना है तो आपको बड़ी कंपनियों को लाना होगा जो अरबों डॉलर का निवेश कर सकें।
क्या आप सुझाव दे रहे हैं कि खनिजों नीलामी बड़े खदानों पर केंद्रित होनी चाहिए?
खनिजों की खोज और अन्वेषण का कार्य छोटी कंपनियों के लिए है। बड़ी कंपनियों का काम 20 करोड़ टन क्षमता का संयंत्र शुरू करना है। दुनिया में बीएचपी, आरआईओ और वेले जैसी बड़ी खनन कंपनियां हैं। भारत में भी ऐसी कंपनियां होनी चाहिए। इन दिनों सरकार उद्योगपतियों से बात कर रही है। हमें उद्योगपतियों के योगदान को पहचानना होगा। आज वैश्विक स्तर पर लाखों शेयरधारकों के निवेश वाली कई निजी कंपनियां हैं। वे सीईओ चुनती हैं और अगर उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है तो उन्हें बाहर कर दिया जाता है। यही व्यवस्था यहां भी लागू होनी चाहिए।
आप महत्त्वपूर्ण खनिज क्षेत्र को कैसे देखते हैं जहां कई छोटी कंपनियों ने उच्च प्रीमियम पर खदानें हासिल की हैं?
महत्त्वपूर्ण खनिजों का खनन बेहद कठिन काम है। यह एक शोध आधारित कार्य है और इसे बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाना चाहिए। सरकार ने नीलामी की है। अगर भारत में 100 खदानों की नीलामी हुई है तो 5 फीसदी से भी कम खुली हैं। महत्त्वपूर्ण खनिजों में सफलता के लिए स्थापित दक्षता वाली कंपनियों को शामिल करने की आवश्यकता होगी।
एनसीएलएटी ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के लिए अदाणी समूह की बोली के चयन के खिलाफ वेदांत की याचिका खारिज कर दी है। आपकी अगली योजना क्या है?
अब हम जेपी एसोसिएट्स की ओर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं।
हिंदुस्तान जिंक और बालको में शेष हिस्सेदारी की बिक्री पर सरकार के साथ बातचीत की क्या स्थिति है?
हर किसी की अपनी राय हो सकती है। मगर मेरा मानना है कि हमें एक साथ दो नावों (सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र) पर सवार नहीं होना चाहिए। जब तक सार्वजनिक क्षेत्र मौजूद है, तब तक निजी क्षेत्र आगे नहीं बढ़ सकता। एक समझौता है कि सरकार हमें एचजेडएल और बालको का 100 फीसदी शेयर अनिवार्य तौर पर देगी। हमने एक कॉल ऑप्शन भी दिया था लेकिन उस पर कोई प्रगति नहीं हुई।
बालको में हमारी 49 फीसदी हिस्सेदारी है और हम बड़ा निवेश कर रहे हैं। हम हिंदुस्तान जिंक को मौजूदा आकार से तीन गुना और एल्युमीनियम कारोबार (बालको) का भी विस्तार कर सकते थे। सरकार पहल कर सकती है और उद्योग को एक सकारात्मक संदेश दे सकती है।
कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी होने पर आपको क्या समस्या दिखती है?
अगर निजीकरण नहीं होगा तो हमें हर चीज के लिए उनसे पूछना पड़ेगा। उदाहरण के लिए यदि हम उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं या कारोबार को अलग करना चाहते हैं तो हमें उनसे पूछना पड़ेगा क्योंकि वह भी कंपनी का हिस्सा है। हम सरकार को 60,000 करोड़ रुपये तक राजस्व देते हैं और सबसे अधिक राजस्व देने वालों में शामिल हैं। हम सबसे बड़े नियोक्ता भी हैं। जब हमने हिंदुस्तान जिंक का अधिग्रहण किया था तो कंपनी में 6,000 से 7,000 लोग काम कर रहे थे। आज इसमें 40,000 लोग काम कर रहे हैं। इसी प्रकार बालको में काम करने वाले लोगों की संख्या 6,000 से बढ़कर 30,000-35,000 हो गई है।
सरकार का कहना है कि तेल एवं गैस ईऐंडपी क्षेत्र में निवेशकों की सुगमता के लिए उसने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े कदम उठाए हैं। वेदांत भी इस क्षेत्र में वेदांत की लंबे समय से मौजूद है। क्या आपको लगता है कि उसका असर हुआ है?
इसका असर एक दिन में नहीं दिखता है। आपको लगातार प्रयास करते रहना होगा और उत्पादन करना होगा। आपको अपने लोगों (उद्यमियों) को इसके लिए तैयार करना होगा और उन्हें प्रोत्साहित करना होगा। इसमें समय लगता है क्योंकि यह एक बड़ा काम है। मैं सुझाव देने वाला कौन होता हूं? लेकिन मैं एक पीड़ित हूं।
मैंने देखा है कि यदि 5 साल के लिए पट्टा दिया जाता है तो न तो बैंक और न ही शेयरधारक पैसा देता है। ऐसे में उद्योग को एक गलत संदेश जाता है।
चाहे एचजेडएल हो या बालको में शेष हिस्सेदारी अथवा केयर्न विवाद, वेदांत लगातार सरकार के साथ किसी न किसी मुद्दे पर तकरार में दिखती है। इस पर आप क्या कहेंगे?
जो भी विवाद है उसे सुलझा लेते हैं। हम विवादों को जारी नहीं रख सकते। यह वैसा ही होना चाहिए जैसा अमेरिका में होता है- जुर्माना (किसी भी अपराध के लिए) लगाइये लेकिन विवाद को खत्म कीजिए। उत्पादकता जारी रहनी चाहिए और उत्पादकता केवल उद्यमियों से आएगी। मैं निश्चित तौर पर इस सरकार का कायल हूं।
मोदी ने वैश्विक स्तर पर जो किया है, अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के लिए जो किया है, उनकी वजह से भारत को काफी प्रतिष्ठा मिलती है। हम प्राकृतिक संसाधन कारोबार से उत्पन्न राजस्व का 50 फीसदी बाहर भेज रहे हैं। इससे निपटने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण किया जाना चाहिए। आपको रक्षा क्षेत्र का निजीकरण करना होगा जहां पैसा और प्रौद्योगिकी आएगी। मैं अपने देश के लिए परीक्षा देने को तैयार हूं।
सोने के आयात पर हमारी निर्भरता लगभग 100 फीसदी है। अगर वह कारोबार मुझे देते हैं तो निर्भरता 5 वर्षों में खत्म हो जाएगी। मेरे पास अनुभव है। मैं उसे कर सकता हूं।
नियमगिरि का उदाहरण सामने है। क्या वेदांत को अतीत में विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है?
हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। हमें इसका समाधान करना होगा और देखना होगा कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। स्व-प्रमाणन होना चाहिए। भूमि आवंटन पूरी तरह से डिजिटल होना चाहिए। स्थानीय लोग समस्याएं पैदा नहीं करते हैं। यह सरकार द्वारा भी नहीं किया जाता है। यह उन एनजीओ द्वारा किया जाता है जो पैसा कमाना चाहते हैं।
ऐसे में हम सभी को एक साथ आना होगा। अगर हम भारत में एल्युमीनियम और तांबा नहीं बनाते हैं तो हम आयात करते रहेंगे। मगर हमें पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
वेदांत की फॉक्सकॉन के साथ साझेदारी थी जो सफल नहीं हुई। क्या अब सेमीकंडक्टर कारोबार में उतरने की कोई योजना है?
हम दस अलग-अलग चीजों पर दांव लगाते हैं। अगर हम किसी एक में भी सफल हो जाते हैं तो वह काफी है। यदि हम सफल नहीं होते हैं तो निराश भी नहीं होते। जहां भी हमें अवसर दिखता है, हम कोशिश जरूर करते हैं। सेमीकंडक्टर देश के लिए महत्त्वपूर्ण है लेकिन फिलहाल हमारी ऐसी कोई योजना नहीं है।
हमारे पास हमारे 3-4 मुख्य कारोबार हैं और हम केवल उन्हीं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अगर कोई अवसर (सेमीकंडक्टर के लिए) दिखेगा तो हम उस पर गौर करेंगे।