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व्यापक यथास्थिति, कुछ सुधार

संपादकीय /  February 02, 2021

यदि महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बात की जाए तो प्रथमदृष्टया बजट में कुछ खास बदलाव नहीं नजर आता। हां, सरकार के राजकोषीय रूढि़वाद और उसकी व्यय नीति तथा कई मोर्चों पर सुधार को लेकर उसकी सकारात्मक इच्छा में अवश्य परिवर्तन नजर आया। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को लेकर व्यापक बदलाव, बीमा कंपनियों में विदेशी स्वामित्व बढ़ाने, सरकारी परिसंपत्तियों का स्वामित्व परिवर्तन, सरकारी बैंकों का निजीकरण और नई परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (बैड बैंक) जैसा पहले खारिज किया गया वित्तीय क्षेत्र सुधार और विकास वित्त संस्थान शामिल हैं। इनमें से अंतिम दो उपाय तो ऐतिहासिक रूप से नाकाम रहे हैं लेकिन शेष का स्वागत किया जाना चाहिए। शेयर बाजार उत्साहित है क्योंकि सुधारों का प्रस्ताव रखा गया और एकबारगी उपकर भी नहीं लगा है जबकि इसकी आशंका थी। स्थिर कर नीति अपने आप में एक बेहतर बात है लेकिन बजट को लेकर किए गए वादों से इतर उसके वास्तविक प्रस्ताव शायद उत्साह को कम कर दें।

बजट के साथ जुड़ी चिरपरिचित नाटकीयता से इतर सामान्य अर्थ में यह सरकार का सालाना वित्तीय दस्तावेज है। उस दृष्टि से देखें तो अगले वर्ष भी व्यय इस वर्ष के समान ही रहेगा। उसमें एक फीसदी से भी कम इजाफा किया गया है। सकल कर प्राप्तियां ऊपर-नीचे होती रहती हैं लेकिन जीडीपी के संदर्भ में देखें तो यह अगले वर्ष भी इस वर्ष या बीते वर्ष के समान रहेगी। ध्यान देने वाली बात है व्यय की दिशा में बदलाव और आर्थिक समीक्षा की दलील के अनुरूप पूंजीगत व्यय को लेकर पक्षधरता। समीक्षा में कहा गया था कि ऐसा व्यय राजकोषीय दृष्टि से अहम है।

आवंटन के आंकड़ों में कुछ उल्लेखनीय नहीं है। स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और वित्तीय क्षेत्र के लिए अधिक आवंटन है लेकिन यदि कोविड पूर्व के 2019-20 से तुलना की जाए तो कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। शिक्षा मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, ग्राम सड़क योजना, मेट्रो, रक्षा आदि क्षेत्र इसकी बानगी हैं। कई क्षेत्रों में आवंटन घटा है। मसलन एलपीजी के लिए प्रत्यक्ष नकदी स्थानांतरण, रोजगार गारंटी योजना और एकीकृत बाल विकास योजना आदि। रक्षा क्षेत्र की निरंतर अनदेखी समझ से परे है। व्यापक तौर पर यथास्थितिवादी इस तस्वीर के बीच अधिक ऋण लेकर राजस्व की कमी की पूरी करना स्पष्ट नजर आता है। इससे पहले यह इस पैमाने पर नहीं हुआ था लेकिन संकटपूर्ण वर्ष में इसे समझा जा सकता है।

हालांकि वित्त मंत्री ने पारदर्शी अंकेक्षण के साथ इस वर्ष के लिए राजकोषीय घाटा बढ़ा दिया है लेकिन 9.5 फीसदी का आंकड़ा एक बार झटका तो देता है। यह देखना दिलचस्प था कि इस आंकड़े के जिक्र के पहले वित्त मंत्री एक पल को ठिठकीं। अगले वर्ष के लिए घाटा जीडीपी के 6.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया जो एक दशक पहले की स्थिति दर्शाता है।

आर्थिक समीक्षा में अतिशय ऋण के जोखिम को तवज्जो नहीं दी गई लेकिन वह ब्याज भुगतान में नजर आता है जो कोविड के पहले यानी 2019-20 के 6.12 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर इस वर्ष 6.93 लाख करोड़ रुपये और अगले वर्ष 8.10 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यह दो वर्ष में 32 फीसदी का इजाफा है। विनिवेश लक्ष्य हासिल न होने का भी जोखिम है क्योंकि अतीत में लगातार ऐसा ही हुआ है। अगले वर्ष का लक्ष्य इस वर्ष के प्राप्त आंकड़ों से पांच गुना से अधिक है। ध्यान देने वाली बात है कि अब तक घाटे का अधिकांश हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान का है। इसका समायोजन करने पर हाल के वर्षों में प्राथमिक घाटा जीडीपी के 0.5 फीसदी के आसपास बचा। इस वर्ष इसमें तेज इजाफा हुआ और अगले वर्ष यह 3.1 फीसदी रह सकता है। गत वर्ष की उच्च वृद्धि के बाद कर-जीडीपी अनुपात 1.3 फीसदी कम हो चुका है। केंद्र की हिस्सेदारी के संदर्भ में देखें तो यह गिरावट अगले वर्ष के 223 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित जीडीपी में 1.6 लाख करोड़ रुपये होगी।

सीमा शुल्क में इजाफा देखने को मिला जो संरक्षणवादी और आत्मनिर्भर नीति के अनुरूप है। पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क भी बढ़ा। यह अपर्याप्त है। यही कारण है कि बजट में उल्लिखित 15.1 लाख करोड़ रुपये की उधारी, 15.5 लाख करोड़ रुपये के सरकार के शुद्ध कर राजस्व के बराबर रहेगी। सरकार ने अल्प बचत के जरिए मुद्रा बाजार और बाजार ब्याज दरों पर इसका असर सीमित रखा है। परंतु यह उच्च लागत वाला ऋण है और ब्याज के बोझ को कम नहीं करेगा। इसके बावजूद बॉन्ड प्रतिफल बढ़ा है।

अत्यंत विषम राजकोषीय हालात में वित्त मंत्री ने कड़ी मशक्कत से ऐसा बजट पेश किया है जो रुझान मजबूत करता है। परंतु यदि बजट में वृद्धि पर दांव लगाया गया है तो सीतारमण को पीछे रह जाने के जोखिम से अवगत होना चाहिए क्योंकि टीकाकारों का कहना है कि मध्यम अवधि में वृद्धि की संभावना पर असर पड़ा है। इससे केवल सुधारों के माध्यम से निपटा जा सकता है जो उत्पादकता बढ़ाएं। विनिवेश लक्ष्य हासिल करना तथा वित्तीय क्षेत्र में सुधार अहम है। विभिन्न श्रेणियों के करदाताओं के लिए प्रावधान आसान करना भी अच्छा कदम है।

Keyword: बजट, सार्वजनिक क्षेत्र, बीमा, निजीकरण, बैड बैंक, जीडीपी, शिक्षा मिशन,
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