बिजनेस स्टैंडर्ड - सूक्ष्म और लघु उद्यमों की बड़ी होती समस्या
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सूक्ष्म और लघु उद्यमों की बड़ी होती समस्या

तमाल बंद्योपाध्याय /  January 22, 2019

कई बैंक दबाव में मुद्रा ऋण वितरण के काम में लगे हैं। इसका नतीजा ऋण संबंधी जोखिम के रूप में देखने को मिल रहा है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय 

 
कुछ महीने पहले गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) खूब चर्चा में थीं। इन दिनों एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों) पर जोर है। दोनों ही गलत वजहों से सुर्खियों में रहे या हैं।  एनबीएफसी क्षेत्र तब चर्चा में आया जब कई लोगों का ध्यान इस क्षेत्र की परिसंपत्ति और देनदारी के अंतर पर गया। यह अंतर विशुद्घ रूप से वृद्घि को लेकर पनपे लालच और जोखिम का सही मूल्यांकन नहीं करने से उपजा था। अल्पावधि की दरों में अचानक बढ़ोतरी से क्षेत्र वाकिफ नहीं हो पाया। वहीं एमएसएमई क्षेत्र ऋण की कमी से दो चार है और उनमें से कई तो कारोबार में नुकसान के कारण अपना पुराना कर्ज तक नहीं चुका पा रही हैं। 
 
एमएसएमई क्षेत्र के ऋण की जरूरत पूरी करने में बैंकों से अधिक योगदान एनबीएफसी का था लेकिन अब उन्हें भी अपने ऋण खातों का ध्यान रखना पड़ रहा है। हकीकत तो यह है कि उनमें से कई अपने पोर्टफोलियो बेच रही हैं क्योंकि उनके पास ऋण संबंधी परिसंपत्तियों के निपटान के लिए अधिक नकदी नहीं है। सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को लेकर बैंकिंग क्षेत्र का जोखिम वर्ष 2013-14 के सकल घरेलू उत्पाद के 3.1 फीसदी से घटकर 2017-18 में 2.22 फीसदी रह गया। इसी अवधि के दौरान मझोले उद्यमों को बैंक ऋण का स्तर जीडीपी के 1.1 फीसदी से कम होकर 0.62 फीसदी रह गया। 
 
इसके पश्चात एनबीएफसी ने अवसर देखकर इस क्षेत्र में प्रवेश किया। एमएसएमई क्षेत्र की फाइनैंसिंग में उसकी हिस्सेदारी दिसंबर 2015 के 7.9 फीसदी से बढ़कर जून 2018 में 11.3 फीसदी हो गई। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर एमएसएमई क्षेत्र को देना आरंभ किया। वर्ष 2017-18 तक एनबीएफसी को बैंक ऋण बढ़कर 26.9 फीसदी तक हो गया। ट्रांस यूनियन सिबिल लिमिटेड और सिडबी के तिमाही प्रकाश एमएसएमई पल्स के मुताबिक एमएसएमई ऋण में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी जून 2017 के 55.8 फीसदी से घटकर जून 2018 में 50.7 फीसदी रह गई। इसी अवधि में निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी 28.1 फीसदी से बढ़कर 29.9 फीसदी हो गई। जबकि एनबीएफसी का ऋण 9.6 फीसदी से बढ़कर 11.3 फीसदी हो गया।
 
इस अवधि में एमएसएमई क्षेत्र में सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज 14.5 फीसदी से बढ़कर 15.2 फीसदी हो गया लेकिन निजी बैंकों का ऐसा ही कर्ज घटकर 3.9 फीसदी रहा। एनबीएफसी का फंसा कर्ज 5 प्रतिशत था। आलोक मिश्रा और जय तनखा द्वारा संपादित फाइनैंस इंडिया रिपोर्ट 2018 बताती है कि कैसे कुल औद्योगिक ऋण में एमएसएमई की हिस्सेदारी कम हो रही है। दो वर्ष से यह 13.8 फीसदी पर स्थिर है जबकि 2010 में यह 15.7 फीसदी थी। सन 2010 और 2018 के बीच मझोले दर्जे के उद्योगों की हिस्सेदारी में नाटकीय कमी आई और वह 10.1 फीसदी से गिरकर 3.8 फीसदी रह गई। परंतु बड़े उद्योगों की हिस्सेदारी 74.1 फीसदी से बढ़कर 82.3 फीसदी हो गई।
 
एमएसएमई के लिए ऋण की कमी तो है ही, साथ ही नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर ने भी उन्हें बहुत झटका दिया है। यह बात स्वयं आरबीआई के एक अध्ययन में कही गई है। कपड़ा तथा रत्न एवं आभूषण कारोबार में अनुबंधित श्रम को झटका लगा क्योंकि कर्मचारियों को नकद वेतन मिलता था। नई कर व्यवस्था ने अनुपालन की लागत बढ़ा दी। उनका टर्नओवर घटा और कई इकाइयों में कर्मचारियों की छुट्टी कर दी गई। श्रम ब्यूरो के छठे वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वे के मुताबिक 2016-17 में यानी नोटबंदी वाले साल बेरोजगारी दर चार वर्ष के उच्चतम स्तर पर थी। अब चुनाव करीब हैं और एमएसएमई क्षेत्र नए सिरे से चर्चा में है। जीएसटी परिषद ने जीएसटी पंजीयन का दायरा 20 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दिया है और करीब 20 लाख उपक्रमों को इसके दायरे से बाहर कर दिया।
 
उसके पहले आरबीआई ने संकटग्रस्त एमएसएमई के एकबारगी ऋण पुनगर्ठन के रूप में कर्जदारों को 25 करोड़ रुपये के फंड और गैर फंड जोखिम के निस्तारण का अवसर दिया था। जून 2018 में आरबीआई ने एमएसएमई के फंसे कर्ज के मामले में बैंकों को भी रियायत दी। यह रियायत ऐसे एमएसएमई ऋण से संबंधित थी जो पहले केवल जीएसटी के अनुपालन वाली इकाइयों को हासिल थी। एमएसएमई को सहयोग की आवश्यकता है लेकिन असल समस्या फंसे हुए कर्ज में इजाफे की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की शुरुआत की थी ताकि गैर कारोबारी, गैर कृषि छोटे और सूक्ष्म उपक्रमों को 10 लाख रुपये तक का ऋण दिया जा सके। वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सूक्ष्म वित्त बैंक, सहकारी बैंक, सूक्ष्म वित्त संस्थान और एनबीएफसी आदि सभी ऐसे ऋण देते हैं। इनकी ब्याज दर 8 से 12 फीसदी होती है। सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए मुद्रा ऋण का एनपीए 2016-17 के 3,790.35 करोड़ रुपये से करीब दोगुना बढ़कर 2017-18 में 7,277.31 करोड़ रुपये हो गया। बैंकों ने कुल मिलाकर 2017-18 में 2.53 लाख करोड़ रुपये और 2016-17 में 1.80 लाख करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया था। वर्ष 2018-19 में 3 लाख करोड़ रुपये के ऋण वितरण का लक्ष्य है।
 
मार्च 2018 तक सरकारी बैंकों के मुद्रा ऋण का 3.43 प्रतिशत एनपीए है जबकि कुल ऋण का 5.30 प्रतिशत एनपीए है। इन्क्लूसिव फाइनैंस  इंडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि एमएसएमई क्षेत्र में घटती हिस्सेदारी के बावजूद सरकारी बैंक 10 लाख रुपये से नीचे के ऋण में 79 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। बैंकिंग उद्योग का कुल फंसा हुआ कर्ज इसका 11.2 फीसदी है। देश में करीब 6.3 करोड़ एमएसएमई हैं जिनमें 11.1 करोड़ से अधिक कामगार हैं। यह देश के विनिर्माण उत्पादन के 45 प्रतिशत और निर्यात के 40 प्रतिशत के लिए जवाबदेह है। परंतु इन्हें लक्षित ऋण नहीं मिल पाता।
 
बैंक जमा के लिए लक्ष्य तय हो सकता है क्योंकि बैंकर किसी भी व्यक्ति से जमा करने को कह सकता है। ऐसे जमाकर्ताओं को खाते में पैसा भी नहीं रखना होता है और अगर वे दो वर्ष में एक ही लेनदेन करें तो भी बैंक शिकायत नहीं करेंगे। परंतु यह बात ऋण के मामले में नहीं लागू होती। दबाव में कई बैंक मुद्रा ऋण लेने वालों को तलाशते रहते हैं। इस प्रक्रिया में उनका ऋण जोखिम बढ़ता जाता है। आज हमारे सामने जो कुछ है, वह तो महज शुरुआत है।
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