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ईपीएफओ के आंकड़े कितने भरोसेमंद?

राधिका कपूर और सुरभि घई /  August 01, 2018

पेरोल के आंकड़े देश में आधिकारिक तौर पर रोजगार के इकलौते स्रोत हैं लेकिन उनमें कई खामियां हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रही हैं राधिका कपूर और सुरभि घई 

 
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो देश के रोजगार के अनुमान आम घरों और प्रतिष्ठानों के सर्वेक्षण पर आधारित रहे हैं। परंतु रोजगार के एकदम अद्यतन आंकड़ों के लिए जोर बढऩे पर गत वर्ष एक कार्यबल का गठन किया गया ताकि देश के पिछले वर्ष के रोजगार के आंकड़ों की समीक्षा की जा सके। कार्यबल ने आंकड़ों के एक अन्य स्रोत की बात कही, प्रशासनिक डेटासेट।  अप्रैल 2018 से सरकार ने तीन योजनाओं कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ), कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ईएसआईसी) और राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) में नामांकित सदस्यों की संख्या में वृद्घि को आंकड़ों के रूप में लेना शुरू कर दिया। यह काम मासिक आधार पर किया जाता है। ईपीएफओ पेरोल के आंकड़ों की मांग ज्यादा रहती है क्योंकि ये आधार सीडिंग के जरिये नकल की समस्या और निष्क्रिय खातों की पहचान करते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर यह दलील दी गई कि सितंबर 2017 से मई 2018 के बीच देश में 44.7 लाख औपचारिक रोजगार दिए गए। 
 
कई अर्थशास्त्रियों ने रोजगार वृद्घि के ऐसे आंकड़ों पर संदेह किया है। अखबारों ने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है कि क्या ईपीएफओ के आंकड़ों को शािमल करने से नए औपचारिक रोजगार के आंकड़े सामने आते हैं। बहरहाल अगर हम इस बहस को किनारे करके यह यकीन कर लें कि ये आंकड़े औपचारिक रोजगार में बढ़ोतरी उजागर करते हैं, तो भी कई संदेह हैं जो बने रहेंगे।  अब तक सरकार चार बार ईपीएफओ के पेरोल के आंकड़े जारी किए हैं और हर बार उसने पिछले अनुमान को संशोधित किया। यह बात ध्यान देने लायक है कि दो अवसरों को छोड़कर हर बार संशोधन के बाद ये आंकड़े कम हुए हैं। सितंबर 2017 में जब पहली बार आंकड़े जारी किए गए तो संख्या थी 5,96,483। हालिया अवसर पर इसे संशोधित करके 5,29,432 कर दिया गया है। 
 
इसी तरह सितंबर 2017 से फरवरी 2018 के बीच पेरोल में 32.7 लाख लोगों के नए नाम जुडऩे की बात कही गई थी। बहरहाल ताजा आंकड़ों में भी उसे संशोधित करके 26.8 लाख कर दिया गया है। इस संशोधन की वजह स्पष्टï नहीं है। जाहिर है इसमें और मासिक आधार पर रोजगार के दावों में अधिक स्पष्टïता की आवश्यकता है। ईपीएफओ के पहले आंकड़े के साथ एक टिप्पणी में कहा गया था कि यह अनुमान अस्थायी कर्मचारियों को शामिल करके लगाया गया है जिनका योगदान शायद साल भर स्थायी न रहे। 
 
यह चिंता की बात है क्योंकि इससे आंकड़ों में अस्थिरता आने की पूरी संभावना है। हम जानते हैं कि ईपीएफओ लगातार कंपनियों और फर्म पर दबाव बना रहा है कि वे अनुबंधित श्रमिकों को भी भविष्य निधि दें। ऐसे में वे श्रमिक भी ईपीएफओ के आंकड़े में आ रहे हैं। चूंकि कई श्रमिकों का ईपीएफओ योगदान नियमित नहीं है इसलिए मासिक नामांकन के आंकड़ों में निश्चित उतार-चढ़ाव आ सकता है। इसके अलावा यह बात ध्यान में आई है कि प्रतिष्ठïानों द्वारा कर्मचारियों के खाते में पैसे डालने में देरी भी हो सकती है। 
 
हकीकत में 19 जून 2018 के एक नोट में ईपीएफओ ने कहा है कि देनदारी चूकने वाले प्रतिष्ठïानों की तादाद पिछले कुछ महीनों में बढ़ी है। मई का भुगतान चूकने वाले संस्थानों की संख्या 54,885 थी। इससे मासिक नामांकन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। यह भी कि क्या पेरोल के आंकड़ों के विश्लेषण के लिए मासिक अवधि ठीक है?  एक अन्य पर्यवेक्षण यह है कि एक ओर जहां हमें नए सदस्यों के जुड़ाव के साथ ईपीएफओ योगदान में वृद्घि देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी ओर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के डैशबोर्ड पर दिए जा रहे आंकड़ों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। उदाहरण के लिए डैशबोर्ड बताता है कि मार्च 2018 में ईपीएफओ में सहयोग करने वाले लोगों की संख्या 4.7 करोड़ थी। अप्रैल 2018 में यह घटकर 4.6 करोड़ रह गई और मई 2018 में मात्र 4.5 करोड़ रह गई। जबकि आंकड़ों में मई में यह तादाद बढ़ती हुई दिखाई गई है। यह काफी भ्रम पैदा करने वाला है और इसे भलीभांति समझने की आवश्यकता है।
 
इतना ही नहीं ईपीएफओ के आंकड़ों का विश्लेषण करते समय यह याद रखने की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना अर्थात पीएमआरपीवाई भी मौजूद है। नए कर्मचारियों के लिए शुरुआती तीन वर्ष तक ईपीएफओ और कर्मचारी पेंशन योजना के योगदान का पूरा भुगतान करके सरकार ने औपचारिक रोजगार निर्माण को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। इस योजना के तहत लाभार्थियों का पंजीयन 31 मार्च, 2019 तक होगा।  माना जा सकता है कि इससे ईपीएफओ डेटाबेस के पंजीयन में इजाफा होगा। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक 23 अप्रैल से 29 मई के बीच 720,000 सदस्यों ने पीएमआरपीवाई के तहत पंजीयन कराया। पेरोल का आंकड़ा मई 2018 में 743,608 सदस्यों की बढ़ोतरी दिखा रहा है। माना जा सकता है कि यह पूरी की पूरी वृद्घि पीएमआरपीवाई योजना की वजह से हुई होगी। इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या ईपीएफओ के आंकड़े रोजगार के औपचारिकीकरण की सही तस्वीर पेश कर भी रहे हैं या नहीं? कहीं वह पीएमआरपीवाई के कारण हुई अस्थायी वृद्घि को तो प्रदर्शित नहीं कर रहा है। 
 
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान और श्रम ब्यूरो के अधीन किए जाने वाले रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण को बंद किए जाने के बाद पेरोल ही देश का एकमात्र आधिकारिक रोजगार डेटा बचा है। हमें अभी समय-समय पर होने वाले श्रम शक्ति सर्वेक्षण के नतीजों की प्रतीक्षा है लेकिन कह सकते हैं कि पेरोल के आंकड़े यह बताने की स्थिति में हैं कि अंतरिम समय में देश के श्रम बाजार में क्या हो रहा है। बहरहाल, जैसा कि उपरोक्त चर्चा से जाहिर होता है, कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें हल किया जाना है। उसके बाद ही ये आंकड़े उपयोगी होंगे। इन आंकड़ों के आधार पर रोजगार निर्माण का आकलन करने के पहले कई चीजों को स्पष्टï करना आवश्यक है। 
 
(राधिका कपूर इक्रियर की सीनियर फेलो और सुरभि घई इक्रियर में ही शोध सहायिका हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: EPFO, PF, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, ईपीएफओ),
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