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वाराणसी में ₹50,000 करोड़ का निवेश, एरोसिटी और तीन नई टाउनशिप से रियल एस्टेट में आएगी बड़ी छलांग!

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वाराणसी में भारी निवेश और सिडबी की आसान डिजिटल व सोलर फाइनेंसिंग से पूर्वांचल का कायाकल्प हो रहा है, हालांकि महंगी जमीन और बिजली अब भी चुनौती हैं

Last Updated- June 30, 2026 | 10:13 PM IST
Business Standard Ubharta Purvanchal

वाराणसी के बुनियादी ढांचे में पिछले 12 साल में 50,000 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है और इसका आर्थिक फायदा स्थानीय उद्योगों को जमकर मिला है। वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) के वाइस चेयरमैन पूर्ण बोरा ने यह आंकड़ा बताते हुए आज कहा कि तीन नई टाउनशिप के साथ कई बड़ी परियोजनाएं वाराणसी में आने जा रही हैं।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ‘उभरता पूर्वांचल’ कार्यक्रम के दौरान ‘पूर्वांचल में उद्योग: संभावनाएं, अवसर एवं चुनौतियां’ पैनल चर्चा में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बोरा ने कहा कि वीडीए ने अपनी कार्यशैली सुधारने के लिये कई ठोस कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इसीलिए इलाके के उद्यमियों और कारोबारियों को वीडीए की पुरानी छवि की शिकायत करने के बजाय कामकाज के इसके नए तरीके का खुद अनुभव करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए वीडीए में हर महीने बैठकें होती हैं, जिनमें बिजली, पानी और जमीन से जुड़ी स्थानीय उद्यमियों की समस्याएं दूर की जाती हैं।

उन्होंने कहा कि 1,000 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैले उनके प्राधिकरण में 900 राजस्व ग्राम आते हैं। लेकिन परियोजनाएं लगाने में सबसे बड़ी दिक्कत जमीन की आ रही है क्योंकि जमीन की कीमत यहां ज्यादा है और जमीन टुकड़ों में भी बंटी है। फिर भी निवेश के इच्छुक उद्यमियों या उद्योगपतियों को वाराणसी जिले में बेहद पारदर्शी और सरल तरीके से जमीन दी जाती है। परियोजना के लिए नक्शा दाखिल करने के बाद जांच-परख के साथ केवल 15 दिन में मंजूरी दे दी जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि वाराणसी में एरोसिटी के साथ तीन तरह की सिटी भी आने जा रही हैं। ऐसे में वाराणसी आने वाले समय में रियल एस्टेट और कारोबार का बड़ा ठिकाना बनने जा रहा है।

बनारस बीड्स लिमिटेड के सीएमडी अशोक गुप्ता ने चर्चा के दौरान उद्यमों के आगे आ रही चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंने बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत बताते हुए कहा कि उद्यमी को सस्ता और गुणवत्ता वाला ईंधन चाहिए। उन्होंने कहा कि कांच और प्लास्टिक उद्योग को बिजली ठीक से नहीं मिल रही। एक बार वोल्टेज नीचे जाते ही मशीनें रुक जाती हैं। उन्हें रीसेट करने में आधा घंटा लग जाता है। ऐसे में उत्पादन और माल की बरबादी के बाच यहां के उद्यमी विदेशों से होड़ क्या करेंगे।

उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा पर सब्सिडी और पर्याप्त ऋण मिले तो ईंधन की दिक्कत आधी रह जाएगी और लागत भी कम हो जाएगी। चीन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां भारत के बराबर दाम पर बिजली मिलती है मगर 95 फीसदी कारखाने दिन में सौर ऊर्जा से चलते हैं, इसलिए लागत कम हो जाती है। अगर भारत में भी सौर ऊर्जा पर सब्सिडी मिले तो कारखाने बेहतर ढंग से चलेंगे और डिस्कॉम का घाटा कम हो जाएगा।

गुप्ता ने हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार बढ़ने की बात कही और चिंता जताते हुए कहा कि घटती कारोबारी सुगमता, भूमि आवंटन में घपले के साथ माल एवं सेवा कर जैसी कई समस्याओं से उद्यमी जूझ रहे हैं। लेकिन उन्होंने परियोजनाओं के लिए नक्शे पास करने में वीडीए की सक्रियता की सराहना भी की।

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के उप महाप्रबंधक (वाराणसी) रितेश कुमार ने कहा कि सौर ऊर्जा के लिए उनकी संस्था कर्ज देने से परहेज नहीं कर रही। सस्टेनेबल फाइनैंसिंग के तहत सोलर फाइनैंसिंग की सुविधा सिडबी के पास है, जिसमें वसूली के लिहाज से जोखिम भरी सौर ऊर्जा परियोजनाओं को लिए भी कर्ज दिया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘वाराणसी दफ्तर में बैठकर मैंने खुद 50 मेगावाट सौर ऊर्जा परियोजना के लिए कर्ज दिया है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सोलर फाइनैंसिंग पर हमारा कितना जोर है, जबकि बैंक आम तौर पर इससे परहेज करते हैं।’

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सांसद बनने के बाद पिछले छह साल में वाराणसी का चहुमुखी विकास हुआ है और बुनियादी ढांचे के साथ बैंकिंग सेवाएं भी शानदार हो गई हैं। उन्होंने कहा कि अब राज्य में पूंजी की कमी नहीं है और पूर्वांचल में भी लगभग सभी बड़े बैंकों की शाखाएं प्रमुख शहरों में खुली हैं। उनके जरिये एमएसएमई को भरपूर कर्ज मिल रहा है।

कुमार ने कहा कि सिडबी की डिजिटल फाइनैंसिंग छोटे उद्यमियों के लिए खास तौर पर अच्छी है, जिसमें मशीन जैसे उपकरणों के लिए एकाएक जरूरत पड़ने पर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। सिडबी की वेबसाइट पर 45 मिनट के भीतर कर्ज मंजूर हो जाता है और कई बार उसी दिन उद्यमी के खाते में रकम भी पहुंच जाती है। इसी तरह कार्यशील पूंजी के लिए डिजिकैश जैसी योजना है, जिससे 10 लाख रुपये से 5 करोड़ रुपये तक की रकम घर बैठे ऑनलाइन आवेदन से मिल जाती है। इस तरह सिडबी नए दौर के उद्यमों के लिए रकम मुहैया कराने में कोताही नहीं बरत रहा।

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आरके चौधरी ने पूर्वांचल के लिए लाई जा रही परियोजनाओं और सड़क कनेक्टिविटी की सराहना करते हुए उन्हें क्षेत्र की संभावनाओं के भरपूर इस्तेमाल के लिए सटीक बताया। उन्होंने कहा कि यहां 99 फीसदी के करीब उद्योग सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में आते हैं। लेकिन ये छोटे उद्यम संभावनाओं और अवसरों का पूरा फायदा उठा नहीं पाते।

जमीन की कमी का मसला उठाते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वांचल की कानून-व्यवस्था तो दूसरे राज्यों के लिए अनुकरणीय है मगर यहां उद्योग लगाने के लिए जमीन नहीं है और कई बार परियोजना की कुल लागत से ज्यादा महंगी जमीन पड़ती है। औद्योगिक क्षेत्रों के लिए जमीन के अधिग्रहण का काम भी बहुत धीमी रफ्तार से हो रहा है। कई जगह खाली पड़ी जमीन का अधिग्रहण और बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नीतियों की बात करते हुए चौधरी ने कहा कि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे उद्योगों के गढ़ राज्यों से भी बेहतर नीतियां प्रदेश में हैं मगर उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो रहा। इसीलिए कारोबारी सुगमता का स्तर भी कमजोर है। यदि सुगमता बढ़ा दी जाए तो युवा उद्योगों की ओर आकर्षित होंगे, जिससे प्रदेश और पूर्वांचल में रोजगार भी बढ़ेगा।

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First Published - June 30, 2026 | 10:13 PM IST

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