भारत एक दुर्लभ मोड़ पर खड़ा है। अगले 10 से 15 वर्षों तक उसके पास सतत समृद्धि हासिल करने और एक उच्च आय वाला देश, एक विकसित भारत, बनने के अपार अवसर हैं। तीन अवसर खुले हैं, और एक-दो दशक में तीनों ही समाप्त हो जाएंगे। ये हैं- जनसंख्या का अवसर: 2030 के दशक के आरंभ से मध्य तक हमारी कार्यशील आयु वर्ग की हिस्सेदारी और निर्भरता अनुपात सबसे अनुकूल रहेगा और उसके बाद इसमें लगातार गिरावट शुरू हो जाएगी। ऊर्जा का अवसर: इस दशक में स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं और निवेश की नींव रखी जा रही है।
प्रौद्योगिकी का अवसर: आर्टिफिशल इंटेलिजेंस वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में आ गई है, और एआई युग के नियम अब तय किए जा रहे हैं। हमें इन तीनों अवसरों का लाभ उठाना चाहिए जब तक ये खुले हैं।
हिसाब बिल्कुल साफ है। भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,700 डॉलर है, उच्च आय की सीमा लगभग 14,000 डॉलर है। विश्व बैंक के अनुसार, 1990 के बाद से केवल 34 अर्थव्यवस्थाओं ने ही यह छलांग लगाई है, जिनमें से अधिकतर छोटी या संसाधन संपन्न हैं। 140 करोड़ की आबादी वाला चीन एक ही पीढ़ी में इस सीमा को पार करने वाला है, इसलिए हमारे जैसे देश भी ऐसा कर सकते हैं। लेकिन हमें एक पीढ़ी तक प्रति व्यक्ति आय में हर साल लगभग 7 फीसदी की वृद्धि की आवश्यकता है।
इसके अलावा, जैसे-जैसे समृद्ध देश आप्रवासन पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को विदेश में कम अवसर मिलेंगे, इसलिए हमें देश में ही अवसर पैदा करने होंगे।
चीन केंद्रीय नियोजन, एकदलीय शासन की निरंतरता और पूंजी पर पूर्ण नियंत्रण के माध्यम से इस मुकाम तक पहुंचा है, एक ऐसा रास्ता जिसका अनुसरण भारत न तो कर सकता है और न ही करना चाहिए। भारत एक संघीय लोकतंत्र है, जिसमें स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र चुनाव, स्वतंत्र प्रेस और एक ऐसा संघ है जिसे राज्यों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। हमें एक अलग मार्ग अपनाना होगा।
हम इस रास्ते को किसी व्यापक नीतिगत पैकेज या राष्ट्र निर्माण के नए अभियानों के माध्यम से नहीं खोज पाएंगे। भारत में नीतियों या अभियानों की कमी नहीं है। बल्कि, यहां गतिशील संस्थानों की कमी है जो इन्हें टिकाऊ, अनुकूलनीय और जवाबदेह बना सकें। नेता, नीतियां और अभियान सभी आवश्यक हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। असली काम संस्थागत स्तर पर नियमों में है। हमारी राष्ट्रीय बहस का एक बड़ा हिस्सा नीतिगत पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए संस्थागत ढांचे को नजरअंदाज कर देता है। अगले 15 वर्षों का लक्ष्य ऐसी संस्थागत संरचना का निर्माण करना है जिसके माध्यम से प्रमुख पहलें राजनीतिक चक्रों से परे जा सकें, प्रतिभाओं को आकर्षित कर सकें, पूंजी जुटा सकें और व्यापक स्तर पर परिणाम दे सकें।
भारत गतिशील संस्थाओं का निर्माण करना जानता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) हॉलीवुड फिल्म के बजट से भी कम खर्च में मंगल ग्रह तक पहुंचने में सफल हुआ, और यह सब उसकी तकनीकी स्वायत्तता की रक्षा करने वाली संस्कृति के कारण संभव हुआ। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद में केंद्र को एक तिहाई और राज्यों को दो तिहाई मत दिए गए हैं और लगभग सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।
दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने एक समयबद्ध, लेनदार-केंद्रित प्रक्रिया बनाई, जो पहले मौजूद नहीं थी, हालांकि इसमें कुछ सुधार की आवश्यकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, यूपीआई, भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को भी इसमें जोड़ दें, तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है। ये उत्कृष्टता के प्रतीक हैं, लेकिन ये अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं।
एक गतिशील संस्था को तीन कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए। यह सक्षम, विधिसम्मत और जवाबदेह होनी चाहिए। एक सक्षम संस्था में निरंतर पेशेवर नेतृत्व, स्थिर वित्तपोषण, तकनीकी स्वायत्तता और अनुकूलन क्षमता होती है, जिससे वह दीर्घकालिक परिणाम दे सकती है। एक विधिसम्मत संस्था टिकाऊ कानून, स्पष्ट जनादेश और समीक्षा योग्य निर्णयों पर आधारित होती है, जिससे नागरिक और निवेशक नियमों पर भरोसा कर सकें।
एक जवाबदेह संस्था कई हितधारकों के बीच शक्ति का वितरण करती है, पारदर्शी रूप से रिपोर्ट करती है और निर्वाचित प्रतिनिधियों, जनता और स्वतंत्र समकक्षों के प्रति जवाबदेह होती है, ताकि स्वायत्तता कभी भी दमन में तब्दील न हो। भारत को राज्य, बाजार और समाज में पर्याप्त संख्या में ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता है, जो एक एकीकृत संरचना के रूप में कार्य करें।
ये परीक्षण एक रिपोर्ट कार्ड हैं, कोई नुस्खा नहीं। किसी भी सार्वजनिक संस्था से तीन प्रश्न पूछे जा सकते हैं: क्या वह अपने लक्ष्य को पूरा कर सकती है? क्या वह भरोसेमंद होने के लिए पर्याप्त रूप से कानूनी है? क्या वह टिकाऊ होने के लिए पर्याप्त रूप से जवाबदेह है?
इन सवालों का सही जवाब मिलने पर सीधा लाभ मिलता है। जब अदालतें धीमी गति से काम करती हैं, नियामक अप्रत्याशित होते हैं या अनुबंधों को लागू करना कठिन होता है, तो निवेशक जोखिम के बदले अधिक रिटर्न की मांग करते हैं, और पूरी अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत बढ़ जाती है। विश्वसनीय संस्थाएं उस जोखिम प्रीमियम को कम करती हैं, और खरबों डॉलर के निवेश कार्यक्रम में, कुछ प्रतिशत अंक ही यह तय करते हैं कि बदलाव के लिए धन मिलेगा या बस सीमित मात्रा में संसाधन दिए जाएंगे।
परीक्षणों पर सहमति बनाना शुरुआत है, अंत नहीं। रास्ता जाना-पहचाना है: प्रत्येक संस्था का तीनों परीक्षणों के आधार पर विश्लेषण करें, सुधार और नई संस्थाओं के निर्माण का क्रम निर्धारित करें, सभी दलों और केंद्र तथा राज्यों के बीच आम सहमति बनाएं, और चरणबद्ध तरीके से कानून बनाएं। इसी तरह हमने जीएसटी और आईबीसी बनाए।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें तेजी से आगे बढ़ना होगा, क्योंकि चाहे हम तैयार हों या न हों, अवसर समाप्त हो जाएंगे, और संस्थाओं को परिपक्व होने में वर्षों लग जाते हैं। गणित स्पष्ट है, और इसमें देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। अभी पर्याप्त सक्षम, वैध और जवाबदेह संस्थाएं बनाएं, और भारत अपने तीन अवसरों को उच्च आय वाले परिवर्तन में बदल सकता है, एक समृद्ध, न्यायपूर्ण और हरित विकसित भारत में बदल सकता है।
(लेखक केंद्रीय वित्त और नागर विमानन राज्य मंत्री रह चुके हैं)