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कर्नाटक के ‘सिद्ध’ राजनेता, अगर पूरा होता है कार्यकाल तो बन जाएगा इतिहास

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Last Updated- May 18, 2023 | 11:54 PM IST
Veteran who is revered on both sides of the aisle
PTI

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नव नियुक्त उपमुख्यमंत्री गोविंद करजोल 10 अक्टूबर, 2019 को कर्नाटक विधानसभा के एक प्रवेश द्वार के पास पत्रकारों के समूह से बात कर रहे थे। ठीक उसी वक्त उन्होंने सुना कि कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धरमैया उनकी तरफ आ रहे हैं। पांच बार के विधायक रहे करजोल ने इंतजार करने का फैसला किया और जैसे ही उन्होंने सिद्धरमैया की झलक देखी वह हाथ जोड़कर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के पास गए और उन्हें अपने नए कार्यभार की सूचना दी। सिद्धरमैया ने करजोल की पीठ थपथपाकर और उनके कंधे पर हाथ रखकर उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना की और उनसे कहा कि वह इसके हकदार हैं। विधान सौध के गलियारों में अनुभवी नेता सिद्धरमैया के बारे में इस तरह के कई किस्से हैं। लगभग सभी विधायकों के मन में उनके प्रति बड़ा सम्मान है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक ने कहा कि विधानसभा के बड़े और खासतौर पर छोटे विधायकों से जुड़ने की उनकी क्षमता और उनके व्यापक अनुभव से ही सिद्धरमैया को चुनाव में निर्णायक जीत के बाद पार्टी के नए विधायकों का समर्थन हासिल करने में सफलता मिली। सिद्धरमैया चरवाहा कुरुबा जाति से ताल्लुक रखते हैं।

रिकॉर्ड की ओर बढ़ते कदम

इसीलिए कर्नाटक विधानसभा में पहली बार प्रवेश करने के ठीक 40 साल बाद भी कांग्रेस नेता सिद्धरमैया दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हैं। वह कर्नाटक के इतिहास में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले केवल दूसरे व्यक्ति हैं। अगर वह इस पद पर तीन साल पूरे कर लेते हैं तो वह सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बन जाएंगे और अगर वह सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में अपना यह कार्यकाल पूरा करते हैं तो वह राज्य के इतिहास में ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति होंगे।

सिद्धरमैया के नाम कर्नाटक में अब तक सबसे ज्यादा 13 बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड है और पिछली बार की तरह ही वह वित्त मंत्रालय भी अपने पास रख सकते हैं।

सिद्धरमैया की पिछली सरकार का हिस्सा रहे एक वरिष्ठ अफसरशाह ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री बजट बनाने की कवायद में तीन सिद्धांतों का सख्ती से पालन करते हैं जैसे कि राजकोषीय घाटा, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, ऋण-जीएसडीपी अनुपात 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और इसके अलावा राजस्व अधिशेष होना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘उनके द्वारा पेश की गई कुछ मुख्य कल्याणकारी योजनाओं को छोड़कर वह वित्त विभाग द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं को सुनने के लिए तैयार हैं।’

आगे की चुनौतियां

अपने चुनावी अभियान में, कांग्रेस ने मतदाताओं के लिए पांच गारंटी की घोषणा की है जिसमें घर की प्रत्येक प्रमुख महिला को 2,000 रुपये प्रतिमाह, स्नातकों के लिए प्रतिमाह 3,000 रुपये और डिप्लोमाधारकों के लिए हर महीने 1,500 रुपये का बेरोजगारी भत्ता, सभी घरों को 200 यूनिट मुफ्त बिजली, बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार) परिवारों में प्रत्येक व्यक्ति के लिए 10 किलो खाद्यान्न मुफ्त दिए जाने के साथ-साथ महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा जैसी सेवाएं देने का वादा भी किया गया है। पार्टी ने मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही इन उपायों पर अमल करने का वादा किया है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि पार्टी ने इन वादों को पूरा करने की कुल लागत करीब 50,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है।

अफसरशाह ने कहा कि इन योजनाओं की भारी लागत को देखते हुए इन गारंटी एक बार में लागू करना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, ‘इन्हें चरणबद्ध तरीके से पेश किया जा सकता है।’

पार्टी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों की संख्या कम करने के लिए इन योजनाओं पर जोर देगी। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 28 सीटों में से 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

इसके अलावा, सिद्धरमैया के पास पार्टी के भीतर मतभेदों का प्रबंधन करने की भी जिम्मेदारी है जो पिछले तीन दिनों से दिखाई दे रही थी जब उनमें और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच शीर्ष पद के लिए रस्साकशी चल रही थी। वह 2006 में जनता दल (सेक्युलर) से कांग्रेस में शामिल हुए थे और इसी वजह से पुराने कांग्रेस नेता उन्हें एक बाहरी व्यक्ति के रूप में देखते हैं।

इसके अलावा जातिगत जनगणना का भी मामला है जिसे पार्टी ने जारी करने का वादा किया है। एक लीक हुई रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जनगणना कराई थी लेकिन प्रमुख वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों के दबाव के कारण इसे जारी नहीं किया था जिनकी संख्या स्पष्ट रूप से कम हो गई थी।

दरअसल, पार्टी के राज्य के नेताओं ने 2018 के चुनावों में अपने खराब प्रदर्शन के लिए इन दो प्रमुख समूहों की प्रतिक्रिया को ही जिम्मेदार ठहराया था। सिद्धरमैया ने उस चुनाव को अपने करियर का सबसे निराशाजनक चुनाव बताया क्योंकि कई कल्याणकारी उपायों की पेशकश करने के बावजूद, वह अपनी दो सीटों में से एक पर चुनाव हार गए। उनके एक करीबी सहयोगी ने कहा कि वह इसे सुधारने और इस बार अपनी विरासत को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

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First Published - May 18, 2023 | 11:39 PM IST

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