facebookmetapixel
Advertisement
पीयूष गोयल 200 सदस्यीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ जापान जाएंगे, निवेश बढ़ाने पर जोरग्रासिम का FY27 में ₹2 लाख करोड़ रेवेन्यू का लक्ष्य, नए कारोबार से ग्रोथ को रफ्तार: कुमार मंगलम बिड़लाREITs को सिर्फ फिक्स्ड इनकम समझना भूल! यील्ड के साथ कैपिटल ग्रोथ का भी मौकानिवेशक पैसा रखें तैयार! इस हफ्ते खुलेंगे कुल 10 IPO, कई कंपनियों के शेयर भी होंगे लिस्टभारी उछाल के बाद क्या सोने-चांदी की कीमत में आएगी गिरावट या जारी रहेगी तेजी? जानें एक्सपर्ट्स की रायपीपीएफ से डिजिटल गोल्ड तक: इन 7 विकल्पों में हर महीने थोड़ा निवेश, लंबे समय में बनाएं बड़ा फंडअमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की चाल तय करेगी बाजार की दिशा, सेंसेक्स-निफ्टी में उठापटक के आसार‘भारत में रिटायरमेंट फंड बड़ा संकट’, PFRDA चेयरमैन का खुलासा: बुढ़ापे में घट जाती है 60-65% तक कमाईMcap: टॉप-10 में से 4 कंपनियों का मार्केट कैप 87,960 करोड़ घटा, भारती एयरटेल को सबसे बड़ा नुकसानप्राइड होटल्स लाएगी 1,000 करोड़ का धमाकेदार IPO, SEBI से मंजूरी के बाद बाजार में एंट्री की तैयारी

एक था पूरब का मैनचेस्टर…

Advertisement
Last Updated- December 07, 2022 | 5:01 PM IST

आजादी के 61 साल बाद भी कानपुर की जनता अपनी आजीविका के लिए शहर से बाहर जाने को मजबूर है। एक समय था जब कानपुर को ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था।


बिहार, पश्चिम बंगाल, पूरे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राज्यों से लोग कानपुर में रोजी-रोटी कमाने के लिए आया करते थे। लेकिन अब यहां कि आबोहवा बदल चुकी है। यहां के लोग बेहतर रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर काफी तेजी से पलायन कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि शहर में दिनों-दिन चौपट होते उद्योगों की वजह से ही एक  बड़ी संख्या में लोग पलायन करने को विवश हैं।

84 वर्षीय रामबिहारी शहर के सिविल लाइनस इलाके में अकेले रहते हैं। ऐसा नहीं है कि उनका कोई परिवार नहीं है। उनका एक बेटा है जो पिछले 23 सालों से नोएडा की एक कंपनी में काम कर रहा है। अपने बीते दिनों को याद करते वे कहते हैं कि उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा शहर के सबसे प्रतिष्ठित हरकोर्ट बटलर प्रौद्योगिकी संस्थान (एचबीटीआई) से पढ़ाई करने के बाद वह उन्हीं के साथ रहेगा और कानपुर के किसी उद्योग इकाई में काम करेगा।

रामबिहारी ने बताया, ‘एक समय था जब शहर में व्यवसाय और औद्योगिक गतिविधियां अपने चरम पर थी। लोग कोलकाता जैसे दूर दराज राज्यों से भी नौकरी की तलाश में यहां आया करते थे।’ कपड़ा मिल में काम करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि यहां कि मिलें लाखों लोगों के लिए रोजगार मुहैया करती थी। उस वक्त भी राजधानी लखनऊ ही हुआ करती थी लेकिन अधिकांश प्रमुख औद्योगिक घरानें कानपुर पर ही केंद्रित थी।

यहां के उद्योगों के विनाश का कारण पूछने पर उस बूढ़े व्यक्ति ने आरोप लगाते हुए कहते हैं कि राजनीतिज्ञों की वजह से ही यहां के उद्योग शमशान घाट में तबदील हो गए हैं। रामबिहारी अकेले शख्स नहीं हैं, जिनके परिवार के सदस्यों ने शहर से पलायन किया हो।

एक आंकड़े के मुताबिक शहर के करीब 54 फीसदी मूल निवासी बेहतर भविष्य की तलाश में बड़े शहरों की ओर रूख कर रहे हैं। यहां तक कि शहर के ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट छात्र भी अपनी पढ़ाई खत्म करने के साथ ही दिल्ली की ओर कूच करना शुरू कर देते हैं।

Advertisement
First Published - August 15, 2008 | 2:07 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement