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मंदी से मुकाबले के लिए किसानों ने थामा हाथ

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Last Updated- December 10, 2022 | 1:06 AM IST

पंजाब में जहां घटता जलस्तर और बिजली की समस्या लगातार चिंता के सबब बनते जा रहे हैं, वहीं कृषि क्षेत्र में निचले स्तर पर कुछ ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं जो अपने आप में अनोखे हैं।
कृषि क्षेत्र में पानी की समस्या से निपटने के लिए प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पीएसीएस) नई पहल कर रही हैं। दरअसल, अब राज्य में समितियों ने किसानों को उन्नत मशीनरी उपलब्ध कराने का बीड़ा खुद उठाया है।
सहकारी समितियां किसानों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बाजार से खुद मशीनरी खरीद रही हैं और उन्हें किसानों को किराए पर दे रही हैं। इससे मशीनरी पर किसानों का खर्च तो घटा ही है साथ ही उनकी पैदावार भी पहले से बेहतर हुई है। पहले ये किसान भारी उपकरणों के भारी भरकम दाम की वजह से इनका इस्तेमाल नहीं कर पाते थे।
एक ऐसा ही उदाहरण लेजर लेवलर (लेजर तकनीक से चलने वाला कृषि उपकरण) का है जिससे कृषि में पानी की खपत को कम किया जा रहा है। दो साल पहले राज्य में जहां केवल एक ही समिति के पास ऐसा उपकरण था, वहीं अब करीब 200 समितियों ने लेजर लेवलर खरीद लिए हैं। इस उपकरण की मदद से जल की खपत 30 से 40 फीसदी तो घटी ही है, साथ ही बिजली की खपत भी कम हुई है।
इन सहकारी समितियों ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है जिसमें वे खुद ही सभी भारी और अत्याधुनिक मशीनरियों की खरीद करती हैं और फिर थोड़े से मुनाफे पर उसे किसानों को इस्तेमाल करने के लिए देती हैं।
इन उपकरणों की मांग इतनी अधिक है कि कई बार तो कई महीनों के लिए इनकी बुकिंग पहले ही हो जाती है। कालरा गांव की कृषि सहकारी समिति के सचिव नानक सिंह ने बताया, ‘हमने एक साल पहले जिन लेवलर और ट्रैक्टरों को खरीदा था, उनकी मांग काफी अधिक है और किसान इनका अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं।’
उन्होंने कहा कि इस सफलता को देखते हुए पास के गांव की समितियां भी ट्रैक्टरों की खरीद कर रही हैं। इन ट्रैक्टरों को सहकारी समितियां दूसरे उपकरणों के साथ ही किराए पर दे रही हैं। इस राज्य के करीब 62 फीसदी किसानों के पास 4 एकड़ से कम जमीन है और अब तक वे मशीनरी पर भारी निवेश करते रहे हैं।
पर किराए पर मशीनरी उपलब्ध कराने वाले इस मॉडल ने कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की लागत काफी हद तक कम कर दी है। कालरा गांव के ही एक किसान मोहन सिंह जिसके पास करीब दो एकड़ जमीन है, ने बताया कि इस तरह की सहकारी व्यवस्था का पता चलने पर उसे बड़ी राहत महसूस हुई। इस प्रणाली के जरिए किफायती दर पर विकसित तकनीकों का इस्तेमाल इन किसानों के लिए संभव हो पाया है।
राज्य के सहकारिता मंत्री कंवलजीत सिंह ने बताया कि इन समितियों की सफलता को देखते हुए हर साल करीब 20 फीसदी समितियों को बहुद्देशीय समितियों में तब्दील किया जा रहा है। 

उन्होंने बताया कि राज्य में कृषि को संकट से उबारने के लिए लागत में कटौती और उन्हें आगे कर्ज के भंवर में फंसने से बचाना है। हालांकि, राज्य के किसानों पर पहले से ही करीब 25,000 करोड़ रुपये का ऋण है।

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First Published - February 15, 2009 | 9:38 PM IST

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