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रोजगार और आय संकट का क्या हो हल?

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:41 PM IST

शिक्षा और कौशल को एक साथ लाने तथा उनके बीच निरंतरता का रिश्ता कायम करने से देश में रोजगार और आय की समस्या दूर करने में काफी मदद मिल सकती है।
भारत दुनिया की सबसे तेज विकसित होती बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन उसे बेरोजगारी और आय की समस्या तत्काल हल करने की आवश्यकता है। यूक्रेन युद्ध, उच्च मुद्रास्फीति (हालांकि वह कई विकसित देशों से कम है), कोविड के बाद की दुनिया में श्रम शक्ति की बदलती जरूरतें आदि सभी शिक्षा और कौशल में एक परिवर्तनकारी निरंतरता की मांग करते हैं। अब वक्त आ गया है कि पूर्वी एशियाई जादू को दोहराया जाए। नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसके लिए अवसर प्रदान करती है।
बीते कई वर्षों से गरीबों के कल्याण के लिए योजनाएं चलाई जा रही हैं और उनकी बदौलत इसमें काफी सुधार भी हुआ है। गरीबों के परिसंपत्ति आधार और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच की उनकी क्षमता सुधरी है। आज 15 से 49 आयु वर्ग के 50.2 फीसदी पुरुष और 41 फीसदी महिलाओं के पास 10 या अधिक वर्षों की पढ़ाई का अनुभव है। हमें इस शिक्षित वर्ग तक पहुंचना होगा ताकि इन्हें कौशल संपन्न बनाकर रोजगार दिए जा सकें।
सन 2014 में मानकीकरण पर जोर देते हुए कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की स्थापना की गई थी। सन 2009-10 के बाद से ही क्षेत्रवार कौशल परिषदों की स्थापना की जाने लगी थी। अल्पावधि एवं दीर्घावधि के कौशल कार्यक्रमों के लिए क्षमता ढांचे तैयार किए गए थे। औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र यानी आईटीआई, पॉलिटेक्निक और अन्य कौशल आधारित संस्थानों को साझा मंच पर लाया गया। इसके परिणामस्वरूप अप्रेंटिसशिप में सुधार हुआ। एक लाख से अधिक प्रशिक्षण संस्थान 5.5 करोड़ से अधिक युवाओं के साथ काम करने आगे आए ताकि उन्हें रोजगार बाजार के लिए तैयार किया जा सके। कौशल विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करने में केंद्र के बजाय राज्यों और जिलों की भूमिका बढ़ाई जा रही है। इसके लिए कुछ तय मानक हैं।
रोजगार पर जोर दिए जाने को मिल रहे प्रोत्साहन के बीच कुछ गलत रिपोर्टिंग भी देखने को मिल रही है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस ओर इशारा किया है। अब स्किल हब्स को स्कूलों, आईटीआई और पॉलिटेक्निक आदि से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं तथा अप्रेंटिसशिप तथा इंटर्नशिप को पाठ्यक्रमों से जोड़ा जा रहा है।कॉलेजों और हाईस्कूलों में अप्रेंटिसशिप तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के कुछ अवसर थे लेकिन उनसे ज्यादा बदलाव नहीं आने वाला था। बेरोजगारों तथा रोजगार नहीं पा सकने वाले स्नातकों या माध्यमिक स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की तादाद युवाओं में असंतोष की बड़ी वजह है। ऐसे में शिक्षा और कौशल की निरंतरता की मदद से ही समस्या समस्या को हल करने में मदद कर सकती है?
पहली बात तो यह कि पांच करोड़ परिवार हर वर्ष महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के तहत अकुशल श्रम करते हैं। यह हमारे विकास संबंधी प्रयासों का स्पष्ट उदाहरण है। विनिर्माण और निर्माण का आधार और सेवा क्षेत्र का 20 प्रतिशत हिस्सा पहले ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है लेकिन उद्यमों और रोजगार के लिए सार्थक कौशल को अभी भी दूरदराज इलाकों के साथ जोड़ना शेष है। उच्च मूल्य वाली कृषि तथा पशुपालन, बागवानी और प्रसंस्करण तथा पैकेजिंग आदि के माध्यम से भी बड़े पैमाने पर रोजगार तैयार हो सकते हैं, खासतौर पर महिलाओं के लिए।
अर्थव्यवस्था की उत्पादकता संभावना तभी बढ़ेगी जब कौशल विकास होगा। तमिलनाडु में सबको कौशल देने के अवसर तथा मध्य प्रदेश में आजीविका मिशन के जरिये कुछ गांवों में पूर्ण रोजगार देने की प्रायोगिक परियोजना का अनुकरण किया जा सकता है। हर कौशल कार्यक्रम में बुनियादी आईटी और संचार कौशल शामिल किए जाने चाहिए।
शिक्षा और कौशल की कड़ी को समझना आवश्यक है। कौशल को शिक्षा व्यवस्था के अंग के रूप में देखना होगा जिसका प्रमाणन आवश्यक है। दुनिया में कहीं भी व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए स्ट्रीमिंग सेवाएं कामयाब नहीं रहीं। भारत में सेवा क्षेत्र में अनेक अवसर हैं और वहां औपचारिक शिक्षा के साथ मजबूत संपर्क है। मुख्यधारा की शिक्षा में कौशल पाठ्यक्रम के लिए शिक्षा तथा कौशल पाठ्यक्रम के लिए ऋण की उपयुक्त व्यवस्था करनी होगी।
सामुदायिक कॉलेज तथा व्यावसायिक शिक्षा में रोजगारपरक विषयों में स्नातक डिग्री, प्रमाणपत्र अथवा डिप्लोमा पाठ्यक्रम की मदद से पारंपरिक डिग्री लेने वाले छात्रों को रोजगार सक्षम बनाया जा सकता है। इस में काउंसलिंग, टूरिस्ट गाइड, अकाउंटिंग, आईटी कौशल आदि शामिल हैं। तमिलनाडु और महाराष्ट्र में उच्च शिक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात अच्छा है। वहां तकनीकी शिक्षा संस्थान भी अच्छी खासी तादाद में हैं। यही वजह है कि वहां महिलाओं की श्रम भागीदारी बेहतर है।
तीसरा, आईटीआई और पॉलिटेक्निक में भी ऐसा ही करना होगा और वहां भी कौशल सुधार पर काम करना होगा। इसके लिए पाठ्यक्रम विकास में लचीलापन आवश्यक है।
शिक्षक और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी मांग है। इससे महिला भागीदर में भी सुधार होता है। डिजिटल फाइनैंस की उभरती दुनिया में अलग तरह के पेशेवरों की आवश्यकता होगी।
चौथी बात, स्थानीय सरकारों और सामुदायिक संगठन मसलन महिला स्वयं सहायता समूहों और युवा संगठनों को भी स्थानीय स्तर पर कौशल योजना में पूरी तरह शामिल होना चाहिए। एक डेटाबेस तैयार करना चाहिए जिसमें उन सभी पुरुषों और महिलाओं के आंकड़े हों जिन्हें उद्यमिता समर्थन चाहिए। ऐसा स्थानीय निकाय, शहरी और ग्रामीण स्तर पर होना चाहिए।
पांचवां, कौशल और ऋण को एक साथ चलना चाहिए। समुचित कौशल अवसरों के बाद तकनीकी नवाचार आधारित सामुदायिक फाइनैंसिंग से नए प्रशिक्षित लोगों को अपनी उद्यमिता विकसित करने में मदद मिलेगी। आजीविका की पहलों ने दिखाया है कि कैसे बैंक सखी और बैंक मित्र के एक सामुदायिक कैडर तथा समुदाय आधारित रिकवरी व्यवस्था ने फंसे हुए कर्ज को कम करने में मदद की और जरूरत की जगह पर समय पर ऋण मिलना सुनिश्चित किया। महिलाओं और युवाओं के समूहों की आर्थिक गतिविधियों को आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण गारंटी मुहैया कराने से उद्यमिता को बल मिलता है।
छठवां, नियोक्ताओं की भी रोजगार के इन प्रयासों में अहम भूमिका है। संभावित नियोक्ताओं द्वारा संचालित अप्रेंटिसशिप या कौशल कार्यक्रम जरूरत के मुताबिक कौशल विकसित करते हैं। यह व्यवहार तमाम उद्योगों में अपनाया जाता रहा है।
सातवां, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों (आरएसईटीआई) को अपने-अपने जिले में उद्यमिता केंद्र के रूप में उभरना होगा। कृषि विज्ञान केंद्रों के साथ साझेदारी में शुरू होने वाले पाठ्यक्रम कृषि और संबद्ध गतिविधियों में कौशल की कमी दूर कर सकते हैं। स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन, महिलाओं और युवाओं के संयुक्त जवाबदेही समूह, प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों आदि को आरएसईटीआई के साथ मिलकर कौशल तथा ऋण लिंकेज के लिए काम करना चाहिए।
आठवां, प्रमाणन और आकलन की व्यवस्था को उच्च शिक्षा की व्यवस्था के अनुरूप बनाया जाना चाहिए क्योंकि अकादमिक और कौशल पाठ्यक्रमों के समकक्ष होने के लिए मुख्यधारा की आवश्यकता होती है। उच्च शिक्षा के साथ संपर्क स्थापित करना आवश्यक है।
यह सब हासिल करने के लिए कौशल मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय के साथ मिला दिया जाना चाहिए क्योंकि वहां उच्च स्तरीय आर्थिक गतिविधियों के लिए आवश्यक उच्च स्तरीय कौशल हासिल किया जा सकता है। इसकी मदद से रोजगार और आय के संकट से निपटने में मदद मिलेगी।

(लेखक सेवानिवृत्त अफसरशाह हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

First Published : August 11, 2022 | 11:59 AM IST