सरकार के गेहूं भंडार में इस वर्ष भारी कमी की गई है जो ना तो अनपेक्षित है और ना ही किसी तरह की चिंता का विषय है। हालांकि सरकार के आधिकारिक भंडार में गेहूं की मात्रा कम होकर 2.85 करोड़ टन रह गई है जो सन 2008 के बाद का न्यूनतम स्तर है लेकिन यह अभी भी खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी मात्रा और बफर स्टॉक से 10 लाख टन
अधिक है। इसके अलावा रिकॉर्ड निर्यात और मानवीय आधार पर अन्य देशों को भेजे जाने के बावजूद बाजार में गेहूं की कोई कमी नहीं है। करीब 18 लाख टन गेहूं बांग्लादेश और अफगानिस्तान समेत अन्य देशों को भेजा गया। यह गेहूं मई में गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगने के बाद भेजा गया। खुले बाजार में गेहूं की कीमत भी अपेक्षाकृत स्थिर रही और यह भी इस बात का संकेत है कि आपूर्ति की स्थिति सहज है।
गेहूं के भंडार में कमी की कई वजह हैं। इनमें सबसे अहम वजह है मार्च के महीने में भीषण गर्मी की वजह से फसल उत्पादन में कमी। गर्मी की वजह से अनाज समय से पहले पक गया और पूरी तरह परिपक्व नहीं हो सका। पहले अनुमान था कि देश में कुल मिलाकर 10.90 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन होगा लेकिन वह केवल 10.64 करोड़ टन रह गया। इसके अलावा सरकार के मूल्य समर्थन के जरिये गेहूं की खरीद भी 60 फीसदी कम हुई क्योंकि बाजार में गेहूं की आवक कम रही तथा निजी कारोबारियों ने मंडी के बाहर काफी गेहूं खरीद लिया। इससे किसानों को फायदा ही पहुंचा। गेहूं निर्यात इस वर्ष अधिक आकर्षक रहा क्योंकि रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी लड़ाई के कारण आपूर्ति क्षेत्र में समस्याएं उत्पन्न हुईं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी आई। प्रमुख अनाज आपूर्तिकर्ताओं द्वारा घरेलू खाद्य सुरक्षा की चिंता के चलते निर्यात कम करने के कारण भी इसमें मदद मिली।
आर्थिक नजरिये से देखें तो सरकार के अनाज भंडार में कमी एक स्वागतयोग्य कदम है। इससे भारतीय खाद्य निगम को वह लागत वहन नहीं करनी पड़ेगी जो उसे अधिशेष खाद्यान्न के भंडारण और रखरखाव के चलते उठानी पड़ती है। बल्कि जरूरत तो यह है कि चावल के भंडारण में भी कमी की जाए। फिलहाल देश में चावल का भंडार सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्यान्न आधारित कल्याण योजनाओं के तहत पड़ने वाली जरूरत की तुलना में लगभग दोगुना है। इसमें दो राय नहीं कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत सार्वजनिक खाद्यान्न भंडार से निर्यात की इजाजत नहीं है लेकिन सरकार अपना भंडार कम करने के लिए उन्हें घरेलू बाजारों में उतारने के लिए स्वतंत्र है। वास्तव में विश्व व्यापार संगठन के लिए भी बेहतर यही होगा कि वह भारत तथा अन्य देशों की मांग पर विचार करे और मौजूदा वैश्विक खाद्यान्न संकट को देखते हुए इस नियम को शिथिल करे। भारत ने रिकॉर्ड 2.1 करोड़ टन चावल का निर्यात किया और इसके बावजूद उसके पास अनाज का अधिशेष भंडार मौजूद है जिससे वह जरूरतमंद देशों की मदद कर सकता है।
हाल के दिनों में एक सवाल जो प्रासंगिक हुआ है वह यह है कि क्या धान के रकबे में अन्य फसलों की बुआई करके खेती में विविधता लाने का उचित समय आ चुका है। खासतौर से क्या तिलहन की बुआई की जा सकती है जिसके लिए हमारा देश अभी भी आयात पर निर्भर है। पंजाब और हरियाणा समेत कुछ राज्यों ने पहले ही धान की जगह दूसरी फसल बोने वाले किसानों को नकद प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया है। अन्य राज्यों में भी ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं लेकिन गेहूं की खेती के लिए जरूरी परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि उसे केवल उत्तर भारत में उगाया जा सकता है। ऐसे में उसका उत्पादन जारी रखा जा सकता है।