सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार पर दूरसंचार क्षेत्र की बकाया देनदारी (समायोजित सकल राजस्व) से जुड़े मामले में अपना आदेश दे दिया है।
अदालत गेल इंडिया लिमिटेड जैसे सरकारी उपक्रमों के खिलाफ बकाया मांग को लेकर सरकार के प्रति काफी कठोर रही है। इस मामले में उसने दूरसंचार विभाग से यह पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया।
सरकार के वकीलों के लिए मामला थोड़ा कठिन हो सकता है क्योंकि उसके अधिवक्ताओं को यह मानना पड़ा कि सरकारी कंपनियों और निजी क्षेत्र के दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को जारी किए गए लाइसेंस में अंतर था। एक अहम मसला यह भी था कि क्या भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी कंपनियों को भुगतान के लिए समय दिया जाएगा?
इस विषय में केंद्र सरकार ने 20 वर्ष के पुनभुर्गतान शेड्यूल का निर्णय लिया है। अदालत ने कंपनियों से कहा है कि वे यह स्पष्ट करें कि वे क्या सिक्योरिटी मुहैया कराएंगी और उनके भुगतान का खाका क्या होगा।
दूरसंचार क्षेत्र की स्थिरता, खासकर इस कठिन समय में जबकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा उन पर निर्भर है, ऐसे में इस क्षेत्र की स्थिरता सरकार के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में खेद की बात है कि सरकार ने मामले को ऐसी स्थिति में पहुंच जाने दिया है जब अदालत को कंपनियों से भुगतान शेड्यूल और गारंटी की मांग करनी पड़ रही है। सरकारी अधिवक्ताओं को भी शायद यही लग रहा था कि यह मामला पूरी तरह कंपनियों द्वारा सिक्योरिटी मुहैया कराने का है जबकि हकीकत में इस क्षेत्र से जुड़े नागरिक भी एक पक्ष हैं।
अदालत का यह कहना सही है कि अगले 20 वर्ष में क्या होगा यह कोई नहीं कह सकता है और किसी भद्रपुरुष के वादे को उसके निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता। ऐसे में यह बात समझी जा सकती है कि उसने कंपनियों से तय मियाद में शपथपत्र दाखिल करने को कहा है।
बहरहाल, यह भी सही है कि केंद्र सरकार जोखिम का आकलन करने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में है और उसे यह काम पारदर्शी और गैर विवादास्पद ढंग से करना चाहिए।
दूरसंचार विभाग के समक्ष अब एक अवांछित काम है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि दूरसंचार क्षेत्र में स्थिरता बरकरार रहे और उसमें एकाधिकार जैसी स्थिति न बनेे। साथ ही उसे न्यायालय की पुनर्भुगतान की समयसीमा की मांग का भी ध्यान रखना होगा। यदि 20 वर्ष की अवधि को न्यायालय की मंजूरी नहीं मिलती है तो उसे दूसरी समय-सीमा तय करनी होगी जो तार्किक भी हो और स्वीकार्य भी।
सर्वोच्च न्यायालय को यह भी ध्यान देना होगा कि उसका यह पर्यवेक्षण सही नहीं है कि दूरसंचार कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं लेकिन कोविड-19 संकट के दौरान योगदान नहीं कर रहीं। न्यायालय की ऐसी टिप्पणी के बाद कंपनियों को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उन्हें पीएम-केयर्स फंड में योगदान करना चाहिए। तथ्य तो यही है कि कंपनियों को भुगतान करना होगा लेकिन इस भुगतान का शेड्यूल वित्तीय रूप से व्यवहार्य होना चाहिए और इस क्षेत्र में मुनाफा कमाने की गुंजाइश भी बनी रहनी चाहिए। इस क्षेत्र में लंबे समय से व्याप्त अनिश्चितता से किसी को मदद नहीं मिलेगी।
स्पष्ट है कि सरकार इस पूरे मसले में बिना न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित किए भी निपट सकती थी। अब यदि कोई कंपनी भुगतान करने में नाकाम रहती है और उसे कारोबार से बाहर होने पर मजबूर होना पड़ता है तो इससे सरकार और उपभाक्ताओं दोनों को नुकसान होगा।