संसद में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) अधिनियम को पारित हुए 15 वर्ष बीत चुके हैं। कागज पर इसके नतीजे प्रभावशाली नजर आते हैं। सरकार का दावा है कि पिछले वर्ष के अंत तक कुल 240 एसईजेड परिचालित थे (423 को औपचारिक मंजूरी दी गई थी) और इनमें 5.37 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। आधिकारिक आंकड़ों में दावा किया गया है कि इनमें 20 लाख अतिरिक्त लोगों को रोजगार मिला है।
इसके बावजूद एक व्यापक नजरिया यह है कि देश की एसईजेड नीति को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले विरोध प्रदर्शन तथा जिन किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाता है उनको मिलने वाले हर्जाने की पर्याप्तता पर अक्सर विवाद होते रहे हैं। इसके चलते एसईजेड राजनीतिक दृष्टि से भी बदनाम हुए हैं। आधिकारिक आंकड़ों से परे व्यापक अध्ययन और अधिक जानकारी मुहैया कराने वाले हैं। प्रिंसटन विश्वविद्यालय के मेयर एल्कॉन ने सन 2018 में एक अध्ययन में कुछ ऐसे चुनिंदा क्षेत्रों के विकास संकेतकों पर पड़े प्रभाव का आकलन करने का प्रयास किया था जहां एसईजेड स्थापित किए गए थे। उनका निष्कर्ष था कि उन क्षेत्रों को हुए विशुद्ध आर्थिक लाभ न्यूनतम थे। उनका निष्कर्ष था कि हमारे देश में एसईजेड विकास सूचकांकों में बेहतरी लाने में व्यापक तौर पर नाकाम रहे हैं। उनके अध्ययन ने एसईजेड नीति की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक को वजन प्रदान किया और वह यह कि एसईजेड कुछ और नहीं बल्कि राजनेताओं और स्थानीय डेवलपरों को लाभ पहुंचाने वाले अचल संपत्ति कारोबार के खेल हैं। चीन की तरह हमारे यहां इनका इस्तेमाल व्यापक विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नहीं हो रहा। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एल्कॉन ने इशारा किया कि चूंकि एसईजेड अचल संपत्ति से संबंधित थे और कई मामलों में तो इनमें भ्रष्टाचार भी शामिल था लेकिन इनकी लोकेशन बहुत उपयुक्त नहीं थी। दूसरे शब्दों में कहें तो एसईजेड के लिए जगह का चयन काफी हद तक राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रित और प्रभावित था, यानी ये निवेश बाजार परिस्थितियों के हिसाब से बहुत अनुकूल नहीं थे और बुनियादी विकास के निजी या सार्वजनिक निवेश के लिहाज से बहुत उपयुक्त नहीं थे।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा का प्रस्ताव खासा प्रासंगिक नजर आता है। वर्ष 2015 में उन्होंने तटीय आर्थिक क्षेत्रों (सीईजेड) की स्थापना की वकालत की थी जो बंदरगाहों के आसपास हों। उनका सुझाव था कि ऐसा करने से लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी। एसईजेड के उत्पादन को नजदीकी बंदरगाह तक ले जाने में अक्सर यह समस्या आड़े आती है।
उस प्रस्ताव पर अब नए सिरे से विचार करना तीन कारणों से आवश्यक हो गया है।
पहला कारण है कोविड के बाद अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए व्यापक बुनियादी तेजी और लोक निर्माण कार्यक्रम की आवश्यकता है। यदि पूर्वी तट और पश्चिमी तट पर तीन-तीन सीईजेड को संबंधित आंतरिक और बाह्य बुनियादी ढांचे के साथ विकसित किया जाए तो इस दिशा में काफी मदद मिल सकती है।
दूसरी बात, तटीय सीईजेड कार्यक्रम पर नए सिरे से विचार करने का दूसरा कारण यह है कि कोविड के बाद के दौर में वैश्विक विनिर्माण कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखला में से जोखिम कम करना चाहती हैं और इसलिए वे उन्हें चीन से बाहर ले जाना चाहती हैं। सीईजेड ऐसे कुछ विनिर्माण को भारत लाने में भरोसेमंद साबित होगा। इसके लिए ऐसे सीईजेड क्षेत्र से अफसरशाही और नियामकीय बाधाओं को भी दूर किया जाना चाहिए।
तीसरी बात, पानगडिय़ा का बुनियादी विचार यह था कि सीईजेड को ऐसे मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाए जिसके माध्यम से श्रम आधारित निर्यात को नई दिशा दी जा सके। बेरोजगारी के बढ़ते स्तर को देखते हुए यह बात अब और अधिक महत्त्वपूर्ण हो चुकी है।
बल्कि वास्तव में यही असली चीनी मॉडल भी है। चीन ने अपने तटीय इलाकों में और ताइवान तथा हॉन्गकॉन्ग के पास चार बड़े सीईजेड स्थापित किए। इनकी स्थापना की जगह सबसे महत्त्वपूर्ण थी। इससे उनकी कारोबारी क्षमता में इजाफा हुआ। इतना ही नहीं तटीय इलाके में स्थित होने के कारण इन्हें वैश्विक बाजारों के साथ अबाध कारोबार का अवसर भी मिला। वे विदेशों से कच्चे माल का आयात तथा उन्हें तैयार माल का निर्यात आसानी से कर सकते थे। पानगडिय़ा बताते हैं कि इससे चीन के कामगारों के पास रोजगार के अवसर कई गुना बढ़ गए।
पानगडिय़ा के प्रस्ताव का एक हिस्सा सागरमाला परियोजना के रूप में क्रियान्वित किया जा रहा है। इस परियोजना में बंदरगाहों के विकास, बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी पर खास ध्यान है। अगले कदम के रूप में बंदरगाहों के करीब सीईजेड की स्थापना तार्किक कदम होगी।
इसका सबसे बड़ा लाभ उन फर्म के रूप में सामने आएगा जो ऐसे सीईजेड की ओर आकर्षित होंगी। मसलन बड़ी कंपनियां जो बड़े पैमाने पर कामगारों को रोजगार दे सकती हैं और जो बड़े तकनीकी स्थानांतरण में सक्षम हैं। ये सीईजेड बुनियादी और नियामकीय सुधार के वाहक बन सकते हैं।
जैसा कि अन्य लोगों ने भी कहा है, चीन के रुख की एक अन्य विशेषता थी विकेंद्रीकरण। यह सफलता की बड़ी वजह बनी। स्थानीय सरकारें वहां सीईजेड नीति की वाहक रहीं। जैसा कि जॉर्ज मैसन विश्वविद्यालय की लोट्टा मोबर्ग ने 2015 में भारत और चीन की एसईजेड नीति की तुलना पर आधारित अपने शोध आलेख में संकेत किया, विकेंद्रीकरण चीन की सीईजेड योजना की मजबूती की वजह रहा।
यह विडंबना ही है कि भारत पहले ही इस बात से वाकिफ रहा है कि विकेंद्रीकरण आर्थिक सफलता का वाहक है। मुंद्रा, काकीनाडा और पीपावाव जैसे छोटे बंदरगाह भी हमारे निर्यात के वाहक रहे हैं। ये बंदरगाह राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और इन्हें निर्णय प्रक्रिया के मामले में बड़े बंदरगाहों की तुलना में कहीं अधिक स्वायत्तता हासिल है। सन 2016 में कुल मालवहन में इनकी हिस्सेदारी 43 फीसदी रही जबकि 1981 में यह हिस्सेदारी केवल 10 फीसदी थी।
कहा जा सकता है कि सीईजेड हमारे हर पैमाने पर खरे उतरते हैं और अब इनकी मदद से एक विश्वसनीय लोक निर्माण कार्यक्रम चलाकर रोजगार तैयार किया जा सकता है और निवेश तैयार किया जा सकता है। इससे निर्यात भी बढ़ेगा और देश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जुटाने में मदद मिलेगी।
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)