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भारत का चालू खाता घाटा नियंत्रण में, लेकिन वित्तपोषण पर निगरानी जरूरी

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निरंतर बनी हुई वैश्विक अनिश्चितता के बीच current account deficit ज्यादा चिंता का विषय नहीं है लेकिन इसकी भरपाई की बारीकी से निगरानी करनी होगी। बता रहे हैं

Last Updated- July 08, 2025 | 10:29 PM IST
ADB India Growth Forecast FY27
प्रतीकात्मक तस्वीर

गत वित्त वर्ष के दौरान भारत का चालू खाते का घाटा (सीएडी) सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 0.6 फीसदी के स्तर पर रहा जो कि चिंताजनक नहीं है। यह अच्छी विशुद्ध अदृश्य प्राप्तियों की बदौलत हुआ। यह 2023-24 के 0.7 फीसदी से कम था जबकि वस्तु व्यापार घाटा जीडीपी के 6.7 फीसदी से बढ़कर 7.3 फीसदी हो गया था।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सेवा व्यापार और द्वितीयक आय खाते दोनों में उच्च अधिशेष नजर आया जिसने वस्तु व्यापार घाटे में हुई गिरावट से अधिक का योगदान किया। चालू खाते के घाटे की बाहरी भरपाई पर इस तरह की कम निर्भरता, पूंजी प्रवाह में उतारचढ़ाव और उससे जुड़ी मुद्रा विनिमय दर में अस्थिरता से बचाने में एक मजबूत बचाव की तरह काम करती है और वर्तमान वृहद आर्थिकी और भूराजनीतिक उथलपुथल के दौर में यह अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य स्थिति है।

व्यापार को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। एसऐंडपी ग्लोबल का अनुमान है कि वैश्विक जीडीपी वृद्धि 2025 में धीमी होकर 2.9 फीसदी रह जाएगी। 2024 में यह 3.3 फीसदी थी। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चीन और अमेरिका आगे बढ़ने के लिए जूझ रही हैं। यह बात भारत के निर्यात पर विपरीत असर डालेगी जबकि स्वस्थ घरेलू वृद्धि जो 6.5 फीसदी रह सकती है, वह आयात को बल देगी। तो क्या यह भारत के चालू खाते के लिए चिंता की बात है? उतनी नहीं।

इस वित्त वर्ष में हमें उम्मीद है कि चालू खाते का घाटा जीडीपी के करीब 1.3 फीसदी के साथ सुरक्षित स्तर में रहेगा। चालू खाते में न केवल वस्तु व्यापार शामिल है बल्कि प्राथमिक तथा द्वितीयक खातों के अधीन सेवा व्यापार और आय भी इसमें शामिल है। इनकी संभावनाओं पर चर्चा के पहले यह याद करना उचित रहेगा कि पहले सीएडी में तेज इजाफा क्यों हुआ था। वित्त वर्ष 12 और 13 में यह क्रमश: जीडीपी के 4.3 फीसदी और 4.8 फीसदी के स्तर पर था। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में देश का वाणिज्यिक वस्तु व्यापार घाटा दोनों साल 10 फीसदी से अधिक हो गया था। इससे बाद में वस्तु व्यापार घाटे में व्यापक कमी आई क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों और सोने की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। सेवा और द्वितीयक आय में इजाफा जीडीपी के 3.5 फीसदी के स्तर पर स्थिर रहा। अब हालात अलग हैं। अमेरिका द्वारा उच्च शुल्क लगाने की बात बताती है कि 2025 में भारत समेत तमाम देशों के लिए निर्यात संभावनाएं कमजोर रहेंगी। इस वर्ष के आरंभ में वैश्विक वस्तु व्यापार में जो इजाफा हुआ, वह इसलिए क्योंकि उच्च शुल्क दरों की आशंका में आयातकों ने अग्रिम खरीदारी की। यह सिलसिला जल्दी ही समाप्त हो जाएगा। विश्व व्यापार संगठन का ताजा नए निर्यात ऑर्डर का सूचकांक घटकर 97.9  तक पहुंच गया है।

वित्त वर्ष 25 में देश का वस्तु निर्यात 441.8 अरब डॉलर के साथ स्थिर रहा। पिछले साल यह 441.2 अरब डॉलर था। इस वर्ष प्रतिकूल हालात बढ़ सकते हैं। दूसरी तरफ,  चीन से आयात पर बढ़े हुए शुल्क से वहां अतिक्षमता और अपस्फीतिकारी दबाव बढ़ेगा, जिससे कारोबारी अतिरिक्त आपूर्ति भारत सहित अन्य बाजारों की ओर मोड़ने के लिए प्रेरित होंगे। इसका एक अर्थ यह भी है कि मूल आयात पर ऊपर की ओर दबाव बना रहेगा तो फिर देश की दो प्रमुख आयात होने वाली जिंसों यानी कच्चे तेल और सोने का क्या होगा? कच्चे तेल की कीमतें जो पश्चिम एशिया में अनिश्चितता की वजह से बढ़ी हैं अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं।

यह इजाफा अस्थायी था क्योंकि वैश्विक वृद्धि धीमी है और तेल की मांग में दीर्घकालिक कमी है। ऐसा इसलिए क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ा है। खास कर दुनिया के सबसे बड़े वाहन बाजार चीन में ऐसा हुआ है। उम्मीद है कि कच्चे तेल की कीमतें 65-70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर होंगी जबकि पिछले वित्त वर्ष में ये कीमतें 79 डॉलर प्रति बैरल थीं। ऐसे में कच्चे तेल का आयात ज्यादा दबाव नहीं डालेगा। इसी तरह कोयले की कीमतें भी कम हो सकती हैं। सोने की कीमतें जो पिछले वित्त वर्ष में डॉलर के संदर्भ में 30 फीसदी तक बढ़ी थीं,  उनमें इस वर्ष और इजाफा हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सोना एक खास संपत्ति वर्ग में आता है और निवेशकों के लिए सुरक्षित माना जाता है। यानी सोने की कीमतें अनिश्चित बनी रहेंगी। ऐसे में सोने के आयात पर कुछ दबाव रहेगा। दिलचस्प बात यह है कि हाल के वर्षों में भारत में सोने की मांग कम हुई है। अक्सर कीमतें बढ़ने पर मांग घटती है। गत वित्त वर्ष में सोने के आयात में साल-दर-साल आधार पर 38 मीट्रिक टन की कमी आई और यह 757 मीट्रिक टन रह गया। हालांकि सरकार ने जुलाई में आयात शुल्क को 15 फीसदी से कम कर 6 फीसदी कर दिया था। कम मांग से देश के स्वर्ण आयात का डॉलर मूल्य भी नियंत्रित रहेगा। कुछ श्रेणियों में उच्च आयात और साथ ही वस्तु निर्यात के धीमा रहने का परिदृश्य देश के वस्तु व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है। यकीनन सेवा निर्यात जो कि कुल निर्यात में 48 फीसदी का हिस्सेदार है, वह एक बचाव मुहैया कराएगा। अमेरिका सॉफ्टवेयर निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र है और वहां कुछ दबाव बन सकता है क्योंकि दुनिया की इस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में इस वर्ष धीमापन आ सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि बीते कुछ सालों में भारत का प्रदर्शन पेशेवर और प्रबंधन सलाह सेवा (पीएमसी) के क्षेत्र में बहुत अच्छा रहा है। इसमें वैश्विक क्षमता केंद्रों की भी भूमिका रही है। उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 21 और 25 के बीच जहां शुद्ध सूचना प्रौद्योगिकी निर्यात 14 फीसदी की दर से बढ़ा वहीं पीएमसी में 33 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

जहां तक धन प्रेषण की बात है, अमेरिका ने इस पर कर को पहले घोषित 3.5 फीसदी से कम करके 1 फीसदी कर दिया है। इससे राहत की स्थिति बनी है। इतना ही नहीं, चूंकि यह जनवरी 2026 से लागू होगा इसलिए इस वित्त वर्ष में इसका सीमित प्रभाव होगा। अमेरिका अब भारत में धनप्रेषण का सबसे बड़ा केंद्र है। हालांकि खाड़ी देश अभी भी इसमें अहम हिस्सेदारी रखते हैं। लेकिन वे अर्थव्यवस्थाएं तेल से होने वाली आय पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं और निजी क्षेत्र को बढ़ावा दे रही हैं। तेल की कम कीमतों के कारण वहां से आने वाले धन पर अधिक असर पड़ता नहीं दिखता। संयुक्त अरब अमीरात भारत में धन भेजने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है और 2024 में उसके जीडीपी में गैर तेल क्षेत्र का योगदान 75 फीसदी रहा।

ऐसे में देश के चालू खाते के घाटे में जहां इस वित्त वर्ष मामूली दबाव आ सकता है वहीं बड़ी चिंता का कोई कारण नहीं है। परंतु इसकी पूर्ति की निगरानी की जरूरत है। गत वित्त वर्ष में चालू खाते के घाटे में गिरावट के बावजूद वित्तीय प्रवाह अपर्याप्त था क्योंकि शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दोनों में तेजी से कमी आई। हालांकि, शुद्ध विदेशी वाणिज्यिक उधारी से कुछ मदद मिली।

इस वित्त वर्ष भी विदेशी पूंजी प्रवाह के अस्थिर बने रहने की उम्मीद है क्योंकि विश्व स्तर पर अनिश्चितता का माहौल है। उदाहरण के लिए विदेशी पोर्टफोलियो के डेट निवेश में से पहले तीन महीनों में काफी राशि बाहर गई है और बाह्य वाणिज्यिक उधारी भी शायद पिछले वर्ष जैसी नहीं रहे क्योंकि घरेलू ब्याज दरें कम हुई हैं।

बहरहाल, विदेशी मुद्रा भंडार के सहज स्तर पर रहने और चालू खाते के घाटे में मामूली इजाफे की आशंका के बीच भारत वैश्विक अनिश्चितता से निपटने की दृष्टि से बेहतर स्थिति में है।

(लेखक क्रिसिल में क्रमश: मुख्य अर्थशास्त्री और वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं)

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First Published - July 8, 2025 | 10:14 PM IST

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