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मजबूत एमएसएमई से सुदृढ़ होगी आर्थिकी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 9:15 AM IST

मेरुदंड या रीढ़ कमाल की चीज है। इसने मनुष्यों को दो पैरों पर चलने में मदद की और उसके हाथों को मुक्त किया जिनसे उसने सभ्यता को आकार दिया और पृथ्वी का सबसे दबदबे वाला जीव बना। मेरुदंड 33 हड्डियों से मिलकर बना होता है जिनमें से 24 डिस्क के माध्यम से अलग हो सकती हैं। यह मजबूत भी होता है और लचीला भी। लेकिन इसके साथ ही यह बहुत नाजुक भी होता है (स्ल्प्डि डिस्क) की समस्या के कारण मैं स्वयं इस बात से भलीभांति अवगत हूं। देश के सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रम (एमएसएमई) अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। जब वे स्वस्थ रहते हैं तो देश के औद्योगिक क्षेत्र में उनका योगदान 45 प्रतिशत होता है और वे हमारे निर्यात में 50 फीसदी योगदान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की कुल 18 करोड़ की श्रम शक्ति में उनकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। परंतु अगर इनकी स्थिति ठीक न हो तो समूची अर्थव्यवस्था पंगु हो सकती है।
कोविड-19 ने एमएसएमई क्षेत्र को विपरीत परिस्थितियों के हिसाब से अधिक लचीला बनाया है। परंतु उनकी समस्याएं इस महामारी के आगमन से पुरानी हैं। गत सप्ताह एक उल्लेखनीय भाषण में केंद्रीय एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी ने कारोबारी सुगमता की मांग करते हुए कहा कि एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने शहरी और ग्रामीण उद्यमों में नवाचार अपनाने की भी बात कही। यदि देश के औद्योगिक ढांचे को मजबूत रखना है तो तीन समस्याओं का सामरिक निदान तलाश करना आवश्यक है।
हम आपको नहीं देख सकते: देश के एमएसएमई क्षेत्र को लेकर समझ काफी कमजोर है। देश में करीब 6.34 लाख करोड़ गैर कृषि असंगठित एमएसएमई हैं। इनमें से 99 फीसदी सूक्ष्म, 3.3 लाख लघु और करीब 5,000 मझोले आकार के हैं। परंतु वर्ष एमएसएमई की अंतिम गणना वर्ष 2006-07 में हुई थी। यह सूचना विभिन्न डेटाबेस में प्रसारित है। उदाहरण के लिए उद्योग आधार मेमोरंडम, एमएसएमई डेटा बैंक और वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क। इनमें से पहले दो स्वैच्छिक हैं जबकि तीसरा केवल उन फर्म पर लागू है जिनका सालाना कारोबार 40 लाख रुपये से अधिक है।
इससे जुड़ी हुई दो समस्याएं हैं: एमएसएमई की तादाद बहुत ज्यादा है और इनमें से 96 प्रतिशत प्रोपराइटरी प्रकृति के हैं। दूसरा असंगठित श्रमिकों का कोई रिकॉर्ड प्राय: नहीं होता। ऐसे में वित्तीय या अन्य तरह की सहायता देना मुश्किल हो जाता है। सरकार ने 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य का ऋण बिना गारंटी देने की घोषणा की। परंतु इसका लाभ केवल उन चंद एमएसएमई को मिलेगा जो औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था के अधीन हैं। अधिकांश को यह लाभ नहीं मिलेगा।
एमएसएमई को एक समर्पित सूचना तंत्र की आवश्यकता है। इसे एमआईएसएचआरआईआई यानी एमएसएमई इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर होलिस्टिक ऐंड रियल टाइम आइडेंटिफिकेशन, इंसेंटिव्स ऐंड सपोर्ट कहा जा सकता है। ऐसे राष्ट्रीय केंद्रीकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से इन उपक्रमों की पहचान की जा सकती है और आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। एमआईएसएचआरआईआई उनके आकार, वितरण और आर्थिक सहयोग के आंकड़े जुटाएगा। इसे कर डेटाबेस और बैंकिंग नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है ताकि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण किया जा सके।
कामगारों की बात करें तो इसमें उनके पेशे, रोजगार के दिनों और मासिक आय का ब्योरा रखा जा सकता है। इससे अधिकारियों को भी न्यूनतम वेतन के लाभार्थियों को पहचानने और कल्याण योजनाओं को लागू करने में मदद मिलेगी। इन योजनाओं में बीमा, स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ, वृद्धावस्था संरक्षण, शिक्षा और आवास सुविधा शामिल हैं।
यदि ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो तमाम पहलों को भी सुसंगत बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए एमएसएमई को वित्त, कच्चा माल और नियामकीय मंजूरी दिलाने के लिए चैंपियंस पोर्टल और विदेशों से कुशल श्रमिकों को बुलाने के लिए स्वदेश पोर्टल।
हमें आपकी समस्या नहीं पता: अप्रैल से एमएसएमई में नकदी बढ़ाने के लिए 1.22 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज और इक्विटी डालने के उपाय घोषित किए जा चुके हैं। असल चुनौती है राहत की प्राथमिकता तय करना। जोखिम को समझने के लिए एक व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरनमेंट ऐंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के शोधकर्ताओं ने दो मानकों पर एमएसएमई क्षेत्र का आकलन किया: सकल मूल्यवद्र्धन और रोजगार में योगदान के क्षेत्र में उनकी आर्थिक महत्ता और कारोबारी जोखिम पर विचार करते हुए उपलब्ध नकदी तथा प्राप्तियों की वसूली में लगने वाला समय।
इसी तरह कपड़ा, रसायन एवं बुनियादी धातु क्षेत्र तीन सबसे संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में उभरे। परंतु परिवहन उपकरण और खाद्य उत्पाद क्षेत्र भी इससे अलग नहीं हैं। ऐसी कवायद अगर समय-समय पर की जाए तो मूल्यशृंखला की कमजोरियां दूर करने में मदद मिलेगी।
भुगतान करने में आनाकानी: केंद्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों पर सूत्रम और लघु उद्यमों की 10,582 करोड़ रुपये की राशि बकाया है। द माइक्रो ऐंड स्मॉल एंटरप्राइजेज फैसिलिटेशन काउंसिल (एमएसईएफसी) ने केवल 599 करोड़ रुपये मूल्य के आवेदनों का निपटान किया। सन 2017 में समाधान लंबित भुगतान निगरानी व्यवस्था की शुरुआत की गई थी। इसमें 40,000 से अधिक आवेदन दिए गए जबकि एमएसईएफसी ने 18,000 मामले सुने। 9,000 से अधिक मामले मध्यस्थता के लिए हैं।
मई में एक काबिले तारीफ घोषणा में वित्त मंत्री ने वादा किया कि एमएसएमई की केंद्र सरकार तथा विभिन्न केंद्रीय विभागों के पास बकाया राशि 45 दिन में चुका दी जाएगी। इस दौरान उन पुराने आपूर्तिकर्ताओं और कंपनियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिनका प्रदर्शन बेहतर है और जिनका पुराना बकाया है। राज्यों को भी अपने यहां एमएसईएएफसी की क्षमता बढ़ानी चाहिए ताकि लंबित मामले निपटाए जा सकें। यदि कंपनियां कारोबार दोबारा खड़ा करने पर ध्यान ला सकेंगी तो वे कर और खपत में भी योगदान दे सकेंगी।
राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट की क्षमता में इजाफा करने की भी आवश्यकता है। सन 2016 में स्थापना के बाद से यहां 62,000 मामले दर्ज हुए जिनमें से 40,000 की सुनवाई हुई। वह प्रदर्शन बुरा नहीं है लेकिन एनसीएलटी के पास लंबित मामले सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहे हैं। ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता के कुछ प्रावधानों का अस्थायी निलंबन समाप्त होने के बाद पंचाट के समक्ष मामलों में और इजाफा हो सकता है।
फिलहाल पंचाट में न्यायाधीशों के 15 पद रिक्त हैं। इन्हें तत्काल भरा जाना चाहिए। ऋणशोधन के मामलों में उछाल के बाद सुनवाई के लिए अस्थायी पीठों की आवश्यकता होगी।
यह जानना दिलचस्प है कि बंदरों में स्पॉंन्डिलॉलीसिस (रीढ़ की हड्डियों में एक मामूली दरार) की समस्या नहीं होती। चिकित्सा शोध के मुताबिक ऐसा क्रमिक विकास के कारण होता है। कई बार इंसान की रीढ़ का जोड़ सीधा चलने के क्रम में आदर्श स्थिति का अतिक्रमण कर जाता है। आत्मनिर्भरता के लिए ऊंचा लक्ष्य तय करने के पहले अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करना होगा।
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं)

First Published : June 23, 2020 | 11:09 PM IST