प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या अब परिवारों की जेब और प्लानिंग पर भारी पड़ रही है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, हर रोज करीब 19,500 भारतीय 60 साल के हो रहे हैं। PwC और एसोसिएशन ऑफ सीनियर लिविंग इंडिया (ASLI) की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक देश की आबादी का लगभग 21 प्रतिशत यानी करीब 34.7 करोड़ लोग 60 साल से ऊपर होंगे। यह बड़ा बदलाव परिवारों के खर्च, बचत और देखभाल के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है।
PB Fintech Group के प्रेसिडेंट राजीव गुप्ता कहते हैं कि आज सीनियर्स के लिए सबसे बड़ा आर्थिक बोझ अस्पताल के बिल नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली गैर-मेडिकल देखभाल है। इसमें असिस्टेड लिविंग, फुल-टाइम अटेंडेंट, डिमेंशिया की देखभाल और घर पर नर्सिंग जैसी चीजें शामिल हैं। ये खर्चे बार-बार आते हैं और सालों तक चलते हैं, लेकिन इनके लिए ज्यादातर इंश्योरेंस कवर नहीं होता।
वे एक आम मिसाल देते हैं कि टियर-1 शहर में रहने वाला 70 की उम्र के आसपास का एक कपल, जहां एक साथी को शुरुआती डिमेंशिया या चलने-फिरने में दिक्कत है। ऐसे में महीने का खर्च कुछ ऐसा हो सकता है जिसमें लिव-इन अटेंडेंट के 30 से 40 हजार रुपये, पार्ट-टाइम नर्सिंग के 10 से 15 हजार, थेरेपी के 5 से 8 हजार, और दवाइयों व अन्य सामान के 6 से 10 हजार रुपये तक हो सकते हैं। कुल मिलाकर महीने में 50 से 70 हजार रुपये, यानी साल भर में 6 से 8 लाख रुपये तक का बोझ पड़ जाता है।
अनंद राठी वेल्थ लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनीष श्रीवास्तव बताते हैं कि मामूली घरेलू देखभाल के लिए भी महीने में 25 से 30 हजार रुपये लग जाते हैं। वहीं टियर-1 शहरों में असिस्टेड लिविंग का खर्च 40 से 60 हजार रुपये महीना होता है। परिवार इस खर्च को पूरा करने के लिए रिटायरमेंट की बचत निकालते हैं, म्यूचुअल फंड बेचते हैं जो बच्चों के भविष्य के लिए रखे थे, या फिर बच्चों से हर महीने पैसे मंगवाते हैं।
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अंतरा असिस्टेड केयर सर्विसेज के CEO इशान खन्ना कहते हैं कि आजकल परिवार देखभाल को टुकड़ों-टुकड़ों में जुटाते हैं, कहीं एक अटेंडेंट, कहीं अलग से नर्स। ऐसा इसलिए क्योंकि कोई एकीकृत और रेगुलेटेड सिस्टम नहीं है। इस बिखराव से खर्च बढ़ जाता है, खर्च का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है और देखभाल करने वालों पर भावनात्मक दबाव भी बहुत पड़ता है।
रोइनेट इंश्योरेंस प्राइवेट लिमिटेड के CEO राहुल माथुर के अनुसार, भारत में लंबे समय की देखभाल के लिए कोई खास इंश्योरेंस ढांचा नहीं है। ज्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने पर फोकस करते हैं। जबकि रोजाना की देखभाल के 35 से 40 हजार रुपये महीना पूरी तरह जेब से निकलते हैं।
वे एक उदाहरण देते हैं: मेट्रो शहर में 72 साल के माता-पिता को घर पर सपोर्ट चाहिए, तो साल भर में करीब 4.4 लाख रुपये लग जाते हैं और ये राशि आमतौर पर वापस नहीं मिलती। अगर बजट 2026 में लंबे समय की देखभाल के राइडर आएं, जो घरेलू देखभाल के कम से कम 50 प्रतिशत कवर करें और सेक्शन 80D के तहत ज्यादा डिडक्शन मिले, तो परिवार का सालाना बोझ लगभग 2 लाख रुपये कम हो सकता है।
रिवर्स मॉर्टगेज की सुविधा तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है। राजीव गुप्ता बताते हैं कि लोन-टू-वैल्यू रेशियो कम होना और प्रक्रिया जटिल होना मुख्य वजहें हैं। बी श्रवंथ शंकर, बी शंकर एडवोकेट्स के मैनेजिंग पार्टनर, कहते हैं कि रिवर्स मॉर्टगेज से मिलने वाली रकम इनकम टैक्स एक्ट के तहत टैक्स-फ्री है, लेकिन ट्रांजेक्शन कॉस्ट ज्यादा और प्रक्रिया में दिक्कतें सीनियर्स को रोकती हैं।
मनीष श्रीवास्तव के अनुसार, 1 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी पर भी महीने में सिर्फ 10 से 15 हजार रुपये ही मिल पाते हैं, जो बेसिक देखभाल के लिए भी काफी नहीं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बजट 2026 में लोन-टू-वैल्यू लिमिट बढ़ाकर, नियम आसान करके और पेआउट में लचीलापन लाकर इसे उपयोगी बनाया जा सकता है।
सिरिल अमरचंद मंगलदास के पार्टनर कुणाल सावनी कहते हैं कि कई सीनियर्स कैपिटल गेंस से पैसिव इनकम कमाते हैं, लेकिन सेक्शन 87A के रिबेट को लेकर अनिश्चितता रहती है। सीनियर सिटिजन्स के लिए ऐसे रिबेट की साफ गाइडलाइंस मिलें तो काफी राहत मिलेगी।
सिंघानिया एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर रोहित जैन का कहना है कि सीनियर लिविंग को 18 प्रतिशत GST से हटाकर टैक्स-फ्री हेल्थकेयर की कैटेगरी में लाया जाए और सेक्शन 80D को जेरियाट्रिक आउटपेशेंट केयर तक बढ़ाया जाए, तो affordability में सीधा फर्क पड़ेगा।
कई एक्सपर्ट्स की राय है कि सीनियर केयर को अब आधिकारिक तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए। अंतरा सीनियर केयर के MD और CEO राजित मेहता का कहना है कि अगर इसे इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा मिले, लंबे समय की देखभाल को इंश्योरेंस में शामिल किया जाए, सीनियर केयर सेवाओं पर GST न लगे और एक अलग नोडल एजेंसी बनाई जाए, तो बुजुर्गों के लिए देखभाल सस्ती और आसानी से उपलब्ध हो सकती है।
गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहील पटेल भी यही कहते हैं कि लंबे समय और घरेलू देखभाल को देश के हेल्थ फाइनेंसिंग फ्रेमवर्क में शामिल करना चाहिए, क्योंकि असली आर्थिक दिक्कत यहीं है।
जबकि राजीव गुप्ता के शब्दों में, बजट 2026 में बड़े खर्च की जरूरत नहीं। बस मान्यता, रेगुलेशन और रिस्क शेयरिंग चाहिए।