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डेढ़ सदी पुराने रुझान से समस्या का समाधान!

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 1:56 AM IST

सन 1930 में महान अर्थशास्त्री जे एम कीन्स ने अपने आलेख, ‘हमारे पड़पोतों/पोतियों के लिए आर्थिक संभावनाएं’ में लिखा था कि 100 वर्ष बाद सप्ताह में औसतन 15 घंटे काम होगा। लोगों को एक दिन में केवल तीन घंटे काम करना होगा और अपने अस्तित्व के बाद पहली बार मनुष्य का सामना इस बात से होगा कि आर्थिक चिंताओं से आजादी के बाद खाली वक्त में क्या किया जाए।
कींस के कथन के 100 वर्ष बाद विकसित देशों में भी तीन चौथाई से अधिक पुरुष सप्ताह में 40 घंटे से अधिक काम करते हैं। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि कींस की कही दो बातें पूरी नहीं हुईं। उन्होंने कहा था कि अब युद्ध नहीं होंगे (महज एक दशक बाद दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया था) और आबादी पर नियंत्रण होगा (वह करीब चार गुना हो चुकी है)। लेकिन शायद ज्यादा अहम कारक है मनुष्य द्वारा खाली समय के बजाय पैसे को प्राथमिकता देना। हमारे जीन उन पुरखों के ही हैं जो इसलिए बच सके क्योंकि वे संचय की प्रवृत्ति रखते थे। यह उस समय की बात है जब कैलरी दुर्लभ होती थी और जीवन आज की तुलना में कहीं अधिक अप्रत्याशित होता था।
हालांकि उनका यह सोचना सही था कि मनुष्य उत्पादकता में बढ़ोतरी के क्षेत्र में अहम प्रगति करेगा। हर सप्ताह काम के घंटे बीते 150 वर्षों से लगातार कम हो रहे हैं। जबकि इस अवधि में औसत जीवन स्तर में सुधार हुआ है। अब जबकि वैश्विक आबादी की वृद्धि धीमी पड़ रही है और उत्पादकता वृद्धि जारी है तो शायद वक्त आ गया है कि काम और खाली समय के बारे में दोबारा सोचा जाए।

औसतन एक मनुष्य दिन का आधा समय सोने, खाने और अन्य निजी जरूरतों पर बिताता है। शेष आधे हिस्से में ही उत्पादकता संबंधी काम होते हैं। वही हिस्सा भुगतानशुदा या बिना भुगतान के काम में खर्च होता है। अध्ययन और आराम भी उसी समय में होते हैं। यदि काम के घंटे कम होते हैं तो आराम का समय बढ़ जाता है। एक ही गतिविधि किसी के लिए काम तो किसी के लिए आराम हो सकती है। उदाहरण के लिए बुनाई, क्रिकेट खेलना या पहाड़ चढऩा प्राय: आराम के समय होता है लेकिन यदि आप एक बुनकर, क्रिकेटर या शेरपा हैं तो यह आपका काम है। इस समय लोग दिन में चार से छह घंटे का समय खाली बिताते हैं।
तीन सदी पहले औद्योगिक क्रांति की शुरुआत तक घर और कार्यस्थल में अधिक अंतर नहीं था। लगभग सभी लोग कृषि से जुड़े थे और विनिर्माण का अधिकतर काम बुनकरी का था और वह घर पर ही होता था। औद्योगिक क्रांति के बाद कारखाना और कार्यालय आए जहां कारखाना मालिक नियम बनाता और काम के घंटे तय होते। इसकी अति ने आंदोलनों को जन्म दिया और 1840 के दशक में काम के घंटे सीमित हुए। ब्रिटेन में 1874 में कारखाना अधिनियम के आगमन के बाद पहली बार काम के घंटे तय हुए, हालांकि ऐसा महिलाओं और बच्चों के लिए किया गया। 
तब से हर सप्ताह काम के औसत घंटे लगभग आधे हो गए हैं। सन 1930 के दशक में भुगतान सहित अवकाश की व्यवस्था हुई और 1940 के दशक में सप्ताह में पांच दिन काम की व्यवस्था आई। सन 1980 के बाद श्रम संगठनों और अनुबंधित काम में इजाफा धीमा पड़ा। अमेरिका के अलावा अधिकांश देशों में उन कर्मचारियों की तादाद कम हुई है जो सप्ताह में 40 घंटेसे अधिक काम करते हैं। कुछ विकसित देशों के श्रम संगठन अब अधिक भुगतान के बजाय अवकाश को तरजीह दे रहे हैं और वहां औसत अवकाश दिवस लगातार बढ़ रहे हैं। सन 1998 में सप्ताह में 35 घंटे काम की फ्रांस की कोशिश नाकाम रही लेकिन उसमें भविष्य के संकेत छिपे थे।

जनांकीय आंकड़े भी सहायक हुए। मसलन सेवानिवृत्त लोगों की बढ़ती तादाद। सेवानिवृत्ति की उम्र बढऩे के बाद जीवन संभाव्यता बढ़ी। अब लोग सेवानिवृत्ति के बाद 10-15 वर्ष अधिक जीते हैं। प्रजनन दर में कमी आने से महिलाओं का बच्चों की देखभाल में लगने वाला समय भी बचा है।
ऐसा नहीं है कि खाली समय के सभी काम आर्थिक उत्पादन में मददगार हों। मसलन परिवार के साथ समय बिताना, पार्क में खेलना आदि। दो सदी पहले तक वाणिज्यिक रूप से खाली समय केवल अत्यधिक अमीरों का हक था और कलाएं धार्मिक संस्थाओं, शासकों आदि के संरक्षण की मोहताज थीं। शासक और श्रेष्ठि वर्ग संगीतकारों, चित्रकारों और कलाकारों केमाध्यम से अपना मनोरंजन करते थे।

अब यह भी बदल रहा है। मध्य वर्ग के उदय और तकनीक आधारित लागत कटौती के कारण खाली समय का वाणिज्यिीकरण बढ़ रहा है। रेलवे, कार और सस्ती विमान सेवाओं के कारण लोग गैर जरूरी यात्राएं सहजता से करने लगे। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिला। बिजली, ग्रामोफोन, कैमरा और टेलीविजन के कारण घर पर आराम करने का अनुभव बेहतर हुआ। कीमत कम होने से मांग बढ़ी और कलाकारों को भी अमीरों के संरक्षण से निजात मिली।
बीते दो दशक में अमेरिका और एशिया में भी रोजगार में खाली समय की हिस्सेदारी के साथ इस अवधि में होने वाली खपत भी बढ़ी है, हालांकि आंकड़े जुटाना मुश्किल है। कोविड-19 महामारी ने समय बचाने की ओर रुझान तेज किया है। खासतौर पर अमीर परिवारों के लिए जिनका खाली समय में व्यय पर दबदबा है। कार्यालय खुलने के बाद भी घर से काम की व्यवस्था अमेरिका में महामारी के पहले की तुलना में चार गुना होने की आशा है। भारत में भी इसमें अहम बदलाव दिख सकता है। ऐसे में घर से काम करने वालों का यात्रा में लगने वाला समय बचेगा और दूसरों को भी मदद मिलेगी। ई-कॉमर्स गतिविधियों के बढऩे के कारण खरीदारी आदि के लिए जाने वालों की तादाद भी कम होगी। आकलित आर्थिक गतिविधियों का अर्थ है कि मनुष्य एक दूसरे को कितनी वस्तुएं या सेवाएं मुहैया करा पाते हैं। अब हमें बुनियादी जरूरतों यानी, भोजन, कपड़ा और आश्रय के लिए कम कामगारों की जरूरत है। भारत जैसे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय क्षेत्र में ज्यादा लोगों की जरूरत है लेकिन समय के साथ इन क्षेत्रों में भी कर्मचारियों की तादाद कम होती जाएगी। 

रोजगार तैयार करने वाली अर्थव्यवस्थाओं को खाली वक्त  में होने वाली वाणिज्यिक गतिविधियों में स्थिर वृद्धि की जरूरत है। विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद के मुताबिक 2014 से 2019 के बीच भारत में यात्रा और पर्यटन के क्षेत्र में 4 करोड़ रोजगार तैयार हुए। बीते डेढ़ वर्ष में यह क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित भी हुआ। हालात में सुधार से संपत्ति की वह असमानता कम होगी जो महामारी के कारण उत्पन्न हुई है। मध्यम अवधि में भी इससे निवेश और रोजगार तैयार होने के अवसर बनेंगे। 
(लेखक एशिया पैसिफिक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख एवं क्रेडिट स्विस के इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं)

First Published : August 12, 2021 | 9:27 PM IST