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क्या पॉलिमर नोट पर फिर होना चाहिए विचार?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:54 PM IST

संयुक्त अरब अमीरात के केंद्रीय बैंक ने स्थानीय मुद्रा का पॉलिमर संस्करण (पॉलिमर नोट) उतारने की दिसंबर में घोषणा की थी। बैंक ने कहा था कि कागजी नोट के साथ पॉलिमर आधिकारिक मुद्रा की तरह इस्तेमाल होंगे। इससे पहले फिलिपींस सेंट्रल बैंक ने कहा था कि वह 2022 की पहली छमाही में 1,000 पेसो मूल्य के कुछ पॉलिमर नोट प्रयोग के तौर पर वित्तीय प्रणाली में उतारेगा। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान भी 2022 में देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर पॉलिमर नोट उतारने की घोषणा कर चुका है। त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो का केंद्रीय बैंक 1 डॉलर के नए पॉलिमर नोट उतार चुका है।
इस समय 195 देश पॉलिमर नोट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस नोट के कई लाभ हैं और यह पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक हो सकता है। जून 2016 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने एक परिपत्र में कहा था, ‘दुनिया के देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के प्रयासों में जुट गए हैं और कई देश अपनी मुद्राओं के पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रभावों पर भी विचार कर रहे हैं। वे अपनी मुद्राओं के टिकाऊ होने एवं इनकी सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं।’ कोष ने एक अध्ययन का हवाला देकर कहा कि कागजी नोट की तुलना में पॉलिमर नोट ग्लोबल वार्मिंग 32 फीसदी तक कम कर सकते हैं और प्राथमिक ऊर्जा की मांग कम करने में भी सहायक हो सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया पॉलिमर नोट छापने वाला दुनिया का पहला देश है। उसने 1988 में यह पहल की थी। हालांकि अस्थायी रूप से पहली बार हैती में 1980 में पॉलिमर में बैंक नोट तैयार किया गया था।
दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में क्या हो रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पॉलिमर नोट जारी करने के लिए वैश्विक विनिर्माताओं से अभिरुचि आमंत्रित करने के एक दशक से भी अधिक समय बाद यह योजना टाल दी है। आरबीआई ने 10 रुपये के 1 अरब पॉलिमर नोट तैयार करने की योजना बनाई थी। क्रिप्टोकरेंसी और वित्तीय प्रणाली पर इसके असर पर चल रही बहस के बीच आरबीआई ने अब डिजिटल मुद्रा उतारने की बात कही है और इस दिशा में प्रयास भी शुरू हो गया है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने पॉलिमर नोट पर एक अध्ययन शुरू कराया था। उन्होंने इस नोट के अपेक्षाकृत अधिक अवधि तक टिकाऊ होने की बात का जिक्र किया था।
मार्च 2013 में राज्यसभा में एक लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री नमो नारायण मीणा ने कहा था कि देश के पांच शहरों कोच्चि, मैसूरु, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में पॉलिमर नोट का परीक्षण किया जाएगा। इन शहरों का चयन उनकी भौगोलिक स्थिति और जलवायु विविधता को ध्यान में रखते हुए किया गया था। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2011 से अपनी सालाना रिपोर्ट में इस नोट के परीक्षण की बात लगातार कही है। आरबीआई ने कहा था कि इस नोट को तैयार करना सस्ता होता है। ये सुरक्षित भी होते हैं और इसकी नकल करना बहुत मुश्किल होता है।
2015 में सालाना रिपोर्ट में आरबीआई ने कहा कि 10 रुपये के बैंक नोट के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए गए हैं और इसका तकनीकी मूल्यांकन किया जा रहा है। इसके बाद 10 रुपये के प्लास्टिक नोट उतारने का भी परीक्षण शुरू होगा और इसकी जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्रा.लि. और सरकार नियंत्रित सिक्योरिटी प्रिंटिंग ऐंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया को दी गई। आरबीआई ने 2016 की सालाना रिपोर्ट में भी पॉलिमर नोट का जिक्र किया था। मगर तब से इस बारे में कुछ कहा-सुना नहीं गया है।
इस बीच, 10 नवंबर और 30 दिसंबर, 2016 के बीच 50 दिनों की अवधि में नोटबंदी के तहत 500 और 1,000 रुपये के 15.4 लाख करोड़ रुपये मूल्य के बैंक नोट वापस ले लिए गए। आरबीआई ने 2017 में अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा कि जितनी मुद्राओं की वैधानिकता समाप्त की गई थी उनमें 99 प्रतिशत वित्तीय प्रणाली में लोगों ने जमा करा दी थीं। 2021 के लिए आरबीआई की सालाना रिपोर्ट में पॉलिमर नोट के बारे में कोई जिक्र नहीं है और इसके अन्य विषयों पर ध्यान दिया गया है। इनमें फटे-पुराने नोट का निपटारा तेज करने और कागजी मुद्रा की सुरक्षा संबंधी खूबियों की जांच के लिए आधुनिक शोध एवं नए सुरक्षा उपाय करने सहित अन्य बातों का जिक्र किया गया है।
कुछ समय पहले यह प्रस्ताव दिया गया था कि अधिक मूल्य के बैंक नोट में सुरक्षा के मकसद से दो पट्टी (थ्रेड) का इस्तेमाल होना चाहिए मगर यह कार्य भी अब तक नहीं हो पाया है। जाली नोट की पहचान के लिए बैंक नोट में इस पट्टी का इस्तेमाल होता है।
पॉलिमर मुद्रा तैयार करने पर अधिक खर्च आता है मगर यह अधिक भी टिकाऊ होता है। इस वजह से अधिक खर्च होने पर भी मलाल नहीं रहता है। इस समय देश में कम मूल्य के बैंक नोट वित्तीय प्रणाली में एक वर्ष से अधिक समय तक नहीं टिक पाते हैं। अगर इन्हें पॉलिमर के रूप में उतार जाए तो इनकी अवधि बढ़कर पांच वर्षों तक हो सकती है। मगर कागजी मुद्रा का पक्ष रखने वाले लोगों का कहना है कि पॉलिमर नोट की स्याही तेजी से मिट जाती है और आग में कागजी नोट के मुकाबले पॉलिमर नोट तेजी से खराब हो सकते हैं। पॉलिमर और कागज दोनों रूपों में बैंक नोट उतारने का भी प्रस्ताव दिया गया था। मगर पॉलिमर मुद्रा तैयार करने में जानवर के वसा के कथित इस्तेमाल की आशंका से पूरी योजना थम गई। ऐसे समय में जब आरबीआई जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों और भारत के वित्तीय तंत्र को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की चर्चा कर रहा है तो क्या पॉलिमर नोट की योजना पर दोबारा विचार नहीं किया जाना चाहिए?
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

First Published : March 6, 2022 | 11:32 PM IST