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संदेसरा बंधुओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उठे बड़े सवाल

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आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि चूंकि सार्वजनिक धन कर्जदाताओं को लौटाया जा रहा है इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रखने से कोई हित सधने वाला नहीं है

Last Updated- November 28, 2025 | 11:03 PM IST
supreme court of india

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक निर्णय में कहा है कि अहमदाबाद की कंपनी स्टर्लिंग बायोटेक के भगोड़े प्रवर्तक नितिन और चेतन संदेसरा अगर 17 दिसंबर तक 5,100 करोड़ रुपये की राशि जमा करते हैं तो उनके खिलाफ सभी आपराधिक मामले बंद कर दिए जाएं। यह आदेश उन कारोबारियों के साथ व्यवहार को लेकर अहम सवाल उठाता है जो जनता का पैसा लेकर फरार हो जाते हैं। यह आदेश उस एकमुश्त निपटान का उल्लेख करता है जिसके तहत प्रवर्तकों ने बैंकों के एक समूह को बकाया राशि चुकाने पर सहमति जताई थी।

इसके बदले राज्य उनके विरुद्ध सभी आपराधिक कार्रवाइयों, जिसमें आर्थिक अपराधी के रूप में उनकी पहचान शामिल है, को समाप्त कर देगा। ये दोनों भाई साल 2017 में अल्बानियाई पासपोर्ट पर भारत से फरार हो गए थे और नाइजीरिया में तेल व गैस का कारोबार चला रहे थे। इनके खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और आयकर विभाग जैसी कई एजेंसियों द्वारा दर्ज मामलों की लंबी सूची है।

यह आदेश कुछ अहम नैतिक सवाल उठाता है। आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि चूंकि सार्वजनिक धन कर्जदाताओं को लौटाया जा रहा है इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रखने से कोई हित सधने वाला नहीं है। यह दलील एक तरह से अपराधों की आपराधिकता को खत्म करती है। यह व्यावहारिक हो सकती है लेकिन इसे ईमानदारी के संदर्भों में उचित ठहराना मुश्किल है जबकि वह स्वस्थ कारोबारी माहौल का आधार है। यह आदेश एक तरह से देनदारी से बचने वालों को पुरस्कृत करता है और प्रभावशाली कर्जधारकों के लिए समय पर या कभी भी कर्ज चुकाने की प्रेरणा को कमजोर बनाता है।

वास्तव में आदेश को संदेसरा बंधुओं के लिए एक अप्रत्याशित लाभ कहा जा सकता है क्योंकि यह उनके द्वारा जानबूझकर की गई धोखाधड़ी और गबन जैसे अपराधों के लिए आर्थिक दंड नहीं लगाता। वह न तो धन शोधन रोधी अधिनियम के तहत ऐसा करता है और न ही भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम के तहत। सीबीआई के अनुसार, भारतीय बैंकों की बकाया राशि लगभग 5,383 करोड़ रुपये थी, जिसे प्रवर्तकों ने मुख्य रूप से शेल कंपनियों के माध्यम से विदेश में स्थानांतरित कर दिया था।

इसका इस्तेमाल नाइजीरिया में कारोबार खड़ा करने और निजी विलासिता, जैसे निजी जेट और लग्जरी अचल संपत्ति खरीदने के लिए किया जाना था। वे पहले ही एक अन्य कानूनी प्रक्रिया के दौरान लगभग 3,507 करोड़ रुपये जमा कर चुके हैं, और दिवाला प्रक्रिया के तहत कर्जदाताओं ने लगभग 1,192 करोड़ रुपये की वसूली की है, जिससे निपटान राशि में एक तरह का दंड शामिल होता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय के समक्ष सीलबंद लिफाफे में जो एकमुश्त निपटान प्रस्तुत किया उसके बारे में जानकारी है कि वह बैंकों के साथ चर्चा के बाद तय एक सहमति वाला आंकड़ा था। चूंकि उस राशि में सार्वजनिक धन शामिल है इसलिए एक हद तक उसमें पारदर्शिता होनी चाहिए कि वह राशि किस प्रकार तय की गई। दूसरा, इन आंकड़ों में बीच की अवधि के ब्याज भुगतान की अनदेखी कर दी गई। इससे बैंकों को जो राशि मिलनी थी उतनी नहीं मिल सकेगी। एक दंडात्मक जुर्माना कम से कम संभावित डिफॉल्टरों के मन में भय पैदा कर सकता था।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि यह निर्णय खास हालात पर निर्भर है और इसे नजीर नहीं माना जा सकता है। यह स्पष्ट नहीं है कि कैसे संदेसरा बंधु और उनके सहायक दूसरे फरार डिफॉल्टरों मसलन विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी या जतिन मेहता से अलग हैं। ये लोग भी बिना जेल गए इसी तरह के सौदों की मांग कर सकते हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारतीय बैंक हाल ही में फंसे हुए कर्ज के भारी बोझ से उबरकर सामान्य स्थिति में लौटे हैं। ऐसे आदेश बैंकिंग प्रणाली को एक बार फिर पुरानी स्थिति में ले जाने का जोखिम पैदा करते हैं।

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First Published - November 28, 2025 | 9:45 PM IST

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