अमेरिका और ईरान के समझौते के करीब पहुंचने और पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त होने की संभावनाओं से जुड़ी खबर ने बाजारों पर सकारात्मक असर डाला है। इससे होर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने की उम्मीद जगी है। कच्चे तेल की कीमतों में भी कमी आई है। शेयर कीमतों ने वापसी की है। उम्मीद है कि इस समझौते पर 19 जून को हस्ताक्षर हो जाएंगे और अगले दो महीनों में होने वाली बातचीत समझौते को अंतिम रूप दे देगी। वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को वापस सामान्य होने में अभी कुछ महीने का समय लगेगा या कम से कम पहले जैसे हालात होने में वक्त लगेगा। लेकिन, संकट के हालात अब सुधरते नजर आ रहे हैं।
भारत में डॉलर के मुकाबले रुपया कुछ सुधरा है। बॉन्ड यील्ड में कमी आई है। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ने हाल में जो कदम उठाए हैं उन्होंने विदेशी जमा और बॉन्ड में विदेशी निवेश के जरिये विदेशी मुद्रा के प्रवाह को गति प्रदान की है। ये कदम भुगतान संतुलन में बढ़ते घाटे को लेकर चिंताओं को दूर करने में मदद करेंगे।
भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की कीमतें, जो भारत की तेल रिफाइनरियों के रिफाइनिंग में होने वाले खर्च पर असर डालती हैं, मार्च, अप्रैल और मई में 106 से 114 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में रहने के बाद अब गिरावट पर हैं। यह जनवरी में औसत 63 डॉलर और फरवरी में 69 डॉलर की कीमत से बहुत ज्यादा वृद्धि थी। इस सोमवार अमेरिका-ईरान शांति समझौते की खबर आने के बाद भारतीय बास्केट कच्चे तेल की कीमत घटकर 83 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।
भारत की सरकारी तेल रिफाइनरियों का बिक्री पर होने वाला घाटा भी कम हो रहा है। यह पेट्रोल पर लगभग 3 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 27 रुपये प्रति लीटर रह गई है। खुदरा मुद्रास्फीति दर के बेकाबू होने का डर भी अब कम हो रहा है क्योंकि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अगली वृद्धि करने से पहले दो बार सोचेगी।
सरकार और रिजर्व बैंक में भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रबंधकों को अब राहत की सांस लेनी चाहिए। लेकिन संकट का समाधान होने से दूर आगे की चुनौतियां उतनी ही कठिन बनी हुई हैं जितनी वे संकट के उभरने से पहले थीं। अर्थव्यवस्था में इस तरह के झटके को सहने की क्षमता हो सकती है लेकिन उस भावना से उत्पन्न आत्मसंतुष्टि या शिथिलता की वजह से सरकार के ध्यान को उन नीतिगत सुधारों पर केंद्रित करने से नहीं रोकना चाहिए जिन्हें बिना किसी और देरी के लागू करना आवश्यक है। फिलहाल सरकार को कम से कम दो तात्कालिक प्राथमिक कदमों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
पहला तेल क्षेत्र पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। असम, नागालैंड और केंद्र सरकार के बीच पूर्वोत्तर में तेल भंडारों में शीघ्र खुदाई पर त्रिपक्षीय समझौते को देश के कच्चे तेल भंडार के 22 फीसदी से अधिक और गैस भंडार के 15 फीसदी हिस्से वाले इस क्षेत्र में आगे की लंबी और आवश्यक यात्रा की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए।
कठोर वास्तविकता यह है कि भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता 2014-15 में खपत के 84 फीसदी से बढ़कर 2025-26 में 90 फीसदी हो गई है। निश्चित रूप से बढ़ती अर्थव्यवस्था ने कच्चे तेल की अधिक मांग पैदा की लेकिन आयात निर्भरता बढ़ने में योगदान घरेलू उत्पादन में तेज गिरावट का भी था जो 2014-15 में 3.6 करोड़ टन से घटकर 2025-26 में 2.6 करोड़ टन रह गया। प्राकृतिक गैस का आयात भी बढ़ा है जिसकी घरेलू खपत में हिस्सेदारी इसी अवधि में लगभग 40 फीसदी से बढ़कर 50 फीसदी से अधिक हो गई।
सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए नई नीतियां लागू कीं। इनसे गैस उत्पादन में कुछ परिणाम मिले लेकिन तेल उत्पादन ने नीचे की दिशा बनाए रखी। पेट्रोलियम मंत्रालय की हालिया पहलें जैसे वाहनों के लिए एथनॉल-आधारित ईंधन के अधिक उपयोग को प्रोत्साहित करना स्वागत योग्य है लेकिन मंत्रालय को समान उत्साह के साथ घरेलू कच्चे तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के प्रयास भी तेज करने चाहिए।
दूसरा, सरकार के पास उपलब्ध राजकोषीय गुंजाइश को लेकर चिंतित होने के कारण हैं क्योंकि पश्चिम एशियाई संकट के बाद उठाए गए विभिन्न कदमों के चलते सालाना व्यय का अतिरिक्त बोझ लगभग 4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कटौती से लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ, आर्थिक स्थिरीकरण कोष के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आवंटन, उर्वरक सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना हेतु 18,000 करोड़ रुपये का आवंटन शामिल है।
यदि अन्य मदों के तहत व्यय बचत से इसकी भरपाई नहीं की जाती तो यह अतिरिक्त खर्च बोझ केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 5.3 फीसदी तक बढ़ा देगा जबकि बजट में यह आंकड़ा 4.3 फीसदी रखा गया था। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि या तो कर उपायों के माध्यम से राजस्व बढ़ाया जाए या कुछ अन्य कदम उठाए जाएं।
तेल कंपनियां खुदरा कीमतें नहीं बढ़ा पा रही थीं इसलिए उन पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें घटती हैं वित्त मंत्रालय को विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में की गई कटौती को वापस लेना चाहिए और राजकोष पर पड़ने वाले बोझ को कम करना चाहिए।
उर्वरक सब्सिडी का बिल बजट में अनुमानित 1.7 लाख करोड़ रुपये से दोगुना होकर लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का डर है। साथ ही सरकार के विभिन्न विभागों से यह आग्रह भी था कि सब्सिडी के दुरुपयोग को रोका जाए और डिजिटल माध्यम से किसानों के भूमि-धारण से सब्सिडी आवंटन को जोड़ा जाए।
इस दिशा में उठाए गए प्रारंभिक कदमों को तेज किया जाना चाहिए ताकि सब्सिडी बिल घटे और सब्सिडी सीधे किसानों को देने के लिए प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण (डीबीटी) तंत्र का अधिक उपयोग किया जा सके। वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच भारतीय बास्केट कच्चे तेल की वार्षिक औसत कीमत 46 डॉलर से 93 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही। इनमें से छह वर्षों में पिछले वर्ष की तुलना में औसत कीमत में गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि अपेक्षाकृत मामूली कीमतों की उस अवधि का उपयोग सब्सिडी बोझ कम करने या तेल में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए नीतिगत सुधारों को लागू करने में नहीं किया गया। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में अपेक्षित नरमी फिर से सरकार को नीतिगत निष्क्रियता या जड़ता की ओर नहीं ले जानी चाहिए।