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जातिगत समीकरणों में बदलाव! UP में फिर गरमाई ब्राह्मण पहचान की राजनीति, SP-BJP में शह-मात का खेल शुरू

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले जातिगत समीकरण बदल रहे हैं। सपा सांसदों के पाला बदलने के दावों के बीच ब्राह्मण राजनीति एक बार फिर गरमा गई है

Last Updated- June 20, 2026 | 9:17 AM IST
yogi adityanath
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ | फाइल फोटो

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विपक्षी दलों के घेरे को मजबूती से तोड़ते हुए उन्हें कमजोर करती जा रही है। ऐसे में कई लोगों का अनुमान है कि तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना समूह के पतन के बाद, अब समाजवादी पार्टी (सपा) की बारी है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अगले साल होने हैं।

हाल में प्रदेश के मंत्री संजय निषाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के 37 सांसदों में से दो दर्जन से अधिक सांसद उनके संपर्क में हैं और दल-बदल करने को तैयार हैं। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, जो आमतौर पर बड़बोलापन नहीं दिखाते, उन्होंने भी संकेत दिया कि 25 से 26 सांसद जल्द ही समाजवादी पार्टी छोड़ सकते हैं। लेकिन सबसे स्पष्ट बयान उत्तर प्रदेश के पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर का था, जिनकी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भाजपा की सहयोगी है।

उन्होंने इशारों-इशारों में ‘बागी’ बलिया के एक बेटे का जिक्र किया, जो भाजपा में अपने समर्थकों को लाने का बीड़ा उठाएगा। बलिया को बागी इसलिए कहा जाता है  क्योंकि 1857 के विद्रोह के नायक मंगल पांडे इसी जिले से थे। बलिया से सपा के सांसद सनातन पांडेय काफी मुखर और बेबाक हैं।

पांडेय ने बेशक इस दावे को खारिज कर दिया है लेकिन राजभर का तर्क दिलचस्प है। उनका कहना है कि पांडेय का विद्रोह पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा इस महीने की शुरुआत में ब्राह्मण नेताओं के साथ आयोजित परामर्श बैठक से उपजे असंतोष के कारण है। विधान सभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण पहचान की राजनीति फिर से जोर पकड़ रही है। हाल के महीनों में हुए कई राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक घटनाक्रम इसी ओर इशारा करते हैं।

इस साल जनवरी में भाजपा के 50 से अधिक मौजूदा विधायक और एमएलसी (सभी ब्राह्मण) लखनऊ में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर पर ‘सहभोज’ के लिए मिले। इस बैठक को सामाजिक मेलजोल से ज्यादा सामूहिक राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में देखा गया। 

 यह बैठक कुंभ में ब्राह्मण युवकों के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस के ‘दुर्व्यवहार’ के बाद हुई थी। इनमें से अधिकांश युवक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अनुयायी थे, जो उत्तर प्रदेश सरकार की कुछ नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और जिनके खिलाफ बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन के लिए एफआईआर दर्ज की गई है। उन्होंने अयोध्या राम मंदिर के प्रशासकों द्वारा धन के क​थित दुरुपयोग के बारे में भी बात की है।

जन्म से क्षत्रिय योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच तनाव भाजपा का सबसे बड़ा राज रहा है। वर्ष 1990 से, जब राष्ट्रीय मोर्चा-वाम मोर्चा सरकार ने सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की, तब से ब्राह्मणों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से भाजपा की ओर सामूहिक रूप से अपनी निष्ठा बदलकर राजनीतिक प्रतिक्रिया व्यक्त की।

पिछड़े वर्गों के प्रति भाजपा के स्पष्ट झुकाव के बावजूद, वे भाजपा के प्रति वफादार बने रहे, सिवाय उन मौकों के जब उन्होंने 2007 में बसपा और 2012 में सपा का समर्थन किया, हालांकि सपा का समर्थन कुछ हद तक कम था। वर्ष 2017 में भाजपा को इस समुदाय के लगभग 82 फीसदी मत मिले और उसके 58 ब्राह्मण प्रत्याशी निर्वाचित हुए।

योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद भाजपा के लिए ब्राह्मणों का समर्थन कम होने का आभास सबसे पहले सपा को ही हुआ। परशुराम की स्मृति में सार्वजनिक अवकाश घो​षित करने और उनकी ऊंची मूर्ति लगाने (2020) के वादे से लेकर ब्राह्मण संगठनों और नेताओं तक पहुंच बनाने तक, सपा ने कई प्रयास किए। 

हालांकि भाजपा ब्राह्मणों के उससे दूर होने को लेकर बहुत चिंतित नहीं है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पतन के बाद ब्राह्मणों के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं, फिर भी वह कार्यकर्ताओं के मनोबल में गिरावट और जाति आधारित आंतरिक कलह से होने वाले नुकसान को लेकर चिंतित है। ओबीसी नेता और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा ब्राह्मण सहभोज का आयोजन करने वालों की सार्वजनिक रूप से निंदा करना इसका पहला उदाहरण था। हालांकि, भाजपा जातिवादी आग्रह को भले ही गलत ठहराए, पर इस होड़ को लेकर वह कुछ खास नहीं कर सकती।

सनातन पांडेय के बारे में बात की जाए तो वह खुद को ‘झगड़ालू’ बताते हैं और जिला अ​धिकारियों को सार्वजनिक रूप से यह धमकी देने के लिए जाने जाते हैं कि अगर वे अपना कर्तव्य नहीं निभाएंगे तो उन्हें परिणाम भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने 2024 के लोक सभा चुनावों में बलिया से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को हराया था, लेकिन उससे पहले उन्हें लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। उनके पास सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा है और राजनीति में आने से पहले वह उत्तर प्रदेश सरकार में जूनियर इंजीनियर थे। वे 2017 में विधान सभा चुनाव में सपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। 

असंसदीय भाषा के प्रयोग के कारण सदन में उनके भाषणों के कुछ अंश हटा दिए गए हैं। इसलिए शायद वह संसदीय लोकतंत्र के आदर्श उदाहरण नहीं हैं। लेकिन उन्हें बागी बलिया का सक्षम रक्षक माना जाता है। क्या ऐसा जुझारू व्यक्तित्व वास्तव में सपा से भाजपा में पलायन के लिए एक बड़े समूह का नेतृत्व कर सकता है? शायद वह मदद कर सकें। लेकिन इन कदमों से यह संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश में अंदर ही अंदर जातिगत समीकरणों में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है।

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First Published - June 20, 2026 | 9:17 AM IST

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