कई उद्योग उत्पादन प्रक्रिया के लिए आवश्यक उष्मा प्राप्त करने के लिए डीजल और गैस का इस्तेमाल करते हैं। आदर्श स्थिति तो यही है कि उत्पादन प्रक्रिया में उष्मा के लिए कोयले के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाए। इससे देश में वायु प्रदूषण का खतरनाक स्तर कम करने में मदद मिलेगी। सौर तापीय प्रणाली विकिरण (रेडिएशन) से मिलने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल कर उष्मा देती है। यह एक व्यावहारिक और टिकाऊ विकल्प है।
इस तकनीक की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। आवश्यकता होने पर यह चौबीसों घंटे सौर ऊर्जा की आपूर्ति कर सकती है। जो उद्योग उष्मा की जरूरत पूरी करने के लिए सौर तापीय ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं उनमें दुग्ध, खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, दवा और रसायन शामिल हैं। ये उद्योग अगर सौर तापीय ऊर्जा प्रणाली का इस्तेमाल करेंगे तो उनकी परिचालन लागत काफी कम हो जाएगी क्योंकि डीजल एवं गैस की तुलना में इस प्रणाली में विकिरण का खतरा बिल्कुल नहीं है। हालांकि, भारत में डीजल एवं गैस से सौर तापीय प्रणाली की ओर बदलाव अभी शुरू होना बाकी है।
एक तरह से कहें तो इस प्रणाली की तरफ कदम बढ़ाने की शुरुआत अब तक नहीं होना ‘बाजार की विफलता’ का एक बड़ा मामला है। बाजार में ऐसी कोई बड़ी कंपनी नहीं है जो सौर तापीय ऊर्जा प्रणाली बेचने या उपलब्ध कराने और इनकी मांग बढ़ाने की कोशिश कर रही हो। यह प्रणाली हर औद्योगिक इकाई की उष्मा की खास जरूरतों के हिसाब से तैयार करनी पड़ती है और ये बड़े पैमाने पर मानकीकृत उत्पादन, विपणन और बिक्री के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आपूर्ति नदारद रहने एवं किसी तरह का बढ़ावा नहीं मिलने के कारण इनकी मांग भी नहीं है। बाजार विफलता के ऐसे मामलों में बाजार में काम करने वाली ताकतों को सही दिशा देने के लिए सरकार को राह दिखानी पड़ती है। इसके लिए एक उपयुक्त रणनीति बनानी होगी। इसका केवल एक समाधान नहीं है।
हमारे पास सभी घरों में पारंपरिक तापदीप्त बल्बों की जगह ऊर्जा इस्तेमाल के लिहाज से अधिक कारगर एलईडी बल्बों का इस्तेमाल करने और बिजली के बिल में बचत करने में मिली जबरदस्त सफलता का अनुभव है। बिजली मंत्रालय की ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड और ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने बार-बार बड़ी मात्रा में एलईडी बल्ब खरीदे जिससे उनकी कीमतें काफी कम हो गईं। इसने सभी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के साथ साझेदारी की। इन डिस्कॉम ने उपभोक्ताओं को एलईडी बल्ब दिए और लागत की वसूली किस्तों में की जिसे बिजली बिल में हुई बचत से आसानी से चुकाया जा सकता था। बिना किसी सब्सिडी के इस नए कार्यक्रम स्वरूप की वजह से यह बदलाव केवल पांच वर्षों में पूरा हो गया जो एक कीर्तिमान है।
सौर तापीय ऊर्जा में आगे बढ़ने का एक तरीका यह हो सकता है कि कोई सरकारी एजेंसी अलग-अलग उद्योगों में प्रायोगिक परियोजना लगाकर इन प्रणालियों की विश्वसनीयता और लागत में होने वाली बचत से सबको अवगत कराए। उदाहरण के लिए किसी खास औद्योगिक क्षेत्र में (जैसे टेक्सटाइल पार्क) में बन रही नई इकाइयों की पहचान की जा सकती है और उन्हें उनकी जरूरत के हिसाब से बनी नए सौर तापीय उष्मा प्रणाली से उष्मा लेने के लिए मनाया जा सकता है। यह काम गारंटी और देयता वाले अनुबंधों के जरिये उष्मा आपूर्ति करने का प्रस्ताव देकर किया जा सकता है। यह जिम्मेदारी पूरी करने के लिए मानक दीर्घकालिक ‘टेक ऑर पे’ अनुबंध (खरीदार और विक्रेता के बीच कानूनी समझौता) के तहत आपूर्ति के लिए बोलियां मंगाई जा सकती हैं।
उष्मा की खरीद और आपूर्ति के लिए इन एक के बाद एक अनुबंधों के साथ एजेंसी पर केवल आकस्मिक देयता आएगी। ऐसा करने से सुनिश्चित आपूर्ति को लेकर औद्योगिक इकाइयों और पक्की खरीद व भुगतान को लेकर आपूर्तिकर्ताओं के मन में जो जोखिम का डर है वह दूर हो जाएगा। भविष्य में पार्क में उत्पादन और मांग बढ़ने के साथ-साथ इन सौर तापीय प्रणाली को मॉड्यूलर तरीके से लगाने के लिए जगह उपलब्ध कराने हेतु औद्योगिक पार्क विनिर्माताओं (डेवलपर) के साथ साझेदारी करने की जरूरत आएगी।
जब पहले दौर की प्रायोगिक परियोजनाएं काफी कम लागत पर विश्वसनीय निरंतर उष्मा की आपूर्ति कर सफल साबित होंगी तो प्रतिस्पर्द्धात्मक बाजार के कारक काम करने लगेंगे। इससे मांग भी बढ़ेगी। जोखिम कम करने के लिए सरकारी एजेंसी की जरूरत कम हो जाएगी और फिर बाद में पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उम्मीद की जा सकती है कि बड़े पैमाने पर काम होने और प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने से इन प्रणालियों के विनिर्माण, इनकी स्थापना और इनके रखरखाव की लागत कम होगी।
सरकार इन प्रणालियों को सबसे कम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाकर और अधिक मूल्यह्रास दर देकर इस बदलाव को और बढ़ावा दे सकती है। सौर तापीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाली नई इकाइयों की संख्या शुरू में धीरे-धीरे बढ़ेगी और फिर जैसे-जैसे उनकी इन प्रणालियों की विश्वसनीयता पर भरोसा बढ़ेगा यह रफ्तार और तेज हो जाएगी। मौजूदा इकाइयों को लागत में फायदा दिखेगा और कुछ इकाइयां इस प्रणाली को अपनाना शुरू कर सकती हैं। दूसरे बड़े बदलावों की तरह सरकार की अगुवाई में शुरुआती प्रगति तब तक धीमी रहेगी जब तक कि एक जरूरी स्तर हासिल नहीं कर लिया जाए। इसके बाद बाजार में काम करने प्रभावी कारक संभाल लेंगे। अगर हम अभी शुरुआत करें तो अगले दशक के पहले हिस्से में यह बदलाव पूरी तरह मुकम्मल करना एक व्यावहारिक लक्ष्य हो सकता है।
सौर तापीय ऊर्जा के इस्तेमाल से औद्योगिक इकाइयों की लागत कम होगी जिससे उनकी प्रतिस्पर्द्धा करने की क्षमता भी बढ़ेगी। इससे बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों में कमी आनी शुरू हो जाएगी। सौर तापीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाली इकाइयों को एक और फायदा यह होगा कि हमारे मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत यूरोपीय संघ (ईयू) को किए जाने वाले उनके निर्यात (चाहे सीधे या आपूर्ति श्रृंखला के हिस्से के तौर पर) पर ईयू के कार्बन सीमा समायोजना ढांचा (सीबीएएम) प्रणाली के तहत आयात शुल्क नहीं लगेगा। अगर आयात किए जा रहे सामान के उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन तय मानक से अधिक होता है तो सीबीएएम के तहत उन वस्तुओं पर आयात शुल्क लगता है।
सरकार बजट से सब्सिडी दिए बिना ही इस बदलाव को आगे बढ़ा सकती है। इससे विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के सफर में एक अहम उपलब्धि हासिल होगी और उद्योग के तेजी से बढ़ते बड़े हिस्से में उत्पादन लागत कम होगी। यह वाकई सभी के लिए फायदेमंद होगा।
(लेखक ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) में विशिष्ट अध्येता हैं)