टाटा समूह एक पारिवारिक व्यवसाय है या पेशेवर रूप से प्रबंधित संस्था? क्या टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस (नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक के इस विशाल समूह की होल्डिंग कंपनी) में 66 फीसदी हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा शेयरधारक है, पारंपरिक अर्थों में एक प्रमोटर है? समूह के शीर्ष नेतृत्व में टाटा नाम का कितना महत्त्व है?
क्या टाटा ट्रस्ट्स जैसा कोई धर्मार्थ संगठन लगभग 320 अरब डॉलर के मूल्य वाले करीब 26 सूचीबद्ध इकाइयों के एक विविध समूह का संचालन और नियंत्रण कर सकता है? क्या टाटा समूह के स्वामी के रूप में कोई एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह प्रतिनिधित्व करता है? क्या टाटा समूह की संरचना में बदलाव की आवश्यकता है ताकि उक्त प्रश्नों को जन्म देने वाली कुछ विसंगतियों का समाधान किया जा सके?
पिछले कुछ दिनों में ये सवाल अलग-अलग संदर्भ में बार-बार उठे हैं। अगस्त में एक सप्ताह के भीतर घटी दो घटनाओं ने इन्हें और हवा दी। पहली घटना 12 अगस्त को हुई, जब एन चंद्रशेखरन (जिन्हें चंद्रा कहा जाता है) ने घोषणा की कि फरवरी 2027 में उनका दूसरा कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह टाटा संस के अध्यक्ष पद के लिए फिर उम्मीदवार नहीं बनेंगे।
इस अप्रत्याशित कदम के पीछे का कारण चंद्रा द्वारा टाटा संस के निदेशक मंडल को लिखे पत्र और कंपनी द्वारा जारी बाद के बयान में स्पष्ट था: 24 फरवरी, 2026 को टाटा संस की बोर्ड बैठक में एक सदस्य ने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया, जिसे पिछले साल टाटा ट्रस्ट्स ने सर्वसम्मति से पारित किया था। टाटा संस नामांकन और पारिश्रमिक समिति द्वारा दर्ज और अनुशंसित इस प्रस्ताव में चंद्रा को कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अगले पांच वर्ष के लिए नवीनीकृत करने की बात कही गई थी।
दूसरा घटनाक्रम टाटा संस की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) का 18 अगस्त को स्थगित होना था। टाटा संस के 100 साल के इतिहास में यह पहली बार था कि किसी एजीएम को स्थगित करना पड़ा। स्थगन का कारण कोरम की कमी थी। टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) के अनुसार एजीएम में दो प्रमुख ट्रस्टों सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) का संयुक्त प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
यह संभव नहीं था क्योंकि एसआरटीटी के निर्णय लेने पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर द्वारा इस वर्ष की शुरुआत में स्थायी न्यास नियमों से संबंधित कथित उल्लंघन के आधार पर रोक लगा दी गई थी।
पिछले महीने कुछ ही दिनों के अंतराल में उत्पन्न हुए दोहरे संकटों के कारणों को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है, लेकिन गहन विश्लेषण से दोनों मामलों में कार्यप्रणालीगत मनमानी स्पष्ट होती है। चंद्रा का तीसरी बार पदभार ग्रहण न करने का निर्णय किसी विशेष परिस्थिति में उनकी व्यक्तिगत पसंद का मामला हो सकता है।
लेकिन इससे पहले की घटनाओं से टाटा ट्रस्ट्स में एक प्रणालीगत समस्या का पता चलता है। टाटा ट्रस्ट्स के दो प्रमुख निकायों एसआरटीटी और एसडीडीटी द्वारा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव का कुछ महीनों बाद समूह के सबसे बड़े निर्णय लेने वाले निकाय, टाटा संस बोर्ड में सर्वसम्मति खो देना एक संगठनात्मक कमजोरी का संकेत है। चंद्रा पर टाटा ट्रस्ट्स के प्रस्ताव को इसके अध्यक्ष नोएल टाटा ने अनुमोदित किया था, और टाटा संस बोर्ड की बैठक में उन्हीं व्यक्ति ने नामित न्यासी के रूप में इसका विरोध किया था।
नोएल टाटा ने चंद्रा के तीसरे कार्यकाल का विरोध करते हुए एअर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसी कुछ संस्थाओं की लाभप्रदता पर सवाल उठाए थे, लेकिन कुछ ही महीनों में उनके रुख में आए बदलाव का असली कारण स्पष्ट नहीं किया गया है। सेवानिवृत्ति की आयु भी चर्चा का विषय रही है, लेकिन इस पर खुलकर बात नहीं हुई है।
टाटा समूह में कार्यकारी अधिकारी 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं। इस नियम के अनुसार, 63 वर्षीय चंद्रा को अगर तीसरा कार्यकाल मिलता है, तो टाटा संस के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल दो साल से भी कम होगा।
यह तथ्य तब छिपा नहीं था जब टाटा ट्रस्ट्स ने पिछले साल चंद्रा की उपलब्धियों की प्रशंसा करते हुए और समूह के भविष्योन्मुखी क्षेत्रों पर दांव लगाने के समय ‘निरंतरता’ का सर्वसम्मति से समर्थन करते हुए प्रस्ताव पारित किया था। यदि आयु एक बाधा थी, तो क्या रतन टाटा की तरह चंद्रा के लिए गैर-कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बोर्ड स्तर पर कोई चर्चा हुई थी? ऐसा प्रतीत नहीं होता।
टाटा संस की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) के स्थगन के मामले में, एसआरटीटी द्वारा न्यास नियमों के कथित उल्लंघन को समय रहते सुलझाया जा सकता था। महाराष्ट्र सरकार ने 1 सितंबर, 2025 को एक अध्यादेश के माध्यम से महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1950 में संशोधन किया।
इस कानून के अनुसार, आजीवन न्यासियों की संख्या सार्वजनिक न्यास के बोर्ड की कुल संख्या के एक-चौथाई तक सीमित कर दी गई। टाटा ट्रस्ट्स को यह मानने का कारण हो सकता था कि नया कानून मौजूदा व्यवस्थाओं के लिए नहीं है, लेकिन उन्हें पिछले कई महीनों में कानूनी स्पष्टीकरण प्राप्त करना चाहिए था और सुधार के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए थी।
टाटा समूह को चाहे पेशेवर रूप से प्रबंधित व्यवसाय कहा जाए या पारिवारिक स्वामित्व वाला व्यवसाय, टाटा संस के सबसे बड़े शेयरधारक को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों और स्थिरता के प्रतीक माने जाने वाले इस समूह में आगे कोई और संकट न आए।