ईरान युद्ध ने ऊर्जा आपूर्ति में अभूतपूर्व व्यवधान उत्पन्न कर दिया, और इसकी वजह से ‘अल्पकालिक बाधाएं’, ‘मार्जिन दबाव’ और ‘स्थगित पूंजीगत व्यय’ जैसे वाक्यांश बोर्डरूम में गूंजते रहे हैं। लेकिन एक उम्मीद की किरण कायम रही। वह यह कि डेटा सेंटर (डीसी) के निर्माण में पूंजीगत व्यय को टाला नहीं गया है। वित्त वर्ष 2026 के अंत तक भारत में डीसी की लगभग 1 गीगावॉट क्षमता थी और इस वित्त वर्ष में यह दोगुनी हो जाएगी। वर्ष 2030 तक यह 8 गीगावॉट तक पहुंच जाएगी। गूगल, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ अदाणी समूह, रिलायंस, भारती और टाटा की भी भारत के लिए बड़ी डेटा सेंटर योजनाएं हैं।
कुल मिलाकर, अकेले पूंजीगत व्यय में ही 30 अरब डॉलर से अधिक का खर्च होगा। इस व्यापक विस्तार के कई कारण हैं। भारत में स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या बहुत अधिक है और लगातार बढ़ रही है। यह दुनिया की सबसे अधिक डेटा खपत करने वाली आबादी है, और 5जी की उपलब्धता डेटा की खपत को और भी बढ़ा रही है।
फिलहाल भारत में वैश्विक जनसंख्या का 17 फीसदी हिस्सा है। लेकिन यह वैश्विक डेटा का 20 फीसदी उत्पन्न करता है, और इसके पास वैश्विक डीसी क्षमता का केवल लगभग 3फीसदी हिस्सा ही है। डेटा संप्रभुता सरकार का एक अनिवार्य दायित्व है, और क्षमता बढ़ाए बिना इसे पूरा नहीं किया जा सकता है। निश्चित रूप से, साथ में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) की मांगें भी हैं।
एआई के क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने की नीतिगत आकांक्षाएं आवश्यक डेटा सेंटर क्षमता के बिना पूरी नहीं हो सकतीं। स्मार्टफोन की बढ़ती संख्या भारत को सभी डिजिटल सेवाओं के लिए एक बेहतरीन परीक्षण स्थल बनाती है, और तकनीकी रूप से सक्षम कार्यबल की उपलब्धता इसे एआई नवाचार का एक संभावित केंद्र बनाती है।
कई कंपनियां इस संभावना को लेकर बेहद उत्साहित हैं। डीसी के विस्तार से टर्बाइन (त्रिवेणी टर्बाइन), स्पेशलिटी केबल (अपार इंडस्ट्रीज), ट्रांसफॉर्मर (सीमेंस एनर्जी, सीजी पावर), चिलर और कूलिंग टावर (थर्मैक्स) और स्किड्स (प्राज इंडस्ट्रीज) की मांग बढ़ रही है। डीजल जेनसेट निर्माता कमिंस का कहना है कि डीसी पहले से ही घरेलू राजस्व में 30-35 फीसदी का योगदान दे रहे हैं। इसके अलावा, निर्माण क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं हैं।
एक बार चालू हो जाने पर, डेटा सेंटर रोजगार सृजित करते हैं। इनमें मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, कूलिंग प्लांट ऑपरेटर, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और डेटा सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट (डीसीआईएम) के लिए विशेषीकृत ऑपरेटर शामिल होते हैं। डीसीआईएम में सर्वर, पावर यूनिट, कूलिंग सिस्टम आदि की निगरानी और प्रबंधन के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर और टूल्स का उपयोग शामिल है। उचित कौशल प्रशिक्षण दिए जाने पर, डीसी बेरोजगारी संकट को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
यह सब सभी के लिए फायदेमंद प्रतीत होता है और राज्य डीसी की स्थापना के लिए होड़ कर रहे हैं। यदि सेमीकंडक्टर निर्माण योजनाएं भी सफल होती हैं, और उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के परिणामस्वरूप कुछ उपकरणों का स्थानीय स्तर पर निर्माण होता है, तो इससे पारिस्थितिकी तंत्र में और अधिक घरेलू स्तर जुड़ जाएंगे।
तो फिर चुनौतियां कहां हैं? डीसी बिजली और पानी की खपत के मामले में बहुत बड़े खब्बू हैं। वर्ष 2030 तक ये वैश्विक बिजली मांग का 8-10 फीसदी उत्पन्न करेंगे। इन्हें ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, बिजली की मांग की प्रकृति (100 फीसदी अपटाइम) के कारण डीजल जेनरेटरों का उपयोग होता है, जिससे ये बहुत शोरगुल वाले और प्रदूषणकारी हो सकते हैं।
भारत जल की कमी से जूझ रहा है और बिजली की चरम मांग को पूरा करने में कठिनाई का सामना कर रहा है। यह दुनिया का सबसे प्रदूषित देश भी है। नीति निर्माता डीसी को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन इन चुनौतियों के समाधान पर उचित ध्यान दिए बिना ऐसा करने से स्थिरता का संकट पैदा हो सकता है और अंततः राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
हाल ही के अमेरिका के अनुभव का उल्लेख करना उचित होगा। हार्वर्ड के अर्थशास्त्री जेसन फरमैन ने गणना की है कि वर्ष 2025 की पहली छमाही में, डीसी और क्लाउड-संबंधित बुनियादी ढांचे में निवेश अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 4 फीसदी था और इसने जीडीपी वृद्धि में 90 फीसदी से अधिक का योगदान दिया।
लेकिन हाल ही में हुए गैलप सर्वेक्षण से पता चला है कि 71 फीसदी अमेरिकी अब स्थानीय समुदायों में डेटा सेंटर के निर्माण के खिलाफ हैं, जिनमें से 48 फीसदी इसका कड़ा विरोध करते हैं। दूसरी ओर केवल 53 फीसदी अमेरिकी परमाणु संयंत्रों का विरोध करते हैं। वर्ष 2025 में 156 अरब डॉलर की लागत वाली 48 अमेरिकी डीसी परियोजनाएं रोक दी गईं या स्थगित कर दी गईं, और मार्च 2026 तक 20 अन्य परियोजनाएं रद्द कर दी गईं। जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अन्य देशों में भी डीसी परियोजनाओं के खिलाफ नागरिक समाज का ऐसा ही विरोध देखा गया है। ये अब ‘नॉट इन माई बैकयार्ड’ आंदोलन के प्रमुख केंद्र बिंदु बन गए हैं।
पानी और ऊर्जा की खपत, बढ़े हुए बिजली बिल और ध्वनि प्रदूषण को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण यह विरोध बढ़ रहा है। ये चिंताएं भारत में भी स्वाभाविक रूप से उठेंगी और उचित ध्यान दिए बिना डीसी तैयार करना सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप नहीं होगा।
इन चिंताओं का समाधान बेहतर डिजाइन नीतियों द्वारा किया जा सकता है जो स्थिरता पर ध्यान देती हैं, उदाहरण के लिए, अपशिष्ट जल का उपयोग और पुनर्चक्रण करके, डीजल जेनरेटरों की आवश्यकता को कम करने के लिए बैटरी स्टोरेज के साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को शामिल करके, आदि। लेकिन ये सब उपाय नीति संरचना में अंतर्निहित होने चाहिए और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। अन्यथा, डेटा सेंटर का विस्तार पटरी से उतर सकता है।