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Mission SEHAT: पोषण सुरक्षा के लिए कृषि और स्वास्थ्य को जोड़ेगी नई पहल

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इसका मकसद खराब या कुपोषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं दूर करना है। इसके लिए कृषि और स्वास्थ्य मंत्रालयों की नीतियों को एक साथ लाने और दोनों के बीच तालमेल बैठाने की जरूरत है

Last Updated- June 29, 2026 | 12:24 AM IST
Mission SEHAT
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो: शटरस्टॉक

देश में भरपूर खाद्यान्न उत्पादन से खाद्य सुरक्षा मजबूत करने के बाद अगला अहम कदम पोषण सुरक्षा पर ध्यान देना है। इसका मकसद खराब या कुपोषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं दूर करना है। इसके लिए कृषि और स्वास्थ्य मंत्रालयों की नीतियों और कार्यक्रमों को एक साथ लाने और दोनों के बीच तालमेल बैठाने की जरूरत है।

पिछले महीने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय चिकित्सा शोध परिषद (आईसीएमआर) द्वारा संयुक्त रूप से शुरू ‘मिशन सेहत’ (कृषि में परिवर्तन के माध्यम से स्वास्थ्य के लिए विज्ञान उत्कृष्टता) इस दिशा में एक नेक इरादे वाला कदम लगता है।

इसका मकसद दोहरा लक्ष्य हासिल करना है यानी पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों के उत्पादन और खपत को बढ़ावा देना और आम बीमारियों के इलाज के बजाय उनकी रोकथाम पर अधिक जोर देते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को नई दिशा प्रदान करना।

खास बात यह है कि यह पहल ऐसे समय में शुरू की गई है जब यह चिंता बढ़ रही है कि अधिक उपज देने वाली फसल की आधुनिक किस्में आम तौर पर अपनी पुरानी किस्मों की तुलना में कम पौष्टिक होती हैं। यह धारणा पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है। इसके समर्थन में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। अध्ययनों से पता चला है कि 20वीं सदी के मध्य से विकसित खाद्य फसलों की ज्यादातर किस्मों में कैल्शियम, आयरन और फॉस्फोरस जैसे जरूरी पोषक तत्वों की मात्रा उनकी पारंपरिक किस्मों की तुलना में 38 फीसदी तक कम होती है।

पर्याप्त अनाज, सब्जियों और फलों की उपलब्धता के बावजूद बड़े पैमाने पर कुपोषण और पोषण की कमी का यह एक मुख्य कारण हो सकता है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (वर्ष 2023-24) से पता चलता है कि देश की 19.7 फीसदी आबादी का वजन (बॉडी मास) सामान्य से कम है जबकि 27.3 फीसदी पुरुष और 30.7 फीसदी महिलाएं अधिक वजन या मोटापे की शिकार हैं। कम वजन और मोटापा दोनों ही गलत पोषण के संकेत हैं। बच्चों के मामले में पोषण संबंधी असामान्यता के मामले और भी चिंताजनक और स्पष्ट है। पांच साल से कम उम्र के 31.8 फीसदी बच्चों का वजन कम है जिनमें 29.3 फीसदी ‘नाटे कद के’ (वजन के हिसाब से बहुत छोटे कद वाले) हैं और 5.2 फीसदी ‘बहुत कमजोर’ (कद के हिसाब से बहुत कम वजन वाले) हैं।

स्पष्ट है कि स्वास्थ्य और कृषि मंत्रालय इस चिंताजनक स्थिति से अनजान नहीं हो सकते। फिर भी वे अब तक अपनी-अपनी कार्य योजनाओं पर ही काम करते रहे हैं और स्वास्थ्य तथा भोजन की मात्रा और गुणवत्ता के बीच गहरे संबंध को नजरअंदाज करते रहे हैं। जहां कृषि मंत्रालय बढ़ती आबादी की कैलरी (ऊर्जा) की बुनियादी जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त भोजन सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय ने बीमारियों की जड़ तक जाने के बजाय मुख्य रूप से बीमारियों के इलाज पर ध्यान दिया है जिसमें खराब पोषण से होने वाली बीमारियां भी शामिल हैं।

‘मिशन सेहत’ को इस समस्या को समग्र रूप से हल करने की एक कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। इसका मकसद कृषि विकास और फसल-उत्पादन कार्यक्रमों को सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के साथ जोड़ना है ताकि जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों जैसे मधुमेह, उच्च रक्त चाप, मोटापा, शारीरिक या मानसिक विकास में रुकावट और यहां तक कि कैंसर और दिल की बीमारियों जैसी जानलेवा बीमारियों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए उनके तालमेल का फायदा उठाया जा सके। माना जाता है कि सही पोषण इन बीमारियों से बचने के अहम तरीकों में से एक है।

‘मिशन सेहत’ पर जारी आधिकारिक नोट में बताया गया है कि देश की स्वास्थ्य रणनीति अब ‘प्रतिक्रियाशील, इलाज-आधारित ढांचे से हटकर सक्रिय, रोकथाम-केंद्रित दृष्टिकोण’ की ओर बढ़ेगी। इस मकसद के लिए प्रस्तावित पांच-सूत्रीय कार्य योजना में ये बातें शामिल हैं।

पहला सूत्र है, बायो-फोर्टिफाइड (पोषक तत्त्वों से भरपूर) फसल किस्मों को बढ़ावा देना जिनमें ऐसे जीन होते हैं जो उन्हें आयरन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों और कुछ जरूरी विटामिनों से भरपूर बनाते हैं। इनकी कमी से ही अक्सर ‘छिपी हुई भूख’ की समस्या पैदा होती है। योजना के इस हिस्से में प्राकृतिक रूप से पोषक तत्त्वों से भरपूर अनाज, जैसे कि श्रीअन्न या मोटे अनाज (मिलेट) और रागी की खपत बढ़ाना भी शामिल है।

दूसरा सूत्र है, एकीकृत खेती प्रणालियों को लोकप्रिय बनाना जिसमें फसलों की खेती को खेती से जुड़ी अन्य गतिविधियों जैसे बागवानी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, मुर्गी पालन और सुअर पालन के साथ जोड़ा जाता है। इससे अपेक्षाकृत पौष्टिक भोजन की कुल उपलब्धता बढ़ती है आहार में पोषण संबंधी विविधता आती है और कृषि आय में भी बढ़ोतरी होती है।

तीसरा कदम है खेती से जुड़ी ऐसी रणनीतियों को आगे बढ़ाना जिनसे मधुमेह, उच्च रक्त चाप और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं जैसी गैर-संक्रामक और जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों को रोका जा सके। इसके लिए प्रसंस्कृत, अधिक तेल वाले और सेहत के लिए नुकसानदेह उत्पादों के बजाय कार्यात्मक खाद्य पदार्थ (फंक्शनल फूड) के सेवन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। ये खाद्य पदार्थ सेहत के लिए खास तौर पर फायदेमंद होते हैं।

चौथा कदम, मकसद किसानों और खेत में काम करने वालों की सेहत और सुरक्षा को बेहतर बनाना है ताकि वे जहरीले और खतरनाक कीटनाशकों और दूसरे रसायनों के संपर्क में कम आएं।

इस खास कार्यक्रम का पांचवां और आखिरी हिस्सा इंसानों, पशुओं और पर्यावरण की सेहत के लिए एक व्यापक और सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने की बात करता है जिसमें इन क्षेत्रों में चल रहे अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम आपस में जोड़े जाएंगे। इसका मकसद पर्यावरण और जीवित प्राणियों की सेहत को लगातार हो रहे नुकसान को कम करना भी है।

हालांकि, यह योजना काफी व्यापक और अच्छी तरह से सोची-समझी लगती है मगर फसल-प्रजनन रणनीतियों को फिर से दिशा देने की भी तत्काल जरूरत है। इसमें फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ पौधों में प्राकृतिक रूप से मौजूद पोषक तत्त्वों की मात्रा को बेहतर बनाने पर भी उतना ही जोर दिया जाना चाहिए। अभी पौधों की नई किस्मों को आम तौर पर ज्यादा पैदावार, बीमारियों और कीटों से बेहतर बचाव, कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होने और उपज की कुल गुणवत्ता जैसे मानदंडों के आधार पर मंजूरी दी जाती है। अक्सर पोषण की गुणवत्ता को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता। फसल कटने के बाद अतिरिक्त पोषक तत्त्व मिलाकर तैयार किए गए उत्पादों की तुलना में प्राकृतिक रूप से अधिक पोषक तत्त्वों वाले उत्पाद बेहतर होते हैं।

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First Published - June 29, 2026 | 12:24 AM IST

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