व्यापक दलबदल के इस दौर में जब सभी दलबदल करने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर रुख कर रहे हैं तब तीन ऐसे राजनीतिक प्रश्न उठते हैं जो आपस में संबद्ध हैं। राजनीतिक दल क्यों टूटते हैं? लोग दलबदल क्यों करते हैं? क्या विचारधारा, सिद्धांत और यहां तक कि निष्ठा की कोई अहमियत है?
इन प्रश्नों के साथ एक बुनियादी तार्किक सवाल पैदा होता है। आखिर क्यों कुछ दल टूट जाते हैं या बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो जाते हैं जबकि अन्य दल नहीं टूटते। हाल के दिनों की बात करें तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का पतन या कहें भीतर से हुई बगावत सबसे बड़ी सुर्खी रही है। लेकिन यहां भी प्रतिस्पर्धा है। उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (यूबीटी) का शेष हिस्सा फिर से टूट रहा है। झारखंड में ‘इंडिया’ गठबंधन के विधायकों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) समर्थित निर्दलीय राज्य सभा उम्मीदवार परिमल नाथवानी के लिए क्रॉसवोट किया। कांग्रेस को कुछ सांत्वना डीके शिवकुमार से मिल सकती है जिन्होंने कर्नाटक के एमएलसी चुनाव में राजग से कुछ को क्रॉसवोट कराया।
आम आदमी पार्टी पहले ही सात सांसद खो चुकी है। बीजू जनता दल ने तीन सांसदों को भाजपा/राजग की झोली में डाला है। हाल ही में वाईएस जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी (युवजन श्रमिक रैयतु कांग्रेस पार्टी) ने भी सदस्य गंवाए हैं और सभी राजग (अर्थात भाजपा) की संख्या से जुड़ गए। शिरोमणि अकाली दल, अपनी धार्मिक एकता और विशिष्ट विचारधारा के बावजूद सदस्यों को बाहर जाने से नहीं रोक पा रहा। इनमें मनप्रीत सिंह बादल भी शामिल हैं। वहीं मनजिंदर सिंह सिरसा अब दिल्ली में मंत्री हैं।
अगर मैं भाजपा में जाने वाले कांग्रेसियों की सूची बनानी शुरू कर दूं तो इस पूरे आलेख की जगह छोटी पड़ जाएगी। इसलिए मैं उन तक सीमित रहूंगा जो भाजपा में मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने हैं या कांग्रेस में रहते हुए मुख्यमंत्री रहे हैं।
इस समय भाजपा के तीन मुख्यमंत्री कांग्रेस से आए हुए हैं: हिमंत विश्व शर्मा (असम), पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश) और माणिक साहा (त्रिपुरा)। एन. बीरेन सिंह भी ऐसे ही एक नेता थे जिन्होंने हाल तक मणिपुर पर शासन किया। ये चारों कांग्रेस में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे थे। मोदी की मंत्रिपरिषद में आप ज्योतिरादित्य सिंधिया, किरेन रिजीजू, राव इंदरजीत सिंह, जितिन प्रसाद और रवनीत सिंह बिट्टू को गिन सकते हैं।
सिवाय एक के सभी प्रतिष्ठित कांग्रेसी परिवारों से आते हैं। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों की सूची बनाएं जिन्होंने भाजपा का दामन थामा तो उनसे एक पूरी फुटबॉल टीम बन जाएगी। कैप्टन अमरिंदर सिंह, पेमा खांडू, अशोक चव्हाण, एसएम. कृष्णा, नारायण दत्त तिवारी, दिगंबर कामत, किरण कुमार रेड्डी, विजय बहुगुणा गिनते जाइए। पेमा खांडू को छोड़कर किसी को भाजपा से विशेष लाभ नहीं मिला सिवाय शायद संरक्षण के। या शायद उन्हें नुकसान से बचाव मिला।
कहा जाता है भाजपा एक चुंबक के समान है जहां सभी दलों के पराजित नेता जा पहुंचते हैं। इसके अलावा भाजपा साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करके भी प्रतिद्वंद्वियों को तोड़ती है। वह जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती है वे सभी भाजपा में जाकर पाक-साफ हो जाते हैं। भाजपा ने बड़े पैमाने पर दलबदल कराने के लिए फूट डालने के सिद्धांत में महारत हासिल कर ली है। दो-तिहाई को साथ ले आओ और कहो कि आप ही असली पार्टी हैं।
इससे दो प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या प्रतिद्वंद्वी दलों को तोड़ने की यह प्रवृत्ति केवल अब शुरू हुई है? और दूसरा, जो हमने प्रारंभ में उठाया था कि आखिर क्यों अधिकांश दल टूट जाते हैं या अपनी प्रतिभाओं को खो देते हैं जबकि कुछ अन्य दल नहीं? कांग्रेस इस खेल की पुरानी उस्ताद रही है। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई फैसले (11 मार्च, 1994) तक कांग्रेस ने अनुच्छेद 356 का उपयोग प्रतिद्वंद्वी सरकारों को बर्खास्त करने को आम चलन बना दिया था। फर्क यह है कि भाजपा अब अधिग्रहण के माध्यम से विस्तार पर पूरा ध्यान दे रही है। भाजपा यह बहुत बड़े पैमाने पर कर रही है।
दूसरा सवाल यह है कि आखिर क्यों अधिकांश दल टूट जाते हैं लेकिन कुछ नहीं? मैं केवल तीन का नाम लूंगा जो नहीं टूटते। भाजपा, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और वामपंथी दल। वामपंथियों में ट्रॉट्स्की, लेनिन, पेइचिंग और मॉस्को को लेकर कई बहसें और विभाजन हुए लेकिन वे एक मोर्चे में साथ बने रहे। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता ही वह गोंद है जो दलों को साथ रखती है।
लोक सभा में कांग्रेस का सबसे कमजोर प्रदर्शन 2014 में 44 सीटों का था। 1984 के आम चुनाव में भाजपा दो सीटों पर सिमट गई थी, फिर भी वह एकजुट रही। वास्तव में, पार्टी की स्थापना (मूल रूप से भारतीय जनसंघ) के 75 वर्षों में 2014 तक उसने केवल छह वर्षों तक सत्ता संभाली थी। लेकिन कोई विभाजन नहीं हुआ, और सिर्फ एक महत्त्वपूर्ण दलबदल गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का हुआ। इसके विपरीत कांग्रेस इतनी बार टूटी कि उनके पास वर्णमाला के अक्षर कम पड़ गए।
भाजपा से भी उल्लेखनीय अलगाव हुए हैं। पहला मामला बलराज मधोक का है जो जम्मू से स्वयंसेवक थे और जिन्होंने पार्टी अध्यक्ष के रूप में भारतीय जनसंघ को 1967 के चुनावों में 35 सीटों के उच्चतम आंकड़े तक पहुंचाया। उनका अपने समकालीन अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से टकराव हुआ क्योंकि वे अर्थव्यवस्था के मसले पर जनसंघ को तत्कालीन दक्षिणपंथी विचारधारा वाले अन्य संगठनों मसलन स्वतंत्र पार्टी आदि के साथ लाना चाहते थे। विरोधाभास यह था कि आरएसएस इस मामले में गांधीवाद के ज्यादा करीब था और मधोक इसे वामपंथी झुकाव के रूप में देखते थे या इंदिरा गांधी के विचारों से समानता मानते थे। 1973 में मधोक को जनसंघ के अंदर किनारे कर दिया गया और वे नाराज हो गए।
उन्होंने पार्टी के नेताओं, खासकर वाजपेयी पर तीखे हमले किए लेकिन किसी विरोधी दल में नहीं गए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापकों में से एक मधोक एक दशक पहले 96 वर्ष की आयु में गुमनाम मौत मरे। 2010 में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी ने उन्हें 1980 में मंत्री पद की पेशकश की थी लेकिन एक स्वयंसेवक होने के नाते वह इस लोभ में नहीं आए।
बाद में हमने कल्याण सिंह, उमा भारती और बीएस येदियुरप्पा जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों की बगावत देखी लेकिन वे सभी लौट आए। ऐसे नेताओं में केवल एक ने ही थोड़ी कामयाबी हासिल की लेकिन वे टिके नहीं। वाघेला ने 1995 में भाजपा के 47 विधायकों के साथ बगावत की थी और केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया था कि इन लोगों ने उन्हें पार्टी में दरकिनार किया। वाघेला कांग्रेस के सहयोग से एक साल तक मुख्यमंत्री रहे। बाद में उन्होंने अपने गुट का कांग्रेस में विलय कर दिया। वह उसके टिकट पर दो बार सांसद चुने गए और 2004 में केंद्रीय कपड़ा मंत्री बने। इसके बाद धीर-धीरे वे कमजोर पड़ते गए। आज 85 साल की उम्र में वे अलग-थलग जीवन जी रहे हैं।
भाजपा और वाम दल लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहते हुए भी एकजुट रहे। मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित समाजवादी पार्टी आश्चर्यजनक रूप से इस मामले में उनके समान ठहरती है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद ओबीसी-मुस्लिम वोट बैंक वाली सभी पार्टियों में से यह सबसे ज्यादा टिकाऊ रही है। इसकी विचारधारा काफी स्पष्ट है और अखिलेश यादव ने अपने वोट बैंक का भरोसा बनाए रखा है।
जिस राजनीतिक शक्ति को इस पर मंथन करना चाहिए वह कांग्रेस है। इतने सारे क्षेत्रीय दल मसलन टीएमसी, राकांपा, वाईएसआरसीपी आदि इससे ही अलग हुए हैं। इसके अपने नेता लगातार अवसर खोजते रहे हैं। यह स्पष्ट है कि समय के साथ सत्ता ही इसकी मुख्य विचारधारा बन गई। जब सत्ता चली गई तो इसके कई नेता भी चले गए। अन्य क्षेत्रीय दलों की बात करें जिनमें टीएमसी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना शामिल हैं तो ये बस एक-परिवार वाली पार्टिंयां थीं। जब परिवार वोट जीतने में असफल रहा, तो ये टूट गईं।
अकाली दल का पतन भी इसी में निहित है कि धार्मिक विचारधारा में डूबा हुआ दल एक पारिवारिक उद्यम बन गया। अब तक भाजपा ने अपनी वैचारिक बुनियाद को बनाए रखा है। इसमें अक्सर असहमति होती है लेकिन विद्रोह नहीं। शाखा संस्कृति का दबाव, कैडर और आरएसएस के बीच गुरु-शिष्य संबंध इसे एकजुट रखता है। इसने कई वंशवादी नेताओं को अपने साथ जोड़ा और कुछ अपने भी तैयार किए लेकिन सत्ता की बागडोर विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित घरेलू नेताओं के हाथों में ही रही है। इसने सत्ता में एकता बनाए रखी है और पिछले छह दशकों से ऐसा ही होता आ रहा है।