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रोजगार की नई राह बनेगा सेवा क्षेत्र, शिक्षा और स्वास्थ्य में छिपी बड़ी संभावनाएं

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सरकारी नौकरियों की होड़ और पेपर लीक के बीच, स्वचालन के इस दौर में शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे सेवा क्षेत्र रोजगार का मुख्य आधार बन सकते हैं

Last Updated- August 17, 2026 | 10:40 PM IST
Service Sector
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

पिछले एक महीने में देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में प्रमुख पाठ्यक्रमों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए परीक्षा प्रणाली में निष्पक्षता की मांग की गई। इसका तात्कालिक कारण नीट-यूजी परीक्षा के प्रश्नपत्र का लीक होना था। लेकिन इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने अन्य कई परीक्षाओं का भी उल्लेख किया।

इसके जवाब में सरकार ने संसद में नया विधेयक पेश किया। सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 नामक इस विधेयक के तहत किसी भी लीक के लिए जिम्मेदार पाए जाने वालों पर और कठोर सजा का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए), जो नीट और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट जैसी महत्त्वपूर्ण परीक्षाएं आयोजित करती है, उसको पुनर्गठित किया जा रहा है और 47 अधिकारियों को निलंबित किया गया है। परीक्षा प्रणाली पर उठ रहे सवाल मूल रूप से निष्पक्षता से जुड़े हैं। पैसों के बदले प्रश्नपत्र बेचे जाने की आशंका पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। इसलिए केवल एनटीए ही नहीं बल्कि उन सभी एजेंसियों का पुनर्गठन आवश्यक है जो उच्च शिक्षा कार्यक्रमों/पाठ्यक्रमों या सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रवेश के लिए परीक्षाएं आयोजित करती हैं।

इसके साथ ही एक बुनियादी सवाल उठता है। वह यह कि आखिर लीक का बाजार क्यों और कैसे बनता है और टिकता है? शायद इसका उत्तर भारत के रोजगार बाजार की प्रकृति में छिपा हुआ है।

आवधिक श्रम शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) भारत में नौकरियों की संरचना पर कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत करता है। 

वर्ष 2025 में कुल कार्यबल में नियमित श्रमिकों का हिस्सा 23.6 फीसदी था जिनमें से आधे से अधिक सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत थे। स्वरोजगार करने वालों का हिस्सा आधे से अधिक यानी करीब (56फीसदी) था जबकि शेष अस्थायी श्रमिक थे।

नियमित श्रमिकों का औसत मासिक वेतन लगभग 22,699 रुपये बताया गया जो स्वरोजगार करने वालों की औसत मासिक आय 14,861 रुपये और अस्थायी श्रमिकों की आय 10,000 रुपये (यह मानकर कि वे औसतन वे महीने में 22 दिन काम करते हैं) से अधिक है। नियमित श्रमिकों में भी बड़ा अंतर है। 50 फीसदी से अधिक के पास लिखित अनुबंध नहीं है और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता है।

विभिन्न गतिविधियों में वेतन के अंतर को समझने के लिए सर्वेक्षण ने कई व्यवसायिक वर्गीकरण दिए हैं। नियमित श्रमिकों में सबसे अधिक और सबसे कम वेतन का अनुपात 4:1 है। यदि सबसे अधिक वेतन पाने वाले नियमित श्रमिकों की तुलना अस्थायी श्रमिकों से की जाए तो अंतर 7: 4 गुना है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र में विशेषकर निचले स्तर की नौकरियों में ज्यादा वेतन मिलता है। दूसरी ओर स्वरोजगार करने वालों की श्रेणी में कई अवैतनिक पारिवारिक कामगार शामिल हैं।

भारत में अच्छी वेतन वाली नौकरियों की कमी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में वेतन अ​धिक होने के कारण इन नौकरियों की मांग अधिक है और लोग इनमें किसी भी तरह से शामिल होना चाहते हैं। इच्छुक उम्मीदवार अवसर मिलने पर अपने पक्ष में तराजू झुकाने को तैयार रहते हैं। पेपर लीक को प्रोत्साहन यहीं से मिलता है। इसलिए जहां अल्पकालिक समाधान प्रस्तावित कानून और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों का पुनर्गठन है वहीं हमें यह भी देखना होगा कि अर्थव्यवस्था कितनी नौकरियां पैदा कर रही है ताकि मूल कारण का समाधान हो सके। 

देश में रोजगार सृजन की अर्थव्यवस्था पिछले वर्षों में काफी बदल गई है। केएलईएमएस डेटाबेस बताता है कि पूंजी की प्रति इकाई पर श्रम का अनुपात समय के साथ सभी प्रमुख क्षेत्रों में लगातार घटा है। यानी आर्थिक गतिविधियां समय के साथ अधिक पूंजी-गहन होती जा रही हैं। कृषि और संबद्ध सेवाओं में यह अनुपात बाकी अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक है लेकिन विनिर्माण और सेवाओं में यह अनुपात तेजी से एक समान हो रहा है।

तकनीकी प्रगति के रुझान भविष्य में और अधिक पूंजी-गहनता की ओर इशारा करते हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का विकास शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के नियमित कार्यों में नई स्वचालन लहर लाने वाला है। यह नीति-निर्माण के लिए चुनौतीपूर्ण समय है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण तकनीकी क्षेत्र में सबसे आगे रहने की आवश्यकता है। इस दृष्टिकोण से नीति को नई तकनीकों के निर्माण और उन्हें अपनाने को प्रोत्साहित करना चाहिए। यह भारत के लिए वैश्विक बौद्धिक संपदा अधिकार में हिस्सेदारी और आय स्रोत बनाने का आवश्यक कदम है।

विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नया रोजगार पैदा करने की लागत लगभग एक जैसी है। शायद, स्वचालन के इस नए दौर में सेवा क्षेत्र को रोजगार पैदा करने के मुख्य स्रोत के तौर पर देखने का समय आ गया है। केएलईएमएस डेटा के अनुसार, प्रमुख सेवा क्षेत्र में निर्माण, व्यापार, होटल और रेस्तरां, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर शामिल हैं, जिनमें श्रम की ज़रूरत ज़्यादा होती है।

पहले तीन क्षेत्रों में अधिकतर अकुशल श्रम शामिल हो सकता है, जबकि बाद वाले क्षेत्रों (शिक्षा और स्वास्थ्य) में कुशल कार्यबल की आवश्यकता होगी। क्या अब समय आ गया है कि हम शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका को इस परिदृश्य में नए सिरे से देखें? इन दोनों क्षेत्रों में सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने से भारत को स्वास्थ्य और शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाया जा सकता है। साथ ही युवाओं के लिए व्यापक रोजगार अवसर भी उपलब्ध होंगे।

 विश्व स्तर पर और भारत में भी बुजुर्ग होती जनसंख्या नए अवसर पैदा करेगी। ये क्षेत्र मध्यम अवधि में ऐसी नौकरियां प्रदान कर सकते हैं जो एआई से प्रभावित नहीं होंगी। वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इन दोनों क्षेत्रों में सेवाओं की गुणवत्ता को सहारा देने के लिए बेहतर नियमन किया जाए। 

(लेखिका राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान की निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - August 17, 2026 | 10:40 PM IST

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