राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान के निदेशक के तौर पर मेरा यह अंतिम लेख है। इसमें मेरा ध्यान मुख्यत: भारत की गंभीर राजकोषीय स्थिति पर होगा जिसके बारे में 2016 से ही मैं जिक्र करता रहा हूं। केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति की कमजोरी कुछ हद तक विरासत की उपज होने के साथ ही इस समस्या को स्वीकार न करने और उसे दूर करने के लिए रणनीतिक दृष्टि के अभाव एवं खराब संस्थागत क्षमता की वजह से भी है।
सरकार की राजकोषीय स्थिति अनजाने ढंग से सिकुड़ रही है। वर्ष 1950-51 में केंद्र का कुल व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 4.8 फीसदी था। सरकार का व्यय क्रमिक रूप से बढ़ते जाने से वर्ष 1990-91 में यह जीडीपी का 18 फीसदी हो गया। उसके बाद से जीडीपी एवं सार्वजनिक व्यय का अनुपात लगभग लगातार गिरता रहा और 2013-14 में यह 13.9 फीसदी हो गया। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में यह अनुपात और भी गिरावट के साथ 2019-20 में 12.2 फीसदी पर आ गया।
ऐसा नहीं है कि यह स्थिति किसी मंसूबे की उपज है। आर्थिक उदारीकरण ने लाइसेंस परमिट राज को ध्वस्त कर आयात पाबंदियों को शिथिल किया था। पिछले 30 वर्षों में ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई कि सरकार अर्थव्यवस्था के किसी क्षेत्र से अपने हाथ पीछे खींच रही है। इसके उलट प्रमुख कार्यक्रमों एवं केंद्रीय योजनाओं ने केंद्र सरकार की मौजूदगी का विस्तार ही किया है।
राजकोषीय स्थिति में संकुचन का कारण यह है कि केंद्र सरकार अपना राजस्व एवं जीडीपी अनुपात बढ़ाने में लगातार नाकाम रही है। वर्ष 1990-91 में यह अनुपात 9.37 फीसदी पर था लेकिन अब यह 8.18 फीसदी हो चुका है। कर एवं जीडीपी अनुपात वर्ष 2007-08 में 8.8 फीसदी के उच्च स्तर पर था लेकिन अब यह भी 7.82 फीसदी पर आ चुका है। विनिवेश प्राप्तियों से इसे सुधारने की कवायद भी असरदार नहीं साबित नहीं हुई है। सरकार साल-दर-साल विनिवेश प्राप्तियों को लेकर बढ़-चढ़कर दावे करती रही है लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया जा सका। हालिया समय में स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि सरकार ने विनिवेश प्राप्तियां बढ़ाने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) की आपसी खरीद-फरोख्त का सहारा लेना शुरू कर दिया है। आज के समय में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से मिलने वाले लाभांश राजस्व प्राप्तियों का बड़ा जरिया बनकर उभरे हैं। राज्यों को उनकी वैध राजस्व हिस्सेदारी से भी वंचित किया जा रहा है और गैर-बजटीय लेनदेन में तेजी आई है।
दरअसल तदर्थ उपायों का सहारा लेने से हालात बिगड़े हैं। कुछ राजकोषीय नियंत्रण बनाए रखने के लिए यही माना गया है कि केंद्र सरकार किसी खास साल में बजट घोषणा से कम खर्च ही करती है। साफ है कि सरकार कर्ज पर ब्याज, वेतन एवं पेंशन जैसे प्रतिबद्ध व्यय में कटौती नहीं कर सकती है। लिहाजा वह परिचालन व्यय एवं पूंजीगत व्यय में कटौती का रास्ता अपनाती है। इसका नतीजा यह हुआ है कि प्रतिबद्ध व्यय अब कुल व्यय का 35 फीसदी हो चुका है। राजस्व प्राप्तियों के बेहद कम होने से सरकार को अपने चालू खर्च के लिए लगातार उधार लेना पड़ रहा है। कुल उधारी का 4.5 फीसदी 1980-81 में चालू खर्च के वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल हुआ था लेकिन हाल के वर्षों में यह 69 फीसदी तक पहुंच चुका है। इस तरह पूंजीगत व्यय में तेजी लाने के लिए खर्च बढ़ाने के इसके दावे 10 से अधिक साल से असलियत न होकर महज बयानबाजी रहे हैं। इसके परिणाम बजट से इतर प्रयोगों के रूप में आते हैं लेकिन उनके नतीजे खराब रहे हैं और वित्तीय प्रणाली गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के बोझ तले दबती गई है।
इस प्रतिकूल राजकोषीय स्थिति को नकारने और राजकोषीय घाटे को काबू में रखने पर विशेष (लेकिन आखिरकार असफल) ध्यान होने से सरकार अपनी खर्च संबंधी प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने में नाकाम रही है। सार्वजनिक व्यय को लेकर बजट भाषणों में अतिरेकी आख्यानों की भरमार होती है लेकिन व्यवहार में यह हर साल कम ही होता जा रहा है। कई क्षेत्रों में सीमित व्यय की गुणवत्ता का भी खराब होना तय है क्योंकि इसने सरकार को बयानबाजी से इतर किसी भी विकास कार्य पर लगाम लगाने और क्षतिपूर्ति के तौर पर प्रत्यक्ष अंतरण पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया है। राजकोषीय विश्वसनीयता इस हद तक गिर चुकी है कि बढ़-चढ़कर की गई घोषणाओं को फौरन ही भुला दिया जाता है और समूचा ध्यान किसी भी तरह काम निकालने पर रहता है।
राजकोषीय स्थिति एक कमजोर केंद्र सरकार की निशानी है। इसका समाधान स्पष्ट है: समस्या को स्वीकार कीजिए और इसके समाधान के लिए मध्यम अवधि का एक रणनीतिक ढांचा तैयार कीजिए। लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए एक हद तक संस्थागत संयोजन की जरूरत होती है जो फिलहाल नदारद है। वित्त मंत्रालय एक प्रशासनिक मंत्रालय है जो सालाना बजट तैयार करने और जल्दबाजी में बनाए गए निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन और वित्तीय सेवा जैसे विभागों के भारी बोझ से लदा हुआ है। इसमें एक मध्यम-अवधि वाले राजकोषीय प्रारूप को अपनाने की चाहत एवं संस्थागत क्षमता का अभाव है। गृह, विदेश एवं रक्षा मंत्रालयों के उलट वित्त मंत्रालय में कोई एक कार्यकारी प्रमुख नहीं होता है, वित्त सचिव महज इस मंत्रालय का वरिष्ठतम सचिव होता है और उसके पास समन्वित प्रयासों पर अमल कराने का कोई प्राधिकार नहीं होता है। नीति-निर्माण, क्रियान्वयन एवं प्रशासन की गतिविधियां स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं हैं। इसकी वजह से वित्त मंत्रालय को जोर किसी कमजोर सरकार की तरह दिखावे पर अधिक होता है। मितव्ययिता वाले कदमों की घोषणा होती है और उन्हें जल्द ही भुला दिया जाता है। राजस्व संकलन में लगातार नाकाम रहने पर न तो कोई जवाबदेही है और न ही इस प्रवृत्ति को बदलने की कोई सतत नीति ही है। राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों के बीच तालमेल बिठाने के बजाय इसकी चर्चा का केंद्र आरबीआई से मिलने वाला लाभांश रहता है।
मैं अपने लेखों में बार-बार उन रणनीतिक एवं विस्तृत कदमों का उल्लेख किया है जो सरकार को अपनी राजकोषीय नीति पर नियंत्रण हासिल करने के लिए उठाने होंगे। मेरे इन आग्रहों को नजरअंदाज किया जाता रहा है लेकिन फिर से एक आखिरी बार इसे कहता हूं और उम्मीद है कि उन्हें बुरी खबरों की तरह नहीं देखा जाएगा। अभी की तरह गंभीर राजकोषीय स्थिति में किसी शुतुरमुर्ग की तरह सालाना बजट निर्माण पर ध्यान, समारोह प्रबंधन एवं रक्षात्मक रुख अपनाने से हालात और बिगड़ेंगे। मध्यम-अवधि का राजकोषीय प्रारूप बनाने की तत्काल जरूरत है जिसमें वास्तविक राजस्व आकलन, बाध्यकारी व्यय लक्ष्य और संरचनात्मक परिवर्तन के सुपरिभाषित उद्देश्य हों।
कोविड संकट से निपटने में दिख रही छटपटाहट और राजकोषीय विवशता को इसका प्रतिबिंब होना चाहिए। एक राजकोषीय परिषद के गठन जैसे संस्थागत सुधार और वित्त मंत्रालय का मकसद के माकूल ढांचा बनाने का काम अब और नहीं टाला जा सकता है। मुझे उम्मीद है कि राजनीतिक सत्ता आगे बढ़कर इस महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करेगी। अभी देर नहीं हुई है लेकिन जल्द ही ऐसा हो जाएगा।
(लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)