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बाजार रूपी हथियार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 3:27 AM IST

महज दो वर्ष से भी कम समय हुआ जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 6.2 अरब डॉलर का ऋण (इसका आधा हिस्सा उधार तेल के रूप में था) दिया था क्योंकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देनदारी में चूक करने वाला था। अब उसने अपना कर्ज वापस लेने और उधार तेल देने की सुविधा खत्म करने का निर्णय लिया है। चीन आपातकालीन नकदी के साथ पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आया लेकिन इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ 6 अरब डॉलर के ऋण की बात भी ठंडे बस्ते में है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में भी कड़वाहट आई है। कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब दोनों ने पाकिस्तान की इच्छा की अनदेखी कर दी है क्योंकि खाड़ी की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। इसकी वजह जाहिर है: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल का बाजार है। बाजार में ऐसे ग्राहक को नाराज नहीं किया जाता, खासकर तब जबकि आपूर्ति ज्यादा हो और उसकी खपत करनी हो।
भारतीय बाजार का आकार एक ऐसा हथियार है जो इस्तेमाल किए जाने की प्रतीक्षा में है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन बाजार है, सौर ऊर्जा उपकरणों का यह तीसरा सबसे बड़ा बाजार है, हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है और फेसबुक तथा (अभी हाल तक) टिक टॉक जैसी कंपनियों के सर्वाधिक उपभोक्ता यहीं हैं। भारत सरकार ने इस उपभोक्ता शक्ति का पहले शायद ही इस्तेमाल किया हो। ऐसा एक हद तक इसलिए भी था क्योंकि मध्यवर्गीय बाजार पहले इतना बड़ा नहीं था। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बना। आंशिक तौर पर ऐसा इसलिए क्योंकि अभी हाल में दुनिया ने नियम आधारित बहुपक्षीयता से दूरी बनानी शुरू की है और द्विपक्षीय रिश्तों की गुंजाइश बन रही है।
चीन ने अपनी बाजार पहुंच का इस्तेमाल कई देशों को झुकाने के लिए किया है। हाल ही में उसने ऑस्टे्रलिया के खिलाफ ऐसा किया और अतीत में वह फिलीपींस, बोलिविया और अन्य देशों पर इसे आजमा चुका है। उसने भारत से होने वाले आयात को चरणबद्ध तरीके से कम किया। भारत की प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों के लिए वहां काम करना मुश्किल कर दिया गया। जापान, अमेरिका और जर्मनी की कंपनियां चीन में बिक्री के लिए निर्भर थीं और ऐपल, नाइकी और अन्य ब्रांड चीनी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर थे। उसने इसका भी फायदा उठाया। अब लद्दाख में चीनी घुसपैठ से पीडि़त भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी की अहम क्षेत्रों में विनिर्माण की आत्मनिर्भरता हासिल करने की बात इरादों के मुताबिक साबित हो या नहीं लेकिन यह चीन को तकलीफ दे रही है। क्योंकि इस समय अमेरिकी दबाव और बढ़ती लागत के कारण पहले ही चीन का निर्यातोन्मुखी विनिर्माण केंद्र होने का दर्जा फीका पड़ रहा है। इस बीच तेल निर्यातक देश भारतीय प्रधानमंत्री को अपने-अपने देश का सर्वोच्च सम्मान देने में लगे रहे ताकि उन्हें प्रसन्न रखा जा सके। इसी तरह सौदेबाजी में माहिर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अधीन अमेरिका ने भी कारोबारी मामलों में खिंचाव के बावजूद साथ बनाए रखा है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत ने रक्षा उपकरणों के निरंतर ऑर्डर और बोइंग विमान के ऑर्डर उसे दिए।
चीन औषधि के कच्चे माल और सामरिक उपयोग की वस्तुओं के क्षेत्र में पलटवार कर सकता है। इन क्षेत्रों में वैश्विक आपूर्ति पर उसका दबदबा है। इसके अलावा भारत को अन्य मोर्चों पर भी सावधानीपूर्वक पेशकदमी करनी होगी। रूस जो आज भी भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है उसने पाकिस्तान को हथियार आपूर्ति करने पर लगा पुराना प्रतिबंध 2014 में हटा लिया था। उसने हाल ही में पाकिस्तान को लड़ाकू हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति की है। इसके बाद वह उसे टैंक और मिसाइल भी दे सकता है। पाकिस्तान यद्यपि भारत की रक्षा खरीद की बराबरी नहीं कर सकता है और विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में भी वह बहुत पीछे है लेकिन सच यही है कि हम देश में जितना निर्माण करेंगे, रूस से उतना ही कम खरीदना होगा। भारत और रूस का व्यापार कमोबेश रक्षा क्षेत्र तक सीमित है। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों को सावधानीपूर्वक बढ़ाना होगा।
यही बात पड़ोसी देशों पर भी लागू होती है। भूटान को छोड़कर अन्य सभी पड़ोसी देशों के कारोबारी और रक्षा रिश्ते चीन के साथ अधिक मजबूत हैं। देश के बाजार को पड़ोसी देशों के लिए खोलना महत्त्वपूर्ण हो सकता है। इससे दूसरों के रास्ते भी बंद होंगे। यह खेल दोतरफा ही होगा। भले ही इससे वह देसी कारोबारी लॉबी नाराज हो जो आज सरकार के कदमों से खुश है और जो अभी हाल तक श्रीलंका के साथ मुक्त व्यापार समझौते के कारण नाखुश थी।

First Published : August 14, 2020 | 11:45 PM IST