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अमेरिका में मारक महंगाई से जुड़ी पहेली की पड़ताल

Last Updated- December 11, 2022 | 5:23 PM IST

मई के महीने की बात है जब अमेरिका में मुद्रास्फीति दर 8.6 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई। यह मुद्रास्फीति के लिए दो प्रतिशत की लक्षित दर के चार गुना से भी अधिक और पिछले 40 वर्षों का उसका सर्वोच्च स्तर है। आखिर ऐसे हालात किस प्रकार बनें? इन वर्तमान परिस्थितियों को समझने के लिए अतीत पर दृष्टि डालना हमारे लिए मददगार होगा।
1930 के दशक की महामंदी के दौरान अमेरिका में वास्तविक प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद एक तिहाई तक गिर गया। इसके साथ ही वहां 25 प्रतिशत ऋणात्मक मुद्रास्फीति की स्थिति बनी हुई थी। बैंकों से भारी पैमाने पर जमा को निकालकर मुद्रा में लगाया जा रहा था। उस दौर में करीब एक तिहाई बैंक नाकाम हो गए। वर्ष 1936 में जॉन मेनार्ड कींस ने मंदी की स्थिति में व्यापक राजकोषीय घाटे के माध्यम से अतिरिक्त सरकारी खर्च को वैधानिकता प्रदान की और उनका ऐसा करना बिल्कुल वाजिब भी था। इसका मकसद उत्पादन और रोजगार की स्थिति का ख्याल रखना था। इसके बाद 1963 में मिल्टन फ्रीडमैन ने किसी संकट के दौरान केंद्रीय बैंक की मुद्रा में भारी बढ़ोतरी यानी मुद्रा प्रसार को स्पष्ट वैधता प्रदान की। उनके द्वारा ऐसा किया जाना भी बिल्कुल सही था। इसके पीछे तंत्रीय बैंकिंग के भरभराकर गिरने और ऋणात्मक मुद्रास्फीति को रोकने की मंशा थी। वैसे तो कींस और फ्रीडमैन के काम की प्रकृति काफी अलग थी, लेकिन उनके ये सबक 2007 की विश्वव्यापी वित्तीय मंदी से निपटने में बड़े उपयोगी सिद्ध हुए। तब अमेरिकी सरकार ने भीमकाय राजकोषीय प्रोत्साहन जारी किए। फेडरल रिजर्व का हस्तक्षेप भी बहुत व्यापक था।
वर्ष 2008-09 से 2014-15 के बीच अमेरिका में केंद्रीय बैंक की मुद्रा में करीब 3 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर की बढ़ोतरी हुई। हालांकि उसमें से अधिकांश राशि वित्तीय संस्थानों को सहारा देने में ही खपी, जिनके लिए क्रेडिट विस्तार करना मुहाल हो गया था और यह स्थिति शिथिल रिकवरी के साथ-साथ अतिरिक्त वित्तीय बंदिशों-नियमनों के कारण निर्मित हुई थी। केंद्रीय बैंक के मुद्रा प्रसार में भले ही 400 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी, किंतु फिर भी यह वित्तीय संस्थानों की तत्कालीन आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं थी। वर्ष 2009 से 2012 के दरमियान बैंक क्रेडिट का स्तर 9 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर अटका रहा और यहां तक कि उसके बाद भी तेजी की गति बहुत धीमी रही। इसका लब्बोलुआब यही है कि केंद्रीय बैंक अपने मुद्रा प्रसार से भले ही वित्तीय तंत्र में तरलता बढ़ाता रहा, लेकिन वह जनता के हाथ में मुद्रा प्रसार के रूप में रूपांतरित नहीं हो सका। इसने निम्न एवं स्थिर मुद्रास्फीति को कायम रखने में मदद की। यहां तक सब ठीक ही कहा जाएगा।
अब परिदृश्य को जरा तेजी से आगे बढ़ाते हैं और 2020 के कोविड-19 संकट और आर्थिक स्थिति पर गौर करते हैं। इस दौरान नीति-निर्माताओं ने कींस और फ्रीडमैन दोनों के संदेश के मर्म को कुछ ज्यादा ही विस्तार रूप में आत्मसात कर लिया। खासतौर से 2007 से 2020 के बीच नरम मुद्रास्फीति के दौर ने भी उनकी इस धारणा को प्रभावित किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संकट में तमाम लोगों को मदद की दरकार थी, लेकिन ऐसी मदद का मकसद तो अपेक्षाकृत कम आकार के तार्किक प्रोत्साहन पैकेज से भी पूरा किया जा सकता था। असल में मांग को बढ़ाने के लिए दिया गया राजकोषीय प्रोत्साहन कुछ ज्यादा ही था और काफी हद तक गलत आकलन पर आधारित भी, क्योंकि इस समय एक स्वास्थ्य आपदा के चलते आपूर्ति के मोर्चे पर गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी। इस तरह 2020 में राजकोषीय घाटा 3 ट्रिलियन डॉलर के स्तर को भी पार कर गया, जबकि 2009 में यह 1.5 ट्रिलियन डॉलर से भी कम था।
जहां नए राजकोषीय प्रोत्साहन का आकार कुछ ज्यादा ही विशाल था, वहीं फेडरल रिजर्व भी अपनी महत्तम सीमा से आगे निकल गया। परिणाम यह निकला कि इस बार जनता के हाथ में भी मुद्रा प्रसार ने भारी विस्तार ले लिया। इसके आकलन के लिए एम2 नाम का एक पैमाना होता है, जो 15.5 ट्रिलियन डॉलर के स्तर से बढ़कर मई 2022 तक 22 ट्रिलियन डॉलर के आसमानी बिंदु तक पहुंच गया। चूंकि इस समय अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षमता ‘सीमित’ हो चली थी तो नतीजा मांग-जनित मुद्रास्फीति के रूप में निकला। तैयार उत्पादों और सेवाओं की भारी मांग के चलते तेल और अन्य जिंसों जैसे विभिन्न कच्चे माल की मांग भी बढ़ गई। इस कारण उनकी कीमतों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होती गई। इस प्रकार देखें तो संबंधित और तथाकथित लागत-जनित मुद्रास्फीति अंतर्जात ही थी। यह भारी-भरकम एवं अतिशय प्रोत्साहन पैकेज का परिणाम थी। स्पष्ट है कि यह कहानी उस आम धारणा से काफी अलग है कि हमारे समक्ष मांग-जनित और लागत-जनित दो अलग-अलग मुद्रास्फीति होती हैं।
बहरहाल, इस तथाकथित लागत-आधारित मुद्रास्फीति के मसले को किनारे भी कर दें तो ऐसी मुद्रास्फीति केवल अपने दम पर ही कायम नहीं रह सकती। फेडरल रिजर्व द्वारा जारी मुद्रा प्रसार से ही इसे निरंतरता मिल सकती है और फेड ने बिल्कुल ऐसा ही किया। इसीलिए, वह एक बार फिर परिदृश्य में प्रत्यक्ष है।  
वर्ष 2020 और 2021 में पहले ही काफी गड़बड़ हो चुकी थी। ऊपर से इस साल 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया। इससे भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया। वहीं मार्च में चीन ने अपने यहां कुछ प्रतिबंध लगा दिए। इन पहलुओं ने हालात को और बिगाड़ दिया। हालांकि वे ऊंची मुद्रास्फीति की मूल वजह नहीं थे। कच्चे तेल की कीमतें तो मध्य फरवरी में पहले ही 95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थीं। अमेरिका के मामले में ट्रंप प्रशासन और बाइडन प्रशासन के स्तर पर चुनावी आग्रहों की भी इसमें कुछ भूमिका रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो विगत दो महीनों के दौरान ही आर्थिक नजरिया व्यापक और निर्णायक रूप से बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है। समग्रता में निष्कर्ष की बात करें तो बदलते हालात से निपटने के लिए प्राधिकारी संस्थाओं को इतिहास और अर्थशास्त्र से सबक लेते हुए उन्हें उचित रूप से लागू करने की आवश्यकता है। इसके लिए शायद ही कोई सीधा-सरल सूत्र है।
(लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली केंद्र में अतिथि प्राध्यापक हैं)

First Published - July 21, 2022 | 11:09 PM IST

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