Categories: लेख

मंदी में भी कायम है भारतीयों का भरोसा

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 09, 2022 | 9:21 PM IST

सात महीने पहले हमने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके मुताबिक भारत में उपभोक्ता विश्वास सूचकांक 11 अंक गिरकर 122 अंक रह गया था। नील्सन ग्लोबल कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे के अंतिम पांच दौर में यह सबसे निचले स्तर पर था।


भारत ने अपना आशावादी राष्ट्र का स्थान नॉर्वे को सौंप दिया था। उसके बाद लगभग 158 साल पुराना इंवेस्टमेंट बैंक लीमन ब्रदर्स पूरी तरह से दिवालिया हो गया। अमेरिका के डेट्रायट कार निर्माता तक वहां की सरकार से पैसे की मांग करने लगे।

पिछले साल नवंबर के महीने में स्थिति उस समय बदतर  हो गई जब मुंबई में गन और ग्रेनेड से लैस आतंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कोहराम मचा दिया और लगभग 192 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इस तरह की घटनाओं के बावजूद भारत नील्सन सर्वे के नवीनतम दौर में 114 अंकों के साथ शीर्ष पर रहा।

यानी दुनिया के औसतन 84 अंकों के मुकाबले 30 अंक ऊपर रहा। यह सराहनीय हो सकता है लेकिन इसे बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। इस लिहाज से जून से ही वैश्विक औसत में 4 अंकों की कमी दर्ज की गई है।

नॉर्वे पहले स्थान से गिरकर पांचवें पर पहुंच गया। पिछले सर्वे की मानें तो डेनमार्क और इंडोनेशिया तीसरे स्थान पर थे। इस दफे वे दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं लेकिन उनमें 8-10 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है।

वर्ष 2008 की पहली छमाही से तुलना की जाए तो 52 बाजारों में से 43 के उपभोक्ता विश्वास सूचकांक में कमी दर्ज की गई है। हालांकि अभी तक स्पष्ट तौर पर भारत के लोग आर्थिक मंदी को लेकर उतने परेशान नहीं दिख रहे हैं।

सर्वे की मानें तो 51 फीसदी लोगों इस बात को लेकर काफी आशान्वित हैं कि अगले 12 महीनों के अंदर ही मंदी का असर पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।

दूसरी ओर कंपनियां उपभोक्ताओं की ओर से किसी तरह की खर्च कटौती के अनुमान से इनकार कर रही हैं। लेकिन उनके लिए मौजूदा समय की मुश्किलों से निकलना थोड़ा मुश्किल साबित हो रहा है। हालांकि कुछ कंपनियां अपने दावे की पुष्टि के लिए आंकड़े पेश कर रही हैं।

फ्यूचर गु्रप के ईजोन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज कुमार का कहना है, ‘बिग बाजार और ईजोन दोनों ही जगह 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है।’ उनका कहना है कि उनके सस्ते टिकाऊ उत्पादों के मुकाबले महंगे प्रॉडक्ट मसलन एलसीडी टेलीविजन और लैपटॉप में ज्यादा बढ़ोतरी देखी जा रही है।

हालांकि कुमार इस बात को स्वीकार करते हैं कि नवंबर में उनकी बिक्री उतनी बेहतर नहीं थी। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के सेल्स ऐंड मार्केटिंग डायरेक्टर वी. रामचंद्रन का मानना है कि टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बनी रहेगी।

उनका कहना है, ‘हमलोगों ने अभी तक कोई दबाव महसूस नहीं किया है। वास्तव में त्योहारों के मौसम में 40-50 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है।’

देश की अर्थव्यवस्था का नब्ज माना जाने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक कई तरह की विषमताओं की झलक देता है। इस सूचकांक के मुताबिक दिसंबर में उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं में 3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

देश की बिकने वाली हर दो गाड़ी में एक गाड़ी मारुति सुजूकी की होती है। नवंबर में मारुति सुजुकी की बिक्री में भी 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

इस कंपनी के कार्यकारी अधिकारी (मार्केटिंग एंड सेल्स) मयंक पारीक का कहना है, ‘हमने 2008 में चार अनोखे रूप देखे हैं। अप्रैल से जून तक सबकुछ ठीक ही रहा। अगस्त से अक्टूबर तक स्थिति कुछ बिगड़ने लगी। हालांकि अक्टूबर में अब तक की सबसे ज्यादा खुदरा बिक्री र्हुई।’

वह कहते हैं कि वर्ष 2008 के दिसंबर में कंपनी को इसी अवधि में वर्ष 2007 के मुकाबले 44 फीसदी ज्यादा इंक्वायरी मिली। पारीक का कहना है, ‘लोग खर्च करने के लिए तो तैयार हैं लेकिन उन्हें लोन नहीं मिल रहा है। हालांकि सरकार के हाल के कदमों की वजह से हम थोक बिक्री की उम्मीद कर सकते हैं।’

मंदी की चर्चा से एफएमसीजी कंपनियों को काफी दिक्कत महसूस हो रही है। मैरिको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (कंज्यूमर प्रॉडक्ट)सौगत गुप्ता का कहना है, ‘उपभोक्ता महंगी टिकाऊ वस्तुओं और कार पर खर्च करने से खुद को रोक रही हैं। हालांकि हमारे श्रेणी के उत्पादों की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है।’

फिर भी गुप्ता की बातों से यह साफ झलकता है कि मंदी की वजह से नई श्रेणियों के उत्पादन में भी वह बहुत सावधानी बरत रहे हैं। वह इस बात को स्वीकार करते हैं कि खाद्य तेल के उनके ब्रांड सफोला की बिक्री में कमी देखी जा रही है।

हालांकि अब तक जितनी भी मिसाल दी गई है यकीनन उससे हम ऐसा अनुमान लगा सकते हैं अब लोग कम खर्च करने लगे हैं। लेकिन पिछले चरण के मुताबिक भारत खर्च के लिहाज से सातवां सबसे ज्यादा आशावादी देश था।

इस बार यह इस सूची में शामिल भी नहीं हो पाया है। भारतीय लोग पैसे को बचत खाते में जमा करने के लिहाज से आठवें स्थान पर हो सकते हैं। छह महीने पहले यह सोच प्राथमिकता में नहीं थी।

इस तरह की स्थिति के बारे में तो बहुत आसानी से समझा जा सकता है। शेयर और म्युचुअल फंडों के निवेश में 6 अंकों की कमी देखी गई है।

इसी तरह रिटायरमेंट फंड में 2 अंकों की गिरावट देखी गई है। यह अनुमान लगाना बेहतर होगा कि जब अंतिम आंकडे अएंगे तो भारतीय उपभोक्ताओं की एक नजर अपने बटुए पर होगी तो दूसरी नजर दुकान को खोजने पर रहेगी।

हालांकि हम मंदी से उतने ज्यादा परेशान नहीं हो सकते हैं। एक अच्छे राष्ट्र के तौर पर हम अपने अभिभावकों के कल्याण और खुशी का ख्याल रखने के लिहाज से छठे स्थान पर हैं। इसके साथ ही हम अलग-अलग धर्मों की भावनाओं को भी बखूबी समझते हैं।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत आतंकवाद को लेकर सबसे चिंतित देश है। कुछ ऐसी ही बात पाकिस्तान के लिए भी लागू होती है।

नौकरी के संकट को बोलें बॉय-बॉय

दुनिया भर में नौकरियों को लेकर एक संकट और आशंका का माहौल बनता जा रहा है। लेकिन नील्सन ग्लोबल कंज्यूमर कॉन्फिडेंस के अध्ययन की मानें तो भारत ने रोशनी की एक किरण दिखाई है।

यह सर्वे अपनी तरह का साल में दो बार होने वाला सबसे बड़ा अध्ययन है। इस अध्ययन में 52 देशों के 26,000 इंटरनेट उपभोक्ताओं को शामिल किया जाता है।

देश में मतदान करने वाले 16 फीसदी लोगों का सोचना है कि नौकरियों के लिहाज से यह सबसे बेहतर मौका है जबकि 59 फीसदी लोगों ने इस दौर को अच्छा समय कहा है।

इस सर्वे के लिए जिन लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है, उनकी मानें तो पर्सनल फाइनैंस का बेहतर वक्त अब आ रहा है क्योंकि भारत, 77 प्रतिशत के साथ इस सूची में सबसे ज्यादा आशावादी देश के रूप में उभरा है। 9 फीसदी भारतीयों की राय मानें तो यह बहुत बेहतर समय है जबकि 68 फीसदी लोगों की राय में यह बेहतर समय है।

हालांकि इंटरनेट उपभोक्ताओं की राय मानें तो जापान में पर्सनल फाइनैंस की स्थिति 91 फीसदी के साथ सबसे ज्यादा निराशाजनक थी।

हाल में रिलीज हुई नौकरी डॉट कॉम पोर्टल की एक रिपोर्ट की मानें तो पिछले साल जुलाई में पूरा जॉब इंडेक्स 2008 में जहां 1,000 था वहीं यह अक्टूबर में 781 रह गया। यानी इसमें 21.9 फीसदी की कमी देखी गई है।

एबीसी कंसंल्टेंट के मुख्य अधिकारी शिव अग्रवाल का कहना है, ‘अमेरिका के मुकाबले इसे उतनी बिगड़ी हुई स्थिति नहीं कहा जा सकता है। हालांकि कई सेक्टरों ने किफायत बरतनी शुरू कर दी है और कम लोगों को नौकरियों पर रखने की कवायद भी की जा रही है। बिजनेस स्कूलों में नौकरियों को लेकर सबसे ज्यादा डर पैदा हो रहा है।

मर्सर के गंगाप्रिया चक्रवर्ती का कहना है, ‘मैं यह जानता हूं कि कई कंपनियां इस साल बी-स्कूलों में नहीं जा रही हैं। कुछ कंपनियां जो बिानेस स्कूलों में जा भी रही है वे बहुत कम लोगों का चयन कर रही हैं।’

First Published : January 12, 2009 | 10:44 PM IST