भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक मुल्क है। आंकड़ों की मानें तो अकेले हमारे देश में पिछले साल 10.2 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था, जबकि अमेरिका 8.5 करोड़ टन के उत्पादन के साथ इस सूची में दूसरे स्थान पर है।
अपना मुल्क तो मवेशियों की तादाद के मामले में भी पहले नंबर पर है। हिंदुस्तानी गांवों में रहने वाले कम से कम 73 फीसदी परिवार मवेशियों को पालते हैं। लेकिन फिर भी इस मामले में हम काफी पिछड़े हुए हैं। अभी तक हम इस सेक्टर की पूरी क्षमता को समझ ही नहीं पाए हैं।
यह कई तरीके से साबित किया जा सकता है। अभी तक मुल्क में हर इंसान को होने वाली दूध की उपलब्धता दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुकाबले काफी कम है। अपने मुल्क में औसतन हर शख्स को 246 ग्राम दूध ही मिल पाता है, जबकि दुनिया का औसत 285 ग्राम का है।
इसके अलावा, अपने मुल्क में मवेशियों से मिलने वाले उत्पाद इंसानी जरूरत का केवल 10 फीसदी प्रोटीन ही मुहैया करवा पाते हैं। यह काफी कम है। साथ ही, अपने मुल्क का एक दुधारू मवेशी दूध देने के मौसम में औसतन केवल 1,214 किलो ही दूध देता है, जबकि उसी दौरान दुनिया का औसत 2,104 किलो का है।
दूसरी तरफ कारोबारी मोर्चे पर देश के कुल दूध उत्पादन का केवल 15 से 16 फीसदी हिस्सा यानी बाजार में बेचे जाने वाले दूध का केवल 30 फीसदी हिस्सा ही संगठित कारोबार तक पहुंत पाता है। ज्यादातर दूध तो आज भी दूधवालों के जरिये ही लोगों तक पहुंचता है।
हमारे मुल्क में तो मवेशियों से मिलने वाले उत्पादों के निर्यात की हालत भी काफी बदतर है। दुनिया के बाजार में इन उत्पादों को सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही अपने मुल्क से आता है।
हालांकि, इसकी बड़ी वजह सरकार के अटपटे कायदे-कानूनों की जंजीरें हैं। इन्होंने ही मवेशियों के सहारे अपना पेट भरने वाले किसानों की कमाई पर अंकुश लगा दिया गया है।
दरअसल कई और भी बातें हैं, जिन्होंने इस सेक्टर के विकास की राह में रोड़े अटकाए हुए हैं। हमारे मुल्क में मवेशियों की कुल तादाद में ज्यादातर जानवर या तो काफी कम उत्पाद देते हैं या फिर देते ही नहीं हैं।
अब भी हमारे मुल्क में गाय को मारना और उनका मांस खाना पाप समझा जाता है। इसलिए दूध देना बंद कर चुकी गायों से पीछा छुड़ाना काफी मुश्किल होता है।
लिहाजा, वे भी उस चारे को खाती हैं, जो दुधारू गायों के लिए आता है। इस वजह से चारे की काफी किल्लत पैदा हो जाती है। इस पर से बीमारियों ने भी मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है। खुरपका बीमारी की वजह से हर साल कई गायें मौत के मुंह में समा जाती हैं।
इसकी वजह से भी उत्पादन काफी असर पड़ता है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो सिर्फ खुरपके रोग की वजह से ही हर साल करीब 10 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
इसके रोकथाम के काफी इंतजाम भी अपने मुल्क में किए गए हैं, इसके बावजूद हर साल अपने मुल्क के अलग-अलग हिस्सों से इस बीमारी के 1600 मामले सामने आते हैं।
आपकी नजर में ये आंकड़े काफी बदतर तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन मवेशियों के लिए बनाई गई केंद्रीय योजना को राज्य सरकार तो और भी बुरी तरह से अमली जामा पहनाते हैं।
कृषि मंत्री शरद पावर ने हाल ही में राज्यों के पशुपालन मंत्रियों की एक बैठक में खुलासा किया था कि केंद्र सरकार इन योजनाओं के लिए जितना पैसा देती है, उसमें से राज्य सरकारें मुट्ठी भर रकम ही खर्च करती हैं।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत राज्यों को मवेशियों के मद में मोटी रकम दी गई थी, लेकिन सूबे की हुकूमतों ने पिछले साल केवल 13 फीसदी रकम का इस्तेमाल किया था।
साथ ही, ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास फंड के तहत भी राज्यों को मोटी रकम दी गई थी। लेकिन उसमें से केवल 0.48 फीसदी का इस्तेमाल पशुपालन और डेयरी के मद में किया गया।
सबसे बड़ा झटका तो उस पैसे के घटिया प्रबंधन को देखकर लगता है, जो 2006-07 में प्रधानमंत्री के विशेष पैकेज के तहत आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल के उन जिलों के लिए दिए गए थे, जहां किसान काफी बड़ी तादाद में आत्महत्या कर रहे थे। इन सूबों के कुछ खास जिलों में पशुपालन के प्रचार प्रसार के लिए 510 करोड़ रुपये अलग रख दिए गए थे।
लेकिन इसमें से 125 करोड़ रुपये से एक कौड़ी ज्यादा तक खर्च नहीं हुई है। इस वजह से मवेशियों के जीन्स में सुधार का कार्यक्रम, चारे में विकास, रोग नियंत्रण, पशु स्वास्थ्य और पूरे डेयरी विकास पर असर पड़ा है।
जाहिर सी बात है, सरकार इस मामले से अनजान नहीं है। सरकार एक ऐसी राष्ट्रीय मवेशी नीति बनाने में जुटी हुई है, जिसमें इनमें से ज्यादा बाधाओं को दूर करने की कोशिश की जाएगी। इसका शुरुआती मसौदा तो 2004 में ही राज्य सरकारों के बीच 2004 में बांटा जा चुका है।
इस मसौदे को आज कल आखिरी रूप दिया जा रहा है, जिसके बाद इसे बाद में नीति की शक्ल दे दी जाएगी। इस नीति का मकसद इस सेक्टर में विकास को तेजी से बढ़ावा देना है, ताकि मवेशियों से मिलने वाले उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।
वह भी छोटे स्तर होने वाले उत्पादन को छेड़े बिना। जानवरों से मिलने वाले प्रोटीन की उपलब्धता को अगले 10 सालों में मौजूदा 10 ग्राम से बढ़ाकर 20 ग्राम करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस लक्ष्य को पाने के लिए मवेशियों की उत्पादकता में इजाफे, उन उत्पादों की गुणवत्ता में इजाफे, नई तकनीक को बढ़ावा देने, बेहतर मार्केटिंग और इस सेक्टर में ज्यादा निवेश की जरूरत होगी। यह अपने आप में काफी बड़ा काम है।
हालांकि, इसकी काफी जरूरत भी है। इस वजह से सरकारी योजनाओं को और बेहतर बनाया जा सकेगा और उन्हें उससे भी बेहतर तरीके से लागू भी किया जा सकेगा।